Monday, 28 October 2019

स्वप्नवासवदत्ता नाटक की समीक्षा - Svapnavasavadatta Natak ki Samiksha

Svapnavasavadatta Natak ki Samiksha : "स्वप्नवासवदत्तम" महाकवि भास द्वारा लिखा गया एक नाटक है जिसकी कथावस्तु का मूल आधार वत्सराज उदयन से संबंधित लोककथा है। इस लेख में महाकवि भास द्वारा रचित स्वप्नवासवदत्तम नाटक की समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है।

स्वप्नवासवदत्ता नाटक की समीक्षा - Svapnavasavadatta Natak ki Samiksha

भास विरचित इस प्रसिद्ध नाटक "स्वप्नवासवदत्तम्" की कथावस्तु लोकथाश्रित है। भास ने अपनी प्रतिभा एवं कल्पना शक्ति के आधार पर उसे विस्तार प्रदान किया है तथा छ: अंकों में उसे प्रस्तुत किया है। 'नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः' के साथ नाटक का शुभांरभ किया गया है। Read also : स्वप्नवासवदत्ता नाटक का सारांश

हम देखते हैं कि भास विरचित सभी नाटकों का प्रारंभ इसी प्रकार हुआ है। उसमें महाकवि भास ने "मंगलादीनि मंगलमध्यानि मंगलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते" आचार्यों की इस प्राचीन परम्परा का निर्वाह किया है। नाटककार ने 'सूचयेद्वस्तुबीजं वा मुखं पात्रमथापि वा' नाट्यशास्त्र की इस परम्परा के अनुसार प्रथम पद्य में नाटक के चार प्रमुख पात्रों क्रमशः उदयन, वासवदत्ता, पद्मावती एवं विदूषक वसन्तक के नामों को उपन्यस्त किया गया है।

शास्त्रीय विधानानुसार नान्दी के बाद आमुख या प्रस्तावना का विधान है। तद्नुकूल ही स्वप्नवासवदत्तम् में भी नाटककार ने 'स्थापना' रखी है। यहां पर यह उल्लेखनीय है कि नाटककार भास के प्रायः सभी नाटकों में ‘स्थापना' शब्द का प्रयोग किया है। भासोत्तरकालीन नाट्यकृतियों में प्रस्तावना तथा 'आमुख' शब्दों के प्रयोग दिखाई देते हैं। प्रस्तावना, आमुख आदि का लक्षण लक्षण-ग्रंथों में पृथक्-पृथक् प्राप्त होता है। इनके भेद भी वहाँ प्रदर्शित किये गये हैं, जहाँ तक इस नाटक की प्रस्तावना का संबंध है, यह 'प्रयोगातिशय' नाम प्रस्तावना है। Read also : वासवदत्ता का चरित्र चित्रण

प्रस्तावना अथवा स्थापना का विधान नाटक में इस दृष्टि से रखा गया है कि उसके द्वारा सामाजिकों के ध्यान को अन्य दृष्टियों से हटाकर उनकी रूचि एवं ध्यान को एक ओर केवल नाटक के प्रति आकर्षित किया जाय । प्रस्तावना के द्वारा दर्शकों के नाटक के रचयिता व कृति के विषय में संक्षिप्त परिचय प्रदान कर दिया जाता है।

"स्वप्नवासवदत्तम्' की प्रस्तावना में यद्यपि लेखक का परिचय तो नहीं कराया गया है परन्तु मगधराज की कन्या पद्मावती जो कि नाटक की एक प्रमुख पात्र है उसके विषय में सूचित किया गया है। Read also : पद्मावती का चरित्र चित्रण

नाट्यविधानानुसार प्रस्तावना के बाद नाटक का प्रारंभ होता है। सूत्रधार मगधराज की कन्या पद्मावती तथा उसके पीछे चलने वाले सेवकों को रंगमंच पर प्रस्तुत कर चला जाता है। इसके बाद दो सिपाही प्रवेश करते हैं तथा लोगों को हटाने का निर्देश देते हैं। इसी के साथ नाटक का शुभारंभ होता है।

एक श्रेष्ठ नाटक के लिए 6 या 7 अंक होना आवश्यक बतलाया है। उस दृष्टि से 'स्वप्नवासवदत्तम् छ: अंकों का नाटक है। नाटककार ने कथावस्तु को छ: अंकों में विभाजित कर घटना संयोजन में असाधारण कुशलता प्रदर्शित की है। घटनाओं का संयोजन इस प्रकार किया गया है कि उनमें पूर्णरूप से स्वाभाविकता ज्ञात होती है। प्रत्येक घटना सार्थक है। प्रत्येक घटना सार्थक होने के कारण कथानक के विकास में पूर्ण योग देती है। सम्पूर्ण नाटक की प्रत्येक घटना बहुत विचारपूर्वक यथास्थान रखी गई है। इसके परिणामस्वरूप नाटक की गति स्वाभाविक तथा अविच्छिन्न रहती है।

जहाँ तक कथावस्तु में अर्थ, प्रकृति, अवस्थाओं एवं संधियों में विनियोग का संबंध है नाटककार भास 'स्वप्नवासवदत्तम्' में इस दृष्टि से पूर्ण सफल कहे जा सकते हैं। कथानक का प्रारंभ, उसका मध्य एवं अंत सभी आकर्षक हैं। राजा उदयन एवं वासवदत्ता के प्रणय की कथा आधिकारिक है। महाकवि भास ने दोनों के प्रेम, यौगन्धरायण व रूमण्वान् की स्वामीभक्ति, विदूषक की मैत्री, पद्मावती व वासवदत्ता की विशालहृदयता का सुंदर चित्रण किया है। नायक उदयन का कलाप्रेम यदि एक ओर सहृदय हृदय का आवर्जन करता है तो दूसरी ओर नीतिज्ञ यौगन्धरायण का बुद्धिविलास मस्तिष्क को चमत्कृत कर देता है। अंत में उदयन एवं वासवदत्ता का नाटकीय ढंग से मिलन अत्यन्त सुंदर बन पड़ा है। Read also : राजा उदयन का चरित्र चित्रण

नाटक का नामकरण राजा के द्वारा स्वप्न में 'वासवदत्ता' के दर्शन पर आधारित है। स्वप्न वाला दृश्य संस्कृत नाट्य साहित्य में अपना विशेष स्थान रखता है। पंचम अंक की यह घटना बड़ी ही सरस तथा हृदयावर्जक है। भास की कल्पना ने पद्मावती की शीर्षवेदना के व्याज से उदयन तथा वासवदत्ता को एकत्र संघटित कर दिया है। कुछ लोग इस नाटक के नामकरण के विषय में कहते हैं कि इसका नाम 'पद्मावती परिणय' या 'उदयनोदय' होना चाहिए। परन्तु, जो सरसता और कल्पना का प्रसाद स्वप्न दृश्य में है वह इस नाटक की आत्मा है तथा उस आधार पर यह नामकरण सर्वथा यथार्थ एवं समुचित है।

संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि 'स्वप्नवासवदत्तम्' का संविधानक सुलझा हुआ, रूचिकर एवं अन्तःसूत्र से अनुस्यूत है। प्रारंभ से अन्त तक पाठक व दर्शक को बांधे रखता है उनका औत्सुक्य उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होता रहता है।

SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: