Sunday, 27 October 2019

स्वप्नवासवदत्ता नाटक का सारांश - Svapnavasavadatta summary in Hindi

Svapnavasavadatta summary in Hindi : In this article, you will get स्वप्नवासवदत्ता नाटक का सारांश which is written by Mahakavi Bhasa of sanskrit language.

स्वप्नवासवदत्ता नाटक का सारांश - Svapnavasavadatta summary in Hindi

स्वप्नवासवदत्तम नाटक की कथावस्तु का मूल आधार वत्सराज उदयन से संबंधित लोककथा है। महाकवि भास ने अपनी प्रतिभा एवं कल्पना शक्ति के आधार पर लोक प्रसिद्ध उदयन की कथा को नाटकीय रूप प्रदान कर छ: अंकों के एक सर्वश्रेष्ठ नाटक “स्वप्नवासनदत्तम्" की रचना की। इस नाटक की कथावस्तु को अंकानुसार संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।

    स्वप्नवासवदत्ता नाटक के प्रथम अंक का सारांश

    इस नाटक का प्रारंभ "नान्द्यन्ते तत्रः प्रविशति सूत्रधारः” इसी क्रम से होता है। सूत्रधार रंगमंच पर आकर प्रार्थना करता है कि बलराम जी की भुजाएँ दर्शकों की रक्षा करें। अनन्तर वह कुछ कहना ही चाहता है कि नेपथ्य में "हटो हटो' की आवाज होती है। उसे ध्यान से सुनने के बाद वह कहता है, अरे! यह तो मगध राजकुमारी के नौकर तपस्वियों को हटा रहे हैं। इतना कहकर वह चला जाता है। Read also : स्वप्नवासवदत्ता नाटक की समीक्षा

    इसके बाद अमात्य यौगन्धरायण परिव्राजक के वेष में तथा वासवदत्ता आवन्तिका के वेष में दिखाई पड़ते हैं। मगध नरेश दर्शक की माता तपोवन में निवास कर रही है उसी को देखने के लिए मगधेश्वर की बहिन पद्मावती आ रही है। इसी समय पद्मावती का कन्चुकी घोषणा करता है कि जिसे कुछ माँगना हो वह आये तथा राजकुमारी से माँगे, वहाँ के तापसों में से कोई याचना नहीं करता पर यौगन्धरायण आगे बढ़कर कहता है कि "यह मेरी भगिनी है, इसका आप संरक्षण करें।" पद्मावती कन्चुकी के द्वारा अपनी स्वीकृति देती है। इस पर यौगन्धरायण अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है।

    इसी समय वत्सदेश के लावाणक ग्राम से एक ब्रह्मचारी वहाँ आता है। वह तापेवन के लोगों को वासवदत्ता के वियोग से दुःखी राजा उदयन का वृत्तान्त बतलाता है। वह कहता है कि पत्नी के विरह से उसकी अवस्था अत्यन्त शोचनीय हो गई है परन्तु मंत्री रूमण्वान् उनका अच्छी प्रकार से संरक्षण कर रहा है। ब्रह्मचारी यह सुनाकर वहाँ से चला जाता है। इसके बाद पद्मावती से आज्ञा पाकर यौगन्धरायण के चले जाने के बाद तापसी से अनुरूप पति की प्राप्ति का आशीर्वाद लेकर पद्मावती वासवदत्ता एवं अपने परिवार के साथ प्रस्थान कर देती है। Read also : वासवदत्ता का चरित्र चित्रण

    स्वप्नवासवदत्ता नाटक के द्वितीय अंक का सारांश

    इस अंक के प्रारंभ में पद्मावती तथा वासवदत्ता कन्दुक खेलती दिखाई देती हैं वासवदत्ता पद्मावती के साथ परिहास भी कर रही है। पद्मावती को वह महासेन की होने वाली वधू कहती है। इसी समय चेटी कहती है कि भर्तृदारिका पद्मावती उसके साथ सम्बन्ध नहीं चाहती। वह वत्सराज उदयन को चाहती है, क्योंकि वह बड़ा दयालु है। इसी समय धात्री का आगमन होता है। वह कहती है कि पद्मावती उदयन को दे दी गई है। वासवदत्ता को यह सुनकर ठेस लगती है तथा सहसा कह उठती है कि यह तो बड़ा बुरा हुआ। यद्यपि मनोवेग के कारण वह बोल जाती है परन्तु बाद में समाधान करते हुए कहती है कि पहले तो वह अपनी स्त्री के लिए इतना उन्मत्त था तथा अब विरक्त हो गया। इसी समय एक चेटी आकर कहती है कि आज ही मंगल-मुहूर्त है अतः शीघ्रता कीजिए । धात्री के साथ सभी चली जाती हैं। 

    स्वप्नवासवदत्ता नाटक के तृतीय अंक का सारांश

    अंक के प्रारंभ में वासवदत्ता चिन्ताकुला दिखाई देती है। उसे बड़ा दुःख है कि वत्सराज उदयन भी अब दूसरे के हो गये । वह तर्क-वितर्क कर ही रही थी कि पुष्पों को लेने वहां एक चेटी पहुंचती है। वह उससे पद्मावती के लिए विवाहमाला (वरमाला) गूंथ देने के लिए अपनी महारानी का संदेश सुनाती है। विवशतः वासवदत्ता माला गूंथने लगती है। परन्तु उस माला में वह अविधवाकरण औषध को ही गूंथती है, सपली मर्दन को नहीं। इसी समय दूसरी दासी आकर हार को ले जाