Sunday, 30 December 2018

मजदूरी और प्रेम निबंध का सारांश Majduri aur Prem Summary in Hindi

मजदूरी और प्रेम निबंध का सारांश Majduri aur Prem Summary in Hindi

Majduri aur Prem
मजदूरी और प्रेम सरदार पूर्ण सिंह का एक प्रसिद्ध निबंध है जिसमें निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा दी गई है। यह प्रेम प्रेरक निबंध है। इस निबंध में सर्वप्रथम लेखक ने हल चालने वाले किसान के जीवन को प्रस्तुत करते हुए उसे स्वभाव से साधु, त्यागी एवं तपस्वी बतलाया है। खेत उसकी यज्ञशाला है और वह अपने जीवन को तपाते हुए अपनी मेहनत के कणों को ही फसल के रूप में उगाता है। खेती ही उसके ईश्वरीय प्रेम का केन्द्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते, फूल एवं फल-फल में बिखरा हुआ है। खेती की हरियाली ही उसकी खुशी है। 

लेखक ने गडरिये के पवित्र जीवन का निरूपण करते हुए लिखा है कि किस तरह वह खुले आकाश में बैठा ऊन कातता रहता है और उनकी भेड़ें चरती रहती हैं। उसकी आँखों में प्रेम की लाली छाई रहती है और प्रकृति के स्वच्छ वातावरण में जीवन व्यतीत करता हुआ सदैव स्वस्थ रहता है। वह खुली प्रकृति में जीवन-यापन करता है। उसके बच्चे भी अत्यंत शुद्ध हृदय वाले हैं। लेखक ने ‘मजदूर की मजदूरी’ का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जो मजदूर कठिन परिश्रम करके सारे दिन काम करता है, उसे हम उसके परिश्रम के अनुकूल मजदूरी नहीं देते। यदि कोई अनाथ एवं विधवा स्त्री सारी रात बैठकर किसी कमीज को सीती है और सीते-सीते थक जाती है किंतु, पैसों के लोभ में सोती नहीं, अपितु उसे सी कर ही चैन की सांस लेती है, तो उसके इस अटूट परिश्रम की मजदूरी भला थोड़े पैसों से कैसे चुकाई जा सकती है? वास्तव में ऐसा परिश्रम प्रार्थना, संध्या या नमाज से कम नहीं है। मनुष्य के हाथ से बनी हुई वस्तुओं में निश्चय ही उसकी प्रमे मय पवित्र आत्मा निवास करती है। हाथ से जो परिश्रम किया जाता है, उसमें एक अद्भुत रस होता है, जीवन रहता है उसके हृदय का प्रेम रहता है, मन की पवित्रता रहती है, आभा एवं कान्ति रहती है। ‘मजदूरी और कला’ का निरूपण करते हुए लेखक ने मशीनों के प्रयोग की भर्त्सना की है और उन्हें मजदूरी की मजदूरी छीनने वाली बताया है। लेखक तो मशीनों के स्थान पर मजदूरी के हाथ से होने वाले काम को महत्व देता है, क्योंकि मशीने निकम्मा और अकर्मण्य बना देती है। हाथ से काम करने से मनुष्य सदैव परिश्रमी, उद्योग एवं पवित्र रहता है। 

मजदूरी और फकीरी का वर्णन करते हुए लेखक ने इन्हें मानव के विकास के लिए परमावश्यक बतालया है। बिना परिश्रमी के फकीरी व्यर्थ है और बुद्धि शिथिल पड़ जाती है। अतः किसी को भी भीख माँगना उचित नहीं, अपितु परिश्रम करके खाना चाहिए। ‘समाज का पालन करने वाली दूध की धारा’ का वर्णन करते हुए लेखक ने परिश्रम एवं हाथ से काम करने की प्रवृत्ति एक ऐसी पवित्र दूध की धारा बताया जो मानव के हृदय को पवित्र बनाती हुई इसे सच्चे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ‘पश्चिम सभ्यता के एक नये आदर्श’ का वर्णन करते हुए लेखक ने पाश्चात्य देशों में उस नये मोड़ की ओर संकेत किया है, जिसके फलस्वरूप पश्चिम में अब लोग मशीन की अपेक्षा मजदूरी को महत्व देने लगे हैं। मशीनों के कारण पजूंपति पनपा है और मजदूर दरिद्र हुआ है। अन्त में लेखक यही सलाह देता है कि जड़ मशीनों की पूजा छोड़कर सचेतन मजदूरों को गले लगाना चाहिए उन्हें महत्व देना चाहिए, क्योंकि इसी से मानव का कल्याण होगा और समाज समृद्ध होगा, खुशहाल होगा।

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