Wednesday, 12 December 2018

बूढ़ी काकी’ कहानी की समीक्षा कीजिए। Boodhi Kaki ki Samiksha

बूढ़ी काकी’ कहानी की समीक्षा कीजिए। Boodhi Kaki ki Samiksha

Boodhi Kaki ki Samiksha
हिन्दी कहानीकारों में मुंशी प्रेमचन्द का प्रमुख स्थान है क्योंकि उनकी कहानियों में समाज के निम्न वर्ग को प्रमुखता से चित्रित किया गया है। साथ ही उन्होंने ऐसे विषयों को कहानी की कथावस्तु में शामिल किया है, जो सर्व-साधारण से जुड़े हुए हैं। मानव-समाज और जीवन की यथार्थ स्थिति का चित्रण प्रेमचन्द की कहानियों में जीवंत बन पड़ा है। साहित्य-समीक्षकों ने कहानी-कला के जो छह तत्व - कथानक, पात्र एवं उनक चरित्र-चत्रिण, कथोपकथन या संवाद, देशकाल या वातावरण, उद्देश्य तथा भाषा-शैली निर्धारित किये हैं, उनके आधार पर मुंशी प्रेमचन्द की कहानी ‘बूढ़ी काकी’ की समीक्षा इस प्रकार की जा सकती है-

1. कथानक या कथावस्तु - कथानक कहानी का मूल तत्व माना गया है, क्योंकि इसके अभाव में कहानी-लेखन संभव ही नहीं है। यह ठीक है कि कहानी का कथानक अन्य गद्य-विधा उपन्यास के कथानक की उपेक्षा संक्षिप्त होता है, लेकिन उसकी मौलिक प्रस्तुति एवं शिल्पगत नवीनता पाठक के मन में जिज्ञासा और कौतूहल की भावना जगाने में सक्ष्म होती है।
मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखित कहानी ‘बूढ़ी काकी’ का कथानक सामाजिक समस्या पर केन्द्रित होते हुए भी रोचक, जिज्ञासापूर्ण, उत्सुकता भरा, करूणामय तथा प्रभावोत्मकता से परिपूर्ण है। इसमें कहानीकार ने बूढ़ी काकी के माध्यम से कथानक का सृजन करते हुए मानव की स्वार्थी और कृतध्नतापूर्ण मानसिकता का चित्रण किया है। पंडित बुद्धिराम और उसकी पत्नी के घृणित व्यवहार का वर्णन कर लेखक बूढ़ी काकी के प्रति सहानुभूति पैदा करने में भी सफल रहा है। साथ ही उनकी बेटी लाडली को बुढ़िया के प्रति सहानुभूति रखने वाली बताकर कथानक को एकपक्षीय नहीं होने दिया है। कथानक की पूर्णता बुद्धिराम की पत्नी द्वारा बूढ़ी काकी को जूठन चाटते हुए देखने पर उत्पन्न आत्मग्लानि एवं पछतावे के साथ कर प्रेमचन्द ने समाज में सुधार की भावना लाने की कोशिश करते हैं। वह ईश्वर से भी डरती है और बूढ़ी काकी से प्रार्थना करती है कि वह भोजन कर ईश्वर से उन्हें क्षमाकर देने की प्रार्थना कर दे। कहने का अभिप्राय है कि ‘बूढ़ी काकी’ की कथावस्तु क्रमशः विकसित होती है और सम्पूर्ण होती है। साथ ही उसकी कथा मानव के मन और हृदय को झकझोरने में सक्षम रही है। समाज और मनोविज्ञान के स्तर पर लिखी गयी यह कहानी कथानक की दृष्टि से एक सफल कहानी मानी जा सकती है। 

