Friday, 31 December 2021

भारत सरकार अधिनियम 1935 की प्रमुख विशेषताएं बताइए।

भारत सरकार अधिनियम 1935 की प्रमुख विशेषताएं बताइए। अथवा

1935 अधिनियम की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

भारत सरकार अधिनियम, 1935

दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हुए वाद विवादों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने श्वेत पत्र जारी किया, जिससे भारतीयों की भावी शासन प्रणाली के सम्बन्धित सुझावों का उल्लेख था। इस पत्र का संसद की संयुक्त कमेटी ने भली प्रकार निरीक्षण किया और फिर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे दिसम्बर सन् 1935 ई. में संसद में प्रस्तुत किया गया। यह रिपोर्ट पारित होकर भारत सरकार अधिनियम सन् 1935 ई. के नाम से विख्यात हुई। इस अधिनियम (1935) द्वारा केंद्र में द्वैध शासन की व्यवस्था की गयी। संघीय विषयों को दो भागों में संरक्षित एवं हस्तान्तरित में विभाजित किया गया। संरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर-जनरल कुछ पार्षदों की सहायता से करता था, जो संघीय व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे। भारत सरकार अधिनियम 1935 को ठीक से पढ़ने से पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने लिए तैयार किया है, जब भी उन्हें महसूस होगा तब वे किसी भी समय कानूनी उपकरण के साथ इस पर पूरा नियंत्रण ले सकते थे। इस अधिनियम की विशेषताओं की व्याख्या निम्नलिखित प्रकार से की जा सकती है -

भारत सरकार अधिनियम सन् 1935 की विशेषताएँ

  1. प्रान्तीय स्वायत्त शासन
  2. प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं का पुनर्गठन
  3. केन्द्र में द्वैध शासन
  4. अखिल भारतीय संघ की स्थापना
  5. शक्तियों का विभाजन
  6. संघीय न्यायालय की स्थापना
  7. प्रशासनिक परिवर्तन
  8. साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली
  9. ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता

प्रान्तीय स्वायत्त शासन - सन् 1919 ई. के अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में दोहरी शासन प्रणाली की व्यवस्था की थी। इसके आधार पर प्रान्त केन्द्रीय सरकार की प्रशासनिक इकाई बन गए थे और प्रान्तों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया था। परन्तु सन 1935 ई. के अधिनियम द्वारा दोहरी शासन प्रणाली का हटाकर प्रान्तों को स्वराज प्रदान किया गया आरक्षित तथा हस्तान्तरिक विभागों का अन्तर समाप्त कर दिया गया तथा मंत्रिमंडल का निर्माण बहुमत प्राप्त दल के नेता द्वारा किए जाने की व्यवस्था की गई। गवर्नरों को इस अधिनियम द्वारा विशेष जिम्मेदारियाँ सौंपी गई। उनको शान्ति व्यवस्था करने, अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने, उच्च राज्य कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने, गवर्नर जनरल के आदेशों का पालन करने आदि की जिम्मेदारियों सौंपी गई।

प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं का पुनर्गठन - मुम्बई, बंगाल, मद्रास, उत्तर प्रदेश, बिहार व असम में दो सदंन की व्यवस्था की गई, जबकि शेष पाँच प्रान्तों में एक सदन ही दिया गया। दो सदन के अन्तर्गत उच्च सदन को विधानपरिषद और निम्न सदन को विधानसभा का नाम दिया गया निम्न सदन के सदस्यों की संख्या में वृद्धि कर दी गई। सदस्यों को चुनने के लिए विशेष चुनाव प्रणाली को यथानुरूप ही बना रहने दिया गया।

केन्द्र में द्वैध शासन - इस अधिनियम द्वारा आंशिक उत्तरदायी शासन स्थापित करने की और केन्द्र में दोहरी शासन प्रणाली प्रारम्भ की गई। केन्द्रीय विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया। आरक्षित और हस्तान्तरिक आरक्षित में प्रतिरक्षा चर्चा सम्बन्धी और कबायली शासन आदि से सम्बन्धित विषय थे। जिनका प्रबन्ध गर्वनर जनरल करता था। उसे पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्वक बिना मंत्री वर्ग के परामर्श के ही आरक्षित विषयों का प्रबन्ध करने का अधिकार था। हस्तान्तरिक विषयों पर प्रबन्ध गर्वनर जनरल और मंत्री परिषद को सौंपा गया। गर्वनर जनरल बहुमत प्राप्त दल के नेता के परामर्श पर मंत्रिमण्डल बनाता था। संघ में सम्मिलित होने वाली देशी रियासतों तथा महत्त्वपूर्ण अल्पसंख्यक वर्गों के प्रतिनिधियों को संघीय कार्यपालिका में यथासम्भव स्थान देने को कहा गया।

