Thursday, 20 January 2022

राज्यपाल की स्वविवेक कार्यों एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए।

राज्यपाल की स्वविवेक शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

राज्यों में राज्यपाल की स्थिति तथा भूमिका

राज्य का संवैधानिक प्रधान तथा संवैधानिक अध्यक्ष होने के नाते राज्यपाल की स्थिति तथा भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है, किन्तु कभी-कभी उसकी स्थिति में उसकी भूमिका के कारण आश्चर्यजनक परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं।

राज्य स्तरीय शासन में राज्यपाल की शक्तियाँ व्यावहारिक रूप से वास्तविक न होते हुए राज्य शासन में उसका स्थान सबसे अधिक सम्मानित और प्रतिष्ठित होता है। अपने निर्दलीय व्यक्तित्व के आधार पर राज्यपाल राज्य के शासन की दुलमुल और अस्थायी राजनीति में स्थायित्व और स्थिरता लाने की स्थिति में होता है, किन्तु व्यावहारिक रूप में प्रायः राज्यपाल केन्द्रीय सत्ताधारी दल के विश्वासपात्र ही होते हैं। यदि राज्यपाल प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला तथा कार्यशील व्यक्ति है तो वह विरोधी पक्ष तथा मंत्रिमंडल के मध्य अनेक मत भेदों को दूर करने तथा विकास की गति को अवधिकाल में सहायक साबित हो सकता है। बी. जी. खेर ने एक बार संविधान सभा में कहा था कि - "एक अच्छा राज्यपाल बहुत लाभ पहुंचा सकता है और एक बुरा राज्यपाल दुष्टता भी करता है, यद्यपि संविधान में उसको बहुत कम शक्ति दी गई है। राज्यपाल के कुछ स्वविवेकीय कार्य एवं शक्तियां ऐसी हैं जो उसकी स्थिति एवं भूमिका को अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं चर्चित बना देते हैं।

राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियां एवं कार्य

  1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में
  2. मंत्रिमंडल को अपदस्थ करने के सम्बन्ध में
  3. विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के सम्बन्ध में
  4. विधानसभा भंग करने या न करने के सम्बन्ध में
  5. मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति देने के सम्बन्ध में

1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में - राज्य शासन में राज्यपाल का एक महत्वपूर्ण कार्य मुख्यमंत्री की नियुक्ति से सम्बन्धित होता है। यदि राज्य की नव निर्वाचित विधानसभा में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो जाता है तथा उस बहुमत दल ने अपना नेता चुन लिया है तो राज्यपाल के लिए यह आवश्यक एवं बाध्यता हो जाती है कि वह उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करे, लेकिन यदि राज्य की विधानसभा में दलीय स्थिति एवं बहुमत की स्थिति स्पष्ट नहीं है तो इस सम्बन्ध में राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करते हुए राज्यपाल यह निर्णय करेगा कि किस सदस्य को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करे ताकि स्थायी सरकार का गठन हो सके।

मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में राज्यपालों को कई बार स्वविवेक का इस्तेमाल करना पड़ा है। सबसे पहले सन् 1952 में मद्रास राज्य विधानमंडल के राज्यपाल श्री प्रकाश ने टी. प्रकाशम को बहमत प्राप्त होने के दावे की अवहेलना करते हुए सी. राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। इसके बाद भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे अवसर आये जबकि राज्यपालों को अपने स्वविवेक का प्रयोग करना पड़ा. किन्तु स्वविवेकीय शक्ति का दुरुपयोग भी होता है। ऐसा ही उदाहरण था : उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने जगदम्बिका पाल (कांग्रेस) को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त कर दिया था।

2. मंत्रिमंडल को अपदस्थ करने के सम्बन्ध में - राज्यों के राज्यपाल को यह भी स्वविवेकीय शक्ति प्राप्त है कि वह मंत्रिमंडल को अपदस्थ कर राष्ट्रपति से यह सिफारिश करे कि राज्य में राष्टपति शासन लागू कर दिया गया है। राज्यपाल यह कार्य निम्न स्थिति में कर सकता है.

  1. जबकि उसे यह विश्वास हो जाये कि मंत्रिमंडल का सदन में बहुमत समाप्त हो गया है तथा मुख्यमंत्री पुनः बहुमत सिद्ध करने के लिए विधानसभा का अधिवेशन बुलाने को तैयार न हो।
  2. जबकि राज्य के मंत्रिमंडल के प्रति विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया हो।
  3. जबकि मंत्रिमंडल संविधान के अनुसार कार्य न कर रहा हो।
  4. जबकि किसी स्वतंत्र ट्रिब्यूनल द्वारा मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी घोषित किया गया हो।

3. विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के सम्बन्ध में - व्यावहारिक रूप में तो राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह पर ही विधानसभा का अधिवेशन बुलाता है, किन्तु कुछ ऐसी राजनीतिक तथा संवैधानिक स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जबकि राज्यपाल को स्वविवेक का प्रयोग करते हुए विधानसभा का अधिवेशन बुलाना पड़ता है।

संविधान के अनुच्छेद 174 के अंतर्गत राज्यपाल विधानसभा के अधिवेशन की कोई तिथि निश्चित कर सकता है। इस सम्बन्ध में वह मुख्यमंत्री की सलाह मानने को बाध्य नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्यपाल को यदि यह विश्वास हो जाय या सन्देह हो गया कि मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत प्राप्त नहीं है तो वह मुख्यमंत्री को शीघ्र ही अधिवेशन बुलाने को कह सकता है यदि मुख्यमंत्री ऐसा करने में विलम्ब या टाल मटोल करता है तो राज्यपाल स्वयं ही अधिवेशन बुला सकता है।

4. विधानसभा भंग करने या न करने के सम्बन्ध में - सामान्यतः राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर विधानसभा को भंग करता है, किन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल व विधानसभा भंग करने के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री की सिफारिश मानने से इंकार कर सकता है। वह मुख्यमंत्री के परामर्श के बिना भी विधानसभा को भंग कर सकता है। सन् 1976 में तमिलनाडु तथा सन 1984 में जम्मू कश्मीर के ऐसे उदाहरण हैं जबकि राज्यपाल ने स्वविवेक से विधानसभा भंग करने या न करने का निर्णय लिया था।

5. मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति देने के सम्बन्ध में - संवैधानिक रूप से राज्यपाल की अनुमति के बगैर किसी भी पक्ष द्वारा मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और इस सम्बन्ध में राज्यपाल स्वविवेक से निर्णय लेता है कि वह मुख्यमंत्री पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे अथवा न दे। ऐसा ही एक उदाहरण सन् 1993 में तमिलनाडु में जयललिता के सम्बन्ध में था।

इसके अतिरिक्त राज्यपाल मुख्यमंत्री से किसी विषय में कोई भी सूचना या जानकारी मांग सकता है। वह किसी भी मंत्री द्वारा अकेले लिए गये किसी निर्णय के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री से यह कह सकता है कि उस निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष प्रस्तुत करे। विधानमंडल द्वारा व्यक्ति विधेयक को वह पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है। इत्यादि से प्रकरण है जबकि राज्यपाल अपने स्वविवेक का प्रयोग करता है।


SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: