Monday, 30 September 2019

आषाढ़ का एक दिन नाटक का सारांश तथा उद्देश्य

आषाढ़ का एक दिन महान नाटककार मोहन राकेश जी द्वारा लिखा गया एक प्रसिद्ध नाटक है जिसके नायक संस्कृत के महान कवि कालिदास हैं। इस लेख में आप पढेंगे आषाढ़ का एक दिन नाटक का उद्देश्य तथा सारांश

आषाढ़ का एक दिन नाटक का उद्देश्य

कथानक किसी भी नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जिसे आधार बना कर नाटककार अपना मंतव्य पाठकों तक संप्रेषित करता है। इस इकाई से विद्यार्थियों को आलोच्य नाटक का कथानक और उसके विन्यास को समझने में सहायता मिल सकेगी।

    नाटककार अपनी रचना के माध्यम से जो कुछ भी कहना चाहता है उसे या तो किसी कथा का आश्रय लेकर कहता है या किसी जीवन स्थिति को चुनकर उसके प्रभाव के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। यह कथा अथवा जीवन-स्थितियाँ वर्तमान जीवन और समाज से संबंधित भी हो सकती है और इतिहास के किसी प्रसंग से भी। कथा कैसी भी हो वर्तमान की या अतीत की, महत्त्वपूर्ण यह है कि वह उसे प्रस्तुत कैसे करता है और उसका दृष्टिकोण क्या है। मोहन राकेश कृत 'आषाढ़ का एक दिन' नामक नाटक की कथा अतीताश्रित है। उसका नायक कालिदास है- वह कालिदास जो भारतीय साहित्य का उच्चतम शिखर माने जाते हैं। परंतु कालिदास, कालिदास कैसे बने इस संबंध में इतिहास लगभग मौन है। यत्र-तत्र बिखरे सूत्रों को जोड़कर और कुछ अपने अनुमान लगाकर प्रस्तुत नाटक का कथानक बनाया गया है। 

    आषाढ़ का एक दिन नाटक का सारांश / कथासार

    आषाढ़ का एक दिन नाटक की कथा 3 अंकों में विभाजित हैं। इस नाटक के मुख्य पात्र कालिदास, मल्लिका, अंबिका, विलोम तथा प्रियंगुमंजरी आदि हैं। See below To read Ashad ka Ek Din Summary in Hindi of Ank 1, Ank 2 and Ank 3, see below.