अखिल भारतीय संघ - इस अधिनियम द्वारा अखिल भारतीय संघ स्थापित किया गया। इसमें प्रान्त चीफ कमीश्नर के छः प्रान्त अपनी इच्छा से सम्मिलित होने वाले भारतीय नरेशों की रियासतें थी। संघ में सम्मिलित प्रान्तों एवं रियासतों को आन्तरिक क्षेत्र में स्वतन्त्रता प्राप्त थी और इनके विवादों को निपटाने के लिए संघीय न्यायपालिका की व्यवस्था की गई थी संघीय शासन का अध्यक्ष गवर्नर जनरल बना तथा इस शासन के अन्तर्गत दो सदन वाली संघीय व्यवस्थापिका की स्थापना की गई।

शक्तियों का विभाजन - समस्त विषयों की तीन सूचियाँ तैयार की गईं। संघ सची के विषयों की संख्या 59 थीं और केवल संघीय व्यवस्थापिका को ही इनसे सम्बन्धित कानून बनाने का अधिकार प्राप्त था। प्रान्तीय सूची में स्थानीय महत्त्व के 54 विषय थे। इनके लिए प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं को ही कानून बनाने का अधिकार था। समवर्ती सूची में विषयों की संख्या 36 थी। इन विषयों पर संघीय तथा प्रान्तीय व्यवस्थापिकाएँ दोनों ही कानून बना सकती थीं। परन्तु विरोध उत्पन्न होने की स्थिति में संघीय व्यवस्थापिका द्वारा बनाए कानून को ही मान्यता दी जानी थी।

संघीय न्यायालय - इस अधिनियम द्वारा दिल्ली में एक संघीय न्यायालय स्थापित करने की व्यवस्था की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और छः अन्य न्यायाधीश होते थे। इसका कार्य संविधान की व्याख्या, उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील गवर्नर जनरल का कानूनी सलाह तथा इकाइयों के आपसी विवादों का निपटारा करना था।

प्रशासनिक परिवर्तन - सिन्ध तथा उड़ीसा के दो नए प्रान्तों की व्यवस्था की गई तथा उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त को पूर्ण प्रान्त का दर्जा प्रदान किया गया। इस अधिनियम द्वारा भारत मन्त्री की परिषद् का अन्त कर दिया गया। इनके स्थान पर कम से कम तीन और अधिक से अधिक छ: परामर्शदाता नियुक्त किए गए और उनके कार्यकाल की अवधि पाँच वर्ष रखी गई। कार्यकाल समाप्त होने पर उन्हें पुनः उस पद पर नियुक्त करने का अधिकार नहीं था। भारत मंत्री पर अपने परामर्शदाताओं से परामर्श लेने या उनके परामर्श को स्वीकार करने के सम्बन्ध में कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया था।

साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली - मुसलमानों, सिक्खों, भारतीय, ईसाइयों, जमींदारों, पूँजीवादियों और स्त्रियों के लिए पृथक चुनाव पद्धति की व्यवस्था की गई। ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इस अधिनियम द्वारा मुसलमानों को बहुत-सी रियासतें दी जिसमें उनकी लालसा और प्रबल हुई।

ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता - इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता स्थापित की गई। इसके द्वारा यह व्यवस्था की गई कि भारत की प्रान्तीय तथा केन्द्रीय व्यवस्थापिकाओं में से किसी में भी ऐसा कानून नहीं बनाया जा सकता है। जिसका ब्रिटिश संसद की प्रभुसत्ता से सम्बन्धित किसी मामले पर प्रभाव पड़े। संविधान के संशोधन आदि का अधिकार वास्तविक रूप में ब्रिटिश संसद के हाथ में ही रहा।

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