Wednesday, 12 December 2018

बूढ़ी काकी कहानी का सारांश। Boodhi Kaki Summary in Hindi

बूढ़ी काकी कहानी का सारांश। Boodhi Kaki Summary in Hindi

बूढ़ी काकी कहानी का सारांश
आधुनिक हिन्दी साहित्य में उपन्यास सम्राट के नाम से प्रसिद्ध कहानीकार प्रेमचन्द की कहानी बूढ़ी काकी मानवीय करूणाकी भावना से ओत-प्रोत कहानी है। इसमें लेखक ने बूढ़ी काकीके माध्यम से समाज परिवार की उस समस्या को उठाया है, जहां वृद्धजनों से उनकी जायदाद-संपत्ति लेने के बाद उनकी उपेक्षा होने लगती है। केवल इतना ही नहीं, बात-बात पर उन्हें अपमानित और तिरस्कृत किया जाता है, भरपेट भोजन तक भी नहीं मिलता। सामाजिक यथार्थ के माध्यम से मुंशी प्रेमचन्द ने मनुष्य की स्वार्थी भावनाओं का घृणित एवं वीभत्स रूप चित्रित किया है। 
कहानी का प्रारम्भ करते हुए लेखक ने मानव-जीवन के वृद्धावस्था और बाल्यावस्था को एक दृष्टि से देखा है। इसमें कोई शक भी नहीं है। बूढ़ी काकी में जीभ के स्वाद के अलावा अन्य कोई इच्छा नहीं थी। उसे विधवा हुए पांच वर्ष का समय व्यतीत हो चुका है। उसके जवान बेटे भी असमय मर चुके थे। इस संसार में ऐसा कोई नहीं था, जिसे बूढ़ी काकी अपना कह सके। था तो केवल उसका दूर का भतीजा बुद्धिराम। भलेमानुष पण्डित बुद्धिराम ने बूढ़ी काकी के सामने लम्बे-चैड़े वायदे कर उसकी सब संपत्ति अपने नाम लिखवालीं पैसे का लालची बुद्धिराम बहुत जल्दी ही बदलने लगा। बुद्धिराम की पत्नी रूपा भी व्यवहार से कठोर थी लेकिन ईश्वर से अवश्य उसे डर लगता था। इसलिए वह बूढ़ी काकी से दुव्र्यवहार करते समय डरती थी। 
बुद्धिराम और उसकी पत्नी का व्यवहार बूढ़ी काकी के प्रति दिनोंदिन कठोर होता चला गया यहां तक कि जिस बुढ़िया की जायदाद से सौ-डेढ़ सौ रूपये प्रतिमाह की आमदनी थी, वह भोजन तक के लिए तरसने लगी। बूढ़ी काकी जीभ के स्वाद के आगे विवश होकर रोने-चिल्लाने लगती थी। हाथ-पैरों से लाचार बुढ़िया जमीन पर पड़ी रहती और अपने प्रति उपेक्षा भरे व्यवहार पर चीखती-चिल्लाती। बुद्धिराम के दोनों बेटे भी उसे चिढ़ाने-परेशान करने में खुश होते थे। यहां तक कि वे दोनों उस बुढ़िया के ऊपर अपने मुंह का पानी भी उड़ले देते थे। लेकिन बुद्धिराम की बेटी लाडली बूढ़ी काकीसे बहुत प्यार करती थीं लाडली भाइयों से तंग होकर बूढ़ी काकी की कोठरी में आ जाती थी और चना-चबाना जो कुछ भी होता था, मिल-बांटकर बूढ़ी काकी के साथ खाती थी। 

कुछ समय बाद बुद्धिराम के बेटे मुखराम की सगाई थी जिसमें भाग लेने के लिए काफी मेहमान आए हुए थे। सारे गावं में खुशी का माहौल था। चारपाइयों पर आराम कर रहे मेहमानों की नाई सेवा कर रहे थे। कहीं भाट प्रशंसा में यश-गान कर रहे थे। रूपा को भी औरतों से फुरसत नहीं थी। दौड़-दौड़कर इधर से उधर भाग रही थी। हलवाई भट्टियो पर काम कर रहे थे। कहीं सब्जियां पक रही थीं तो कही मिठाइयां बन रही थीं। खाना पकने की सुगन्धि सारे घर में फैल चुकी थी। भीतर ही भीतर बूढ़ी काकी का मन भी लालचा रहा था। परन्तु वह सोच रही थी कि जब उसे भरपेट भोजन ही नहीं मिलता तो मिठाई ओर कचैड़ी कौन खिलाएगा। रह-रहकर उसकी जीभ लपलपा रही थी। और दिन होता तो वह रो-चीखकर सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती लेकिन अपशकुन के भय से वह चुपचाप बैठी थी। धीरे-धीरे उसका मन बेकाबू होता चला गया। और उकडू बनकर हलवाई के कहाड़े के पास जाकर बैठ गई। अचानक रूपा की नजर बूढ़ी काकी पर पड़ी तो आग बबूला हो उठी और बूढ़ी काकी को खूब भला-बुरा कहा। अपमानित होकर भी बूढ़ी काकी कुछ नहीं बोली और रेगं ती हुई चुपचाप अपनी कोठरी में चली गयी। 