2. पात्र एवं उनका चरित्र-चित्रण - मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखित कहानी ‘बूढ़ी काकी’ में पात्रों की संख्या भले ही कम है लेकिन वे अपने दायित्व-निर्वाह के प्रति सजग रहे हैं। उनका आचरण एवं व्यवहार समाज की यथार्थ स्थिति का आकंलन करने में सफल रहा है। ‘बूढ़ी काकी’ नामक कहानी में बूढ़ी काकी मुख्य पात्र रूप में सामने आती है और सारी कहानी उसी के आसपास घूमती रहती है। एक ओर कहानीकार ने उसकी वृद्धावस्था की ओर संकेत किया है तो दूसरी ओर स्वादिष्ट भोजन को उसकी कमजोरी बताया है। उसके आचरण में किसी प्रकार का छल या बनावटीपन नहीं है। इसके बाद पंडित बुद्धिराम दूसरा मुख्य पात्र है, जो बूढ़ी काकी का भतीजा है। पैसों का लालची है और बातें करने में काफी तेज और चालाक है। कहानी में उसका चरित्र स्वार्थी आरै लोभी का है, जो बूढ़ी काकी की जायदाद तो अपने नाम लिखवा लेता है। बाद में उसे रोटी भी नहीं खिलाता। यहां तक कि अपमानित और बेइज्जत भी करता है। तीसरी मुख्य पात्रा रूपा है, जो बूढ़ी काकी के भतीजे पंडित बुद्धिराम की पत्नी है। स्वभाव में तीखापन है, परन्तु भगवान से डरती है। प्रारम्भ में बूढ़ी काकी के प्रति उसका व्यवहार अपमान और प्रताड़ना से भरा रहता है, लेकिन बूढ़ी काकी को जूठी पŸालें चाटते देखकर उसके भीतर आत्मग्लानि और पछतावे का भाव जाग्रत हो उठता है। अपनी भूल को स्वीकार करती है और बूढ़ी काकी को भोजन कराती है। ईश्वर से भी अपराध क्षमा करने की प्रार्थना करती है। इनके अलावा इस कहानी में पंडित बुद्धिराम के दो बेटे भी हैं, जिनका व्यवहार बूढ़ी काकी के प्रति शरारत से भरा हुआ है। कहानी में एक लाडली नाम की पात्रा है, जिसके मन में बूढ़ी काकी के प्रति पूर्ण सहानुभूति है। काकी को भी उससे लगाव था। लाडली अपने भाइयों से बचकर बूढ़ी काकी को कोठरी में ही पहुंचती थी। इस तरह पात्र एवं उनके चरित्र-चित्रण की दृष्टि से बूढ़ी काकी एक सफल कहानी है। 
3. कथोपकथन या संवाद-योजना - कथोपकथन कहानी की रीढ़ होते हैं। इनसे ही कहानी में स्वाभाविकता एवं वास्तविकता का भाव आता है। यद्यपि ‘बूढ़ी काकी’ नामक कहानी में पात्रों के पारस्परिक संवाद कम ही हैं, लेकिन मन ही मन बात कहना या आत्म-वार्तालाप इस तत्व को पुष्ट करने में सक्षम रहा है। बूढ़ी काकी, बुद्धिराम और रूपा जब भी बोलते हैं, दूसरा पात्र चुप रहता है। कुछ भी नहीं बोलता, लेकिन बूढ़ी काकी और लाडली का वार्तालाप अवश्य इस दृष्टि से देखा जा सकता है, जैसे-
बूढ़ी काकी - क्या तुम्हारी अम्मा ने दी हैं?
लाडली ने कहा - नहीं, यह मेरे हिस्से की हैं।
लाड़ली ने पूछा - काकी पेट भर गया।
काकी बोली - नहीं बेटी जाकर अम्मां से और मांग लाओ।
लाडली ने कहा - अम्मां सोती हैं, जगाऊंगी तो मारेंगी। 

4. देशकाल या वातावरण - कोई भी कहानी समय के अनुसार प्रासंगिक है या नहीं, इसका निर्णय कहानी में चित्रित देशकाल और वातावरण के आधार पर किया जाता है। इससे कहानी की विश्वसनीयता भी बनती है। मुंशी प्रेमचन्द ने अपनी इस कहानी में एक ऐसे सामाजिक वातावरण का दृश्य खड़ा किया है, जो एक अकेली बूढ़ी काकी के जीवन में ही नहीं, कितने ही वृद्धों के जीवन में ऐसा होता है। ‘बूढ़ी काकी’ नामक कहानी में देशकाल सजीवता किये हुए है। भले ही वह पण्डित बुद्धिराम और रूपा द्वारा उसे अपमानित और प्रताड़ित करने का हो, सगाई-तिलक समारोह का हो, जूठी पत्तल चाटने का हो या रात्रि के वातावरण का; कहानी का वातावरण प्रभावोत्पादक रहा है। जैसे ही रूपा स्वादिष्ट पकवानों से भरा हुआ थाल लके र बूढ़ी काकी के सामने आती है, उस वातावरण का चित्रण तो मन को रोमांचित कर देता है।
5. उद्देश्य - कहानी ही नहीं, मानव का प्रत्येक कर्म कोई न कोई उद्देश्य लिए रहता है। कहानी का उद्देश्य केवल पाठक या श्रोता के मन को आनन्दित करना ही नहीं होता, अपितु जीवन से जुड़ी किसी न किसी समस्या की ओर ध्यान खींचना होता है। उसका एक निश्चित लक्ष्य होता है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानी ‘बूढ़ी काकी’ एक उद्देश्यपूर्ण कहानी है। इसमें कहानीकार ने बुद्धिराम जैसे लालची और स्वार्थी लोगों के प्रति समाज में घृणा की भावना पैदा की है और बूढ़ी काकी जैसे वृद्धों के प्रति मानवता का व्यवहार जगाया है। लेखक ने वृद्धों के स्वभाव में खान-पान की प्रवृति दिखाकर बूढ़ी काकी को दोषयुक्त सिद्ध किया है। कहानी का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है कि वृद्धजनों के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार अनुचित है। इस प्रकार बूढ़ी काकी सोद्देश्य कहानी है। 

6. भाषा-शैली - भाषा-शैली भावभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। भाषा के अभाव में या उसकी सम्यक प्रस्तुति के अभाव में कथ्य को उजागर करना कठिन हो जाता है। मुंशी प्रेमचन्द की भाषा सर्वथा पात्र, देशकाल एवं विषयवस्तु के अनुरूप रही है। यही कारण है कि उनकी कहानियों की भाषा-शैली व्यावहारिक अधिक होती है। साधारण से साधारण पाठक भी उनकी भाषा को समझने में सफल रहता है। शैली की दृष्टि से भी मुंशी प्रेमचन्द की कहानी ‘बूढ़ी काकी’ सफल कहानी है। पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे सब कुछ आँखों के सामने ही घटित हो रहा है। वर्णनपरक शैली भावात्मकता के साथ-साथ चित्रात्मकता की प्रवृति लिये रही है। कहावतों एवं मुहावरों का प्रयोग प्रेमचन्द की भाषा-शैली को और भी स्वाभाविक बनाने में सक्षम रहा है। 

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