    Ashad Ka Ek Din Ank 1 Summary

    तीन अंकों में 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक की रचना की गयी है। प्रथम अंक के आरंभ में छाज से धान फटकती हुई अंबिका के दर्शन होते हैं। तभी वर्षा में भीगकर आई मल्लिका का प्रवेश होता है। दोनों के वार्तालाप से ज्ञात होता है कि मल्लिका अंबिका की पुत्री है। मल्लिका ने कालिदास के साथ आषाढ़ की पहली बरसात में भीगने का आनंद उठाया है इसलिए वह अपने इस सौभाग्य पर मुग्ध है। परंतु अंबिका को मल्लिका का यह आचरण अनुचित प्रतीत होता है- वैयक्तिक स्तर पर भी और सामाजिक स्तर पर भी। वह कालिदास को नापसंद करती है क्योंकि वह भावनाओं में निमग्न रहने वाला एक अव्यावहारिक व्यक्ति है जिससे यह आशा करनी व्यर्थ है कि वह मल्लिका को किसी प्रकार का सांसारिक सुख दे पायेगा। सामाजिक स्तर पर वह उन दोनों से इसलिए क्रुद्ध है क्योंकि प्रेमी युगल का विवाह से पूर्व इस प्रकार घूमना-फिरना लोकापवाद का कारण हो सकता है। उन दोनों के वाद-विवाद के बीच ही कालिदास भी आते है। उन्हें किसी राजपुरुष के बाण से आहत हरिण शावक के प्राण-रक्षा की चिंता है। राजपुरुष दंतुल भी अपने उस शिकार को खोजते हुए वहाँ पहुँच जाते हैं। कालिदास और दन्तुल में वाद-विवाद होता है। दन्तुल अपने राजपुरुष होने के दर्प में चूर है परंतु जब उसे ज्ञात होता है कि जिस व्यक्ति से वह तर्क-वितर्क कर रहा था वह प्रसिद्ध कवि कालिदास हैं तो उसका स्वर और भावभंगिमा तुरंत बदल जाती है। वह उनसे क्षमा माँगने को भी तैयार है क्योंकि सम्राट चंद्रगुप्त के आदेश पर वह उन्हीं को लेने तो वहाँ आया था। इस सूचना से ही कालिदास को राजकीय सम्मान का अधिकारी समझा गया है मल्लिका प्रसन्न हो जाती है, परंतु अम्बिका पर मानो इस सबका कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। दोनों एक दूसरे को अपना दृष्टिकोण समझाने का प्रयास करती हैं, तभी मातुल का आगमन होता है। मातुल कालिदास के संरक्षक हैं पर उनकी भाँति भावुक नहीं वरन् अति व्यावहारिक। वे राजकीय सम्मान के इस अवसर को किसी भी प्रकार खोना नहीं चाहते। कालिदास की उदासीनता से भी वे नाराज हैं। निक्षेप कालिदास की मनःस्थिति को समझता है परंतु इस अवसर को खोने के पक्ष में वह भी नहीं है इसलिए वह मल्लिका से अनुरोध करता है कि वह कालिदास को समझाये। इसी अंक में विलोम का भी प्रवेश होता है। उसकी बातों से ज्ञात होता है कि वह मल्लिका से प्रेम करता है। वह यह भी जानता है कि मल्लिका कालिदास को चाहती है और उसके जीवन में विलोम का कोई स्थान नहीं। वस्तुतः ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि उसका व्यक्तित्व कालिदास के व्यक्तित्व से नितान्त विपरीत है। कालिदास के इस सम्मान से वह थोड़ा दुःखी दिखाई देता है जिसकी अभिव्यक्ति उसके व्यंग्यपूर्ण कटाक्षों से होती है। उसके कारण कई हैं एक उसके मन का ईर्ष्या-भाव है। कालिदास को वह अपने प्रतिद्वंद्वी की भाँति ग्रहण करता है और उसे लगता है कि इस प्रतिद्वंद्विता में कालिदास का स्थान उससे ऊपर हो गया है। दो, वह कालिदास और मल्लिका के पारस्परिक स्नेह-भाव को भलीभाँति समझता है। वह जानता है कि कालिदास के चले जाने से मल्लिका दुःखी हो जायेगी और मल्लिका का दुःख उसे असहाय है। तीन, उसे आशंका है कि उज्जयिनी का नागरिक वातावरण, राज्य सत्ता की सुख-सुविधाएँ, आमोद-प्रमोद में कालिदास जैसा व्यक्तित्व कहीं खो न जाये, उसकी रचनाशीलता को कोई क्षति न पहुँचे, विलोम के मन में जो शंका है वही कालिदास के मन में भी है। उज्जयिनी जाने-न-जाने की दुविधा का कारण यही शंका है। परंतु मल्लिका के मन में इस प्रकार की कोई शंका नहीं। उसे कालिदास की प्रतिभा पर विश्वास है। यहाँ रोक कर वह उसे स्थानीय कवि नहीं बने रहने देना चाहती। उज्जयिनी जाकर उसके अनुभवों में विस्तार हो, राजकीय सुख-सुविधाओं के बीच अपने अभावों को भूल कर साहित्य-रचना में वह लीन हो जाए, उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले भले ही इसके लिए उसे कालिदास का वियोग क्यों न सहना पड़े इसी अभिलाषा से वह कालिदास को उज्जयिनी जाने के लिए मना लेती है।

