पद्मावती का चरित्र चित्रण - स्वप्नवासवदत्तम्

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पद्मावती का चरित्र चित्रण - स्वप्नवासवदत्तम्

पद्मावती का चरित्र चित्रण - पद्मावती ‘स्वप्नवासवदत्तम्' नाटक की दूसरी स्वीया नायिका है। नाटक में सर्व प्रथम उसका परिचय कन्या के रूप में होता है। वह मगध नरेश दर्शक की भगिनी तथा मगध के पूर्व राजा अजातशत्रु की पुत्री है। नाटक में उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषतायें उभरकर सामने आई हैं - Read also : स्वप्नवासवदत्ता नाटक का सारांश

धर्मप्रिया एवं दानशील – नाटक में प्रथम अंक में जिस रूप में उसका परिचय हमें मिलता है, तदनुसार वह उदारहृदया, धर्मप्रिया एवं दानशील है। जब वह तपोवन में अपनी माता के दर्शनार्थ आती है तो उसके आगे चलने वाले अंगरक्षक मार्ग में आने वाले लोगों एवं तपस्वियों को हटाते हैं। यह देखकर पद्मावती उन्हें पीडित न करने का आदेश देती है। कञ्चुकी इसी समय पद्मावती एवं उसके कुल की धर्मप्रियता के विषय में उद्घोषणा करता है –
"धर्मप्रिया नृपसुता न हि धर्मपीडा
मिच्छेत् तपस्विषु कुलव्रतमेतदस्याः ।।1/6।।
इसी सन्दर्भ में पद्मावती की दानशीलता का भी सुन्दर चित्रण प्राप्त होता है। वह कञ्चुकी द्वारा तपोवन में दान देने की घोषणा करवाती है -
"कस्यार्थ : कलशेन को मृगयते वासो यथानिश्चितम् 
दीक्षां पारितवान् किमिच्छति पुर्नेदयं गुरोर्यद्भवेत् ।
आत्मानुग्रहमिच्छतीह नृपजा धर्माभिरामप्रिया 
यद्यस्यास्ति समीप्सितं वदतु तत् कस्याद्य किं दीयताम् ।। 
पदमावती की उत्कृष्ट इच्छा है कि तपस्वी जन निःशंक होकर अपनी आवश्यकताओं को उनके सामने प्रस्तुत करें। वे इच्छानुसार वस्तुएँ मांगे तथा प्राप्त करें। Read also : स्वप्नवासवदत्ता नाटक की समीक्षा

यह भावना पद्मावती की धर्मप्रियता, दानशीलता एवं उदारता को व्यक्त करती है। 

अत्यन्त रूपवती – पद्मावती अत्यन्त रूपवती है। उसके रूप की प्रशंसा स्वयं वासवदत्ता प्रथम अंक में करती है। चतुर्थ एवं पञ्चम अंक में स्वयं राजा उदयन भी उसके रूप की प्रशंसा करता है। चतुर्थ अंक में वह अपने मित्र विदूषक से इस प्रकार कहता है -
"पद्मावती बहुमता मम यद्यपि रुपशीलमाधुर्यैः ।। 
पञ्चम अंक में जब उसके अस्वस्थ होने का समाचार सुनता है तो अत्यन्त दुःखी होता हुआ कहता है:
"रूपश्रियां समुदितां गुणतश्च युक्तां" 
दोनों स्थलों पर हम उसके द्वारा पद्मावती के सौन्दर्य की बात सुनते हैं।
विदूषक के शब्दों में वह सद्गुणों की आकर है।" वह तरूणी, दर्शनीया, अकोपना, अनहंकारा, मधुरवाक् एवं सदाक्षिण्या है। 

पतिपरायणा – वासवदत्ता के समान पद्मावती भी अपने पति के प्रति समर्पिता है। अपने पति के लिए उसके हृदय में अपार एवं शाश्वत प्रेम है। वह अपने पति में किसी प्रकार का दोष देखना अथवा सुनना नहीं चाहती है। वह स्वयं कष्ट उठाकर भी अपने पति को सदैव सुखी देखने का प्रयास करती रहती है। चेटी जब एक बार उदयन को पद्मावती की अपेक्षा वासवदत्ता पर अघि क प्रेम प्रकट करने के कारण 'अदाक्षिण्य' कह देती है तो तत्काल चेटी को रोकते हुए कहती है – 'हला! मा मैवम् । सदाक्षिण्य एवार्य पुत्रः य इदानीमप्यार्याया वासवदत्तायाः गुणान् स्मरति।

उदारमना – पद्मावती उदारमना एवं विशाल हृदया है। तपोवन में वह जिस किसी को उसका अभीष्ट पूरा करने की उद्घोषणा करती है। वासवदत्ता को न्यास के रूप में रखकर वह उसके प्रति जैसा व्यवहार करती है उससे उसकी उदारता स्पष्टतया अभिव्यक्त होती है। विवाहोपरान्त अपनी सौत वासवदत्ता के प्रति अपने पति उदयन का प्रेम देखकर वह अन्य स्त्रियों की तरह न तो दुःखी होती है और न ईर्ष्या करती है। प्रत्युत सम्मान का भाव रखते हुए जब भी उसका नाम लेती है तो उसके नाम से पहले "आर्या' शब्द का प्रयोग अवश्य करती है। एक सौत के प्रति इस प्रकार का व्यवहार उसके हृदय की उदारता एवं महानता का द्योतक है। Read also : वासवदत्ता का चरित्र चित्रण

पूज्य एवं अग्रजों के प्रति सम्मान – पद्मावती अपने से उम्र में बड़ों तथा पूज्य जनों के प्रति आदर भाव रखती है। वह सदैव पूज्य व्यक्तियों का सम्मान करती है। तपोवन में वह तपस्वियों का सम्मान करते हुये उन्हें स्वेच्छापूर्वक घूमने एवं जो वस्तु उन्हें चाहिए उसे ग्रहण करने का निर्देश कञ्चुकी के माध्यम से प्रदान करती है। यौगन्धरायण के साथ भी वह अत्यन्त सम्मानपूर्वक वार्तालाप करती है। विवाहोपरान्त वासवदत्ता के माता-पिता का अपने माता-पिता के तुल्य ही सम्मान करती है। चित्रफलक में अवन्तिका के समान वासवदत्ता का रूप देखकर वह वासवदत्ता के जीवित होने के विचार से गद्गद् हो जाती है। इसके बाद वासवदत्ता के प्रकट होने पर वह किसी प्रकार का ईर्ष्या भाव व्यक्त नहीं करती अपितु एक सहज स्नेह का परिचय देते हुये उसके पैरों पर गिरकर क्षमा याचना करते हुये कहती है- "आर्ये! सखीजन समुदाचारेणातिक्रान्तः समुदाचारः। तच्छीर्षेण प्रसादयामि।" Read also : राजा उदयन का चरित्र चित्रण

संक्षेप में, पद्मावती का चरित्र एक आदर्श चरित्र है। वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में हम उसका मूल्यांकन करें तो नारी जगत् में ऐसा चरित्र मिलना अति दुर्लभ हैं।

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