Thursday, 20 January 2022

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन का वर्णन कीजिए।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन का वर्णन कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय

  1. सर्वोच्च न्यायालय का गठन किस प्रकार होता है ?
  2. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यतायें बताइये।
  3. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किस प्रकार होती है ?
  4. न्यायाधीशों की पदावधि एवं पदमुक्ति पर टिप्पणी करें।
  5. सर्वोच्च न्यायालय के कार्यकाल का वर्णन कीजिये।
  6. सर्वोच्च न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार पर प्रकाश डालें।
  7. सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार का संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
  8. सर्वोच्च न्यायालय का परामर्शी क्षेत्राधिकार क्या है ?
  9. सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्ति से आप क्या समझते हैं ?
  10. अभिलेख न्यायालय से आप क्या समझते हैं ?
  11. संविधान के संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर टिप्पणी कीजिये।
  12. सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
  13. मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका बताइये।

भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना

भारत में न्यायपालिका का एकीकृत पिरामिडनुमा मॉडल अपनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत भारत के लिए एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गयी है। सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य पीठ नई दिल्ली में स्थित है, किन्तु यह नई दिल्ली के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर सुनवाई कर सकता है, जिसे मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के अनुमोदन से निश्चित करें।

सर्वोच्च न्यायालय का गठन

सर्वोच्च न्यायालय का गठन एक मुख्य न्यायाधीश तथा 25 अन्य न्यायाधीशों (कुल 26 न्यायाधीश) से किया जाता है। मूल संविधान के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में कुल 7 न्यायाधीश होते थे। इसे 1960 में बढ़ाकर 14 न्यायाधीश कर दिया गया। यह संख्या 1977 में बढ़कर 18 कर दी गयी तथा 1986 में बढ़ाकर 26 कर दी गयी, जोकि अभी भी चल रही है।

न्यायाधीशों की योग्यतायें

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति हेत किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यतायें होनी चाहिए -

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. किसी उच्च न्यायालय में कम से कम पांच वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो।
  3. किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष से विधि व्यवसाय (वकालत) कर रहा हो।
  4. राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो।

न्यायाधीशों की नियुक्ति

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों जिसे राष्ट्रपति आवश्यक समझे, की सलाह पर की जाती है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर की जाती है।

पदावधि एवं पदमुक्ति

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर कार्य कर सकता है। नियुक्ति के पश्चात् न्यायाधीशों को कुछ विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त पदमुक्त नहीं किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार बहुत विस्तृत है। इसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत निम्नलिखित मामले आते हैं -

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार - प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार से तात्पर्य यह है कि कोई मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सीधे लाया जा सकता है तथा ऐसे मामलों पर निर्णय करना सर्वोच्च न्यायालय का अनन्य अधिकार है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

(i) पारम्भिक अपवर्जक (एकमेव) अधिकार (Original Exclusive Jurisdiction) - सर्वोच्च न्यायालय के इस अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत निम्न विषय आते हैं .

  1. भारत सरकार, राज्य या कई राज्यों तथा एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद
  2. दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद जिसमें कोई ऐसा प्रश्न अन्तर्निहित हो जिस पर किसी वैध अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर हो।

उपरोक्त के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को केवल संघ सरकार तथा राज्य सरकारों के पारस्परिक विवादों के सम्बन्ध में प्रारम्भिक अपवर्जक (एकमेव) अधिकार प्राप्त हैं अर्थात् उपरोक्त विवाद केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही प्रस्तुत किए जा सकते हो बशर्ते 26 जनवरी 1950 के पूर्व देशी रियासतों तथा भारत संघ के बीच यदि कोई संधियाँ या संविदा हुई हो जो आज भी लागू हो, को छोड़कर।