    Ashad Ka Ek Din Ank 2 Summary

    दूसरा अंक कालिदास के जाने से कुछ वर्षों बाद का है। घर की साज सज्जा में आये परिवर्तन और अव्यवस्था से इस अंतर के संकेत मिल जाते हैं। अम्बिका अस्वस्थ है और मल्लिका को आर्थिक अभावों की पूर्ति के लिए काम करना पड़ रहा है। मल्लिका और निक्षेप के वार्तालाप से यह स्पष्ट होता है कि वह आज भी कालिदास से उसी प्रकार जुड़ी है। राजधानी से आने जाने वाले व्यवसायियों के माध्यम से वह उनकी रचनाओं को पढ़ती रही है। उसे यह संतोष भी है कि उसके स्नेह और आग्रह के कारण ही कालिदास राजधानी जाने के लिए तैयार हुए थे। अतः वह उनकी उपलब्धि में कहीं स्वयं भी भागीदार हैं। निक्षेप से बातचीत से ही इस बात की भी सूचना दी गयी है कि कालिदास अब पहले वाले कालिदास नहीं रहे गये हैं। वहाँ के वातावरण के अनुरूप अब वे सुरा और संदरी में मग्न रहने लगे हैं, गुप्त साम्राज्य की विदुषी राजकमारी से उन्होंने विवाह कर लिया है, अब काश्मीर का शासन भार भी वे सँभालने वाले हैं और इसी यात्रा के बीच वे अपने इस ग्राम प्रांतर में भी कुछ समय के लिये रुकेंगे, उनका नया नाम अब मातगुप्त है, 'ऋतु संहार' के बाद वे और भी अनेक काव्यों-नाटकों की रचना कर चुके हैं, सारा गाँव आज उनके स्वागत की तैयारी कर रहा है। तभी राजसी वेशभूषा में एक घुड़सवार के दर्शन निक्षेप को होते हैं। उसे विश्वास है कि वह राजपुरुष और कोई नहीं बल्कि स्वयं कालिदास ही हैं। यह सूचना मल्लिका को विचलित कर देती है। तभी रंगिणी-संगिणी का प्रवेश होता है। ये दोनों नागरिकाएँ कालिदास के परिवेश पर शोध करना चाहती हैं पंरतु उनका काम करने का ढंग अत्यंत हास्यास्पद और सतही है। वे मल्लिका से उस प्रदेश की वनस्पतियों, पशु-पक्षियों, दैनिक जीवन मे उपयोग में आने वाली वस्तुओं और विशिष्ट अभिव्यक्तियों के विषय में प्रश्न करती हैं। परंतु कुछ भी असाधारण न दिखाई देने से निराश हो कर लौट जाती हैं। उनके जाते ही अनुस्वार और अनुनासिक नामक दो राज-कर्मचारी आते हैं। कालिदास की पत्नी और राजपुत्री प्रियंगुमंजरी के आगमन की तैयारी में वे मल्लिका के घर की व्यवस्था में कुछ ऐसा परिवर्तन करना चाहते हैं जो राजकुमारी के गौरव के अनुरूप हो और सुविधाजनक भी हो। परन्तु वास्तव में वे व्यवस्था परिवर्तन का नाटक भर करते हैं और बिना कोई बदलाव किये वहाँ से चले जाते हैं। फिर मातुल के साथ प्रियगुमंजरी का आगमन होता है। वह जानती है कि मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है और कालिदास के मन में उसके लिए अथाह स्नेह और सम्मान है। उसे मालूम है कि कालिदास की समस्त रचनाओं की प्रेरणा स्रोत मल्लिका और यह परिवेश ही है। अतः स्त्री-सुलभ जिज्ञासा और ईर्ष्या के फलस्वरूप वह इस प्रदेश में आने और मल्लिका को देखने का लोभ संवरण कर पाती है। उसे आश्चर्य होता है कि राजधानी से इतनी दूर होने पर भी मल्लिका ने कालिदास की सभी रचनाएँ प्राप्त कर ली हैं, पढ़ ली हैं। अब कालिदास को मातृगुप्त के नाम से जाना जाता है अतः मल्लिका का 'कालिदास' संबोधन उसे आपत्तिजनक लगता है। वह मल्लिका के घर का परिसंस्कार करना चाहती है और उसकी इच्छा है कि मल्लिका किसी राजकर्मचारी से विवाह कर ले, उसके साथ उसकी संगिनी बन कर रहे। वहाँ की वनस्पतियों, पत्थरों, कुछ पशु-पक्षियों ओर कुछ गरीब बच्चों को अपने साथ ले जाना चाहती है जिससे कालिदास को राजसुख में रहते हुए भी कभी अपने परिवेश का वियोग न खटके मल्लिका घर के परिसंस्कार और विवाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। प्रियगुमंजरी हतप्रभ सी होकर वहाँ से चली जाती है। उसके जाने के बाद विलोम भी आता है। इस सारे घटनाचक्र से वह भी परिचित है। वह इस आशा से वहाँ आता है कि कालिदास यदि वहाँ आये तो वह उसकी वास्तविकता, उसके व्यक्तित्व में आये परिवर्तन को सबके सम्मुख उजागर कर दे। यद्यपि वह जानता है कि कालिदास वहाँ नहीं आयेगा। कालिदास के मल्लिका से बिना मिले चले जाने से अम्बिका और विलोम-दोनों की आशंकाएँ सत्य सिद्ध होती हैं।