काफी समय बीत जाने के बाद भी बूढ़ी काकी की किसी ने सुध नहीं ली तो उसका मन बेचैन हो उठा। तरह-तरह के विचार उसके मन में आने लगे। सभी लोग खा-पी चुके होंगे। तेरी याद किसी को नहीं आएगी। इसी बीच उसकी भूख जोर पकड़ने लगी और हाथो के बल सरकती हुई लोगों के बीच जाकर पत्तल पर बैठ गयी। लोग आश्चर्य से देख ही रहे थे कि बुद्धिराम की नज़र उस पर पड़ गयी। उस दयनीय बूढ़ी काकी को बुद्धिराम ने दोनों हाथों से उठाकर कोठरी में लाकर पटक दिया और खूब भला-बुरा कहा। वह यह भूल गया कि आज उसे जो सम्मान मिल रहा है, वह सब बूढ़ी काकी की संपत्ति के कारण ही है। 

रह-रहकर बूढ़ी काकी स्वयं को कोसती रही। कभी सोचती कि वहां नहीं जाना चाहिए था। बिना खाए मैं मर तो नहीं जाती। इतना दुव्र्यवहार होने पर भी बूढ़ी काकी का मन दावत में रखा हुआ था। कभी कचैड़िया याद आतीं तो कभी स्वादिष्ट रायता, लेकिन लाड़ली के अलावा बूढ़ी काकी के प्रति किसी के मन में कोई सहानुभूति नहीं थी। 

रात के ग्यारह बज चुके थे। सभी मेहमान आराम कर रहे थे। हारी-थकी रूपा भी सो चुकी थी, लेकिन लाडली थी जो जाग रही थी। वह उस समय की प्रतीक्षा में थी जब अपने हिस्से का मिला हुआ खाना बूढ़ी काकी को जाकर खिलाए। रूपा को पता लगने पर पिटाई होने का डर था। माँ को सोता देखकर लाडली चुपके से अपने हिस्से की पूड़िया लेकर काकी के पास पहुंची। बेसब्री से इंतजार कर रही बुढ़िया एक ही झटके में सब खा गयी परन्तु इससे उसकी भूख और बढ़ चुकी थी। उसने लाड़ली से मेहमानों के भोजन करने के स्थान पर ले चलने को कहा परन्तु वहां पड़े टुकड़ों को चुन-चुनकर खाने के बाद भी उसकी भूख नहीं मिटी। अंत में उसने लाडली से जूठी पत्तलों के पास ले चलने को कहा। इसी बीच रूपा की आंख खुल चुकी थी। लाडली को अपने पास न पाकर रूपा ने इधर-उधर देखा तो वह पत्तलों के पास खड़ी थी। रूपा बूढ़ी काकी को पत्तलों की जूठन चाटते देखकर आत्मग्लानि एवं पश्चाताप से भर उठी। आज उसे अपने किये पर भारी पछतावा हो रहा था। उसकी सोई आत्मा जाग उठी थी। आज उसने बूढ़ी काकी को धमकाया नहीं अपितु उठकर साथ चलने को कहा। उसने सोचा जिस बुढ़िया की जायदाद से हमें इतनी आमदनी हो रही है, उसके लिए मैं भरपेट भोजन भी नहीं दे सकी। 
ईश्वर से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगती हुई रूपा अपने कमरे में गयी और पकवान तथा मिठाई का थाल लेकर बूढ़ी काकी के पास पुहंची। कहानीकार कहता है कि भोजन के उस थाल को देखकर काकी का मन आनन्दित हो उठा। रूपा ने बड़े ही प्यार से भोजन करने के लिए कहा और विनती की कि वह ईश्वर से प्रार्थना कर दे कि वह हमारा अपराध क्षमाकर दे। बूढ़ी काकी को उस समय स्वर्गिक आनन्द की अनुभूति हो रही थी।

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