(ii) समवर्ती प्रारम्भिक अधिकार (Concurrent Original Jurisdiction) - संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ उच्च न्यायालयों को भी अधिकार प्रदान किया गया है । संविधान के अनुच्छेद 32(1) के द्वारा विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय को ही उत्तरदायी ठहराया गया है कि “मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए समुचित कार्यवाही करें। इस प्रकार मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए अन्तिम रूप से सर्वोच्च न्यायालय को ही अधिकार प्राप्त है।

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार - सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे बड़ा अपीलीय न्यायालय है। इसे भारत में स्थित सभी उच्च न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय में निम्नलिखित मामले में अपील दाखिल की जा सकती है :

(i) संवैधानिक मामले में - भारत में स्थित किसी न्यायालय द्वारा दीवानी, आपराधिक या किसी अन्य कार्यवाहियों में दिये गये किसी निर्णय, डिक्री के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि मामले में कोई संवैधानिक प्रश्न निहित है।

(ii) दीवानी मामले में - भारत में स्थित किसी उच्च न्यायालय द्वारा किसी दीवानी मामले में दिये गये आदेश, निर्णय या डिक्री के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि -

  1. (क) मामले में विधि या सार्वजनिक महत्व का कोई सारवान प्रश्न निहित है।
  2. (ख) उस मामले को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत किया जाना आवश्यक है।

(iii) आपराधिक मामले में - भारत में स्थित किसी उच्च न्यायालय द्वारा किसी आपराधिक मामले पर दिये गये निर्णय या अन्तिम आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि

  1. उच्च न्यायालय ने किसी अभियुक्त के मुक्ति के आदेश को अपील में उलट कर मृत्युदंड दे दिया हो।
  2. उच्च न्यायालय ने किसी अधीनस्थ न्यायालय से कोई मामला अपने पास मंगा कर अभियुक्त को मृत्युदंड दे दिया हो।

(iv) विशेष आज्ञा से अपील - सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने स्वविवेक से भारत में स्थित किसी न्यायालय द्वारा किसी मामले में दिये गये निर्णय, या आदेश के विरुद्ध अपील करने की इजाजत दे सकता है।

3. परामर्शी क्षेत्राधिकार - संविधान के अनुच्छेद 143 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को परामर्शी क्षेत्राधिकार प्राप्त है। अपने इस क्षेत्राधिकार के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय उन सभी मामलों पर परामर्श देने का कार्य करता है, जो राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर उसे सौंपे जायें।

4. अभिलेखीय क्षेत्राधिकार - संविधान का अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को एक अभिलेख न्यायालय का दर्जा प्रदान करता है। अभिलेख न्यायालय का तात्पर्य ऐसे न्यायालय से है जिसके सभी निर्णय एवं लिखित कार्यवाहियाँ एक लिखित रिकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं ताकि निचली अदालतों में उनका प्रयोग एक साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सके। इसके अतिरिक्त अभिलेख न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने का भी अधिकार होता है।

अयोध्या मामले में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को दंडित किया जाना न्यायालय की अवमानना का मुख्य उदाहरण है। अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरणविद् तथा बुकर पुरस्कार विजेता अंरुधती राय को अपनी अवमानना के लिए दंडित किया था।

5. न्यायिक समीक्षा का अधिकार - भारत के सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक समीक्षा का भी अधिकार प्राप्त है। हालाँकि भारतीय न्यायालय की यह शक्ति इतनी व्यापक नहीं है जितनी अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है। न्यायिक समीक्षा के अधिकार से तात्पर्य ऐसे अधिकार से है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय विधायिका द्वारा बनाये गये किसी अधिनियम. कार्यपालिका द्वारा जारी किये गये आदेश तथा उच्च न्यायालयों द्वारा दिये गये किसी निर्णय की समीक्षा करता है और उनकी वैधता की जांच करता है। यदि कोई कानून या आदेश संवैधानिक प्रावधानों के प्रतिकूल होता है तो उसे अवैध घोषित करता है।

6. मौलिक अधिकारों या संरक्षक - इस शीर्षक के लिये लघु उत्तरीय प्रश्न सं. 5 देखें।


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