    Ashad Ka Ek Din Ank 3 Summary

    तीसरे अंक में कुछ और वर्षों के बाद की घटनाएँ हैं। इस बार अंबिका दिखाई नहीं देती। वहाँ है पालने में लेटा एक शिशु जो मल्लिका के अभाव की संतान है। घर की अस्त-व्यस्त और जीर्ण-शीर्ण स्थिति मल्लिका के दुःखों की कहानी कह रहे हैं। इस बार फिर आषाढ़ का पहला दिन है पहले की भाँति इस बार भी मूसलाधार वर्षा हो रही है। परंतु इस बार उस वर्षा का आनंद उठाने की स्थिति मल्लिका की नहीं है। मातुल भीगता हुआ आता है। जिस वैभव और सत्ता-सुख की लालसा से वह उज्जयिनी गया था, वह लालसा तो पूरी हुई किंतु उस सबसे मातुल का मोह भी भंग हुआ है। चिकने शिलाखंडों से बने प्रासाद, आगे-पीछे चलते प्रतिहारी, कालिदास का संबंधी होने के नाते अकारण मिलने वाला सम्मान शुरू में तो बहुत आकृष्ट करता है परंतु धीरे-धीरे इस सबसे वह ऊबने लगता है। वह सूचना देता है कि कालिदास ने काश्मीर का शासन भार त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया है। मातुल के चले जाने के पश्चात इसी अंक में कालिदास का प्रवेश होता है। प्रथम अंक में जिस तेजस्वी कालिदास के दर्शन होते हैं और दूसरे अंक में जिसकी प्रतिभा, योग्यता और यश की चर्चा है, इस तीसरे अंक में उसके विपरीत भग्नहृदय-विवश कालिदास दिखाई देते हैं। इस अंक में कालिदास का लंबा आत्मवक्तव्य है। वह बताता है कि यहाँ से जाने के बाद वह सुख-सुविधाओं आमोद-प्रमोद, साहित्य-सुजन में व्यस्त भले ही रहा हो परंतु कभी भी अपने ग्रामप्रांतर और मल्लिका से अलग नहीं हुआ। अपने पुराने अनुभवों को ही वह बार-बार अनेक रूपों में पुनः सृजित करता रहा है। जिन लोगों ने सदा उसका तिरस्कार किया था, उपहास किया था उनसे प्रतिशोध लेने की कामना से ही उसने काश्मीर के शासन का दायित्व वहन किया था। परंतु अब वह इस कृत्रिम जीवन से थक चुका है। अतः शासक मातृगुप्त के कलेवर से संन्यास लेकर वह पुनः कालिदास के कलेवर में लौट आया है। अब वह यहीं इस पर्वत प्रदेश में ही रहना चाहता है, मल्लिका के साथ अपने जीवन का पुनरारंभ करना चाहता है। इस बातचीत के बीच-बीच में दरवाजे पर दस्तक होती रहती है परंतु मल्लिका दरवाजा नहीं खोलती। इस वक्तव्य के दौरान उसे एक बार भी यह विचार नहीं आता कि उसके उज्जयिनी जाने और वहाँ से वापिस आने की दीर्घ अवधि में मल्लिका को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा। उसके जीवन की दिशा भी बदल सकती है यह तो वह सोच ही नहीं पाता। सहसा अंदर बच्ची के रोने की आवाज और विलोम के प्रवेश से उसे वस्तुस्थिति का बोध होता है। अब उसे अनुभव होता है कि इच्छा और समय के द्वंद्व में समय अधिक शक्तिशाली सिद्ध होता है और समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। वह वहाँ से चला जाता है और यहीं नाटक समाप्त हो जाता है।

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