लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर निबंध लिखिए।

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कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर निबंध

लोक कल्याण राज्य की अवधारणा (सिद्धांत) से यह तात्पर्य है कि लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मान्यता प्रदान करता है। उत्पादन के साधनों पर समाज अथवा राज्य का नियन्त्रण नहीं होता है।

वर्तमान समय में राज्य को सभी देशों में लोक कल्याणकारी संस्था समझा जाता है। वह जनता की भलाई के अनेक कार्य करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, सामाजिक व आर्थिक सुधार, वेतन निर्धारण आदि इसी के सिद्धांत के अन्तर्गत आते हैं। अनेक उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया जाता है और जनहित की योजनाएँ क्रियान्वित की जाती है। इससे कार्यपालिकाका कार्य-क्षेत्र बढ़ जाता है तथा वह व्याप्त हो जाता है।

लोक कल्याणकारी राज्य का अर्थ

आज के युग में लोक कल्याणकारी सिद्धान्त विश्व के विभिन्न राज्यों में एक प्रचलन जैसा हो चला है। यही कारण है कि विश्व के करीब-करीब सभी देश चाहे वहाँ प्रजातन्त्रात प्रणाली हो अथवा कोई अन्य प्रणाली हो, अपने को लोक कल्याणकारी राज्य कहते हैं। लोक कल्याणकारी राज्यों में नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार (Fundamental Right) दिये जाते हैं, जो राज्य के हस्तक्षेप से वर्जित होते हैं। कल्याणकारी राज्य आज इतना लोकप्रिय हो गया है कि अनेक विद्वानों ने असके अर्थ को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। अतः अनेक विद्वानों ने इसकी परिभाषा भी की है।

लोक कल्याणकारी राज्य की परिभाषा

डा० अब्राहम के अनुसार -"कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान वितरण के उद्देश्य से करता है।"
गारनर के अनुसार-"कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य राष्ट्रीय जीवन, राष्ट्रीय धन तथा जीवन के भौतिक, बौद्धिक तथा नैतिक स्तर को विस्तृत करना है ।"
कांट ने कहा है- "कि कल्याणकारी राज्य का अर्थ उस राज्य से है जो अपने नागरिकों के लिये अधिकतम सामाजिक सुविधायें प्रदान करे।"

इसी प्रकार अन्य विद्वानों ने जैसे मैकाइवर (Macdver), हॉब्सन ने भी इसके अर्थ को परिभाषित किया है । इस प्रकार लोक कल्याणकारी राज्य अपने नागरिकों के मानसिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक तथा अन्य पहलुओं को विकसित करने का प्रयास करता है । इसका सम्बन्ध नागरिकों के सर्वांगीण विकास से है। इसका उद्देश्य सामाजिक शोषण का अन्त करना और कलात्मक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करना

संविधानवाद की रक्षा के लिए लोककल्याण की घोषणाएँ और नारे पर्याप्त नहीं हैं। लोककल्याण की दिशा में ठोस कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। संविधानवाद को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि आर्थिक विषमताएँ यथासम्भव अधिक-से-अधिक सीमा तक दूर की जायें तथा आर्थिक-सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त किया जाये। इस सम्बन्ध में अधिकांश विकासशील देश की जनता का धैर्य समाप्ति की ओर है। अतः यथासम्भव अतिशीघ्र और प्रभावी कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। 20वीं शताब्दी में समाज का सर्वांगीण विकास के लिए राज्य का कार्यक्षेत्र बहुत बढ़ गया। लोककल्याण से नि:सन्देह विधायिका के कार्य भी बढ़े। लेकिन कार्यपालिका विधायिका की तुलना में और महत्वपूर्ण हो गई। फलत: पिछली शताब्दी में विधायिका का प्रभाव कार्यपालिका की तुलना में कम हो गया।

साम्यवादी राज्यों में एक निश्चित आय तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाती हैं। बीमारी शारीरिक अक्षमता अथवा दुर्घटना की स्थिति में राज्यों के द्वारा नागरिकों को पेन्शन दी जाती है तथा सम्पूर्ण चिकित्सा के भार भी राज्य के द्वारा वहन किए जाते हैं। श्रमिकों के लिए कार्य करने के घण्टों को निश्चित कर दिया जाता है। अवकाश आराम-गह. क्लबों व स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना की जाती है। स्त्रियों को पुरुषों के समान वेतन तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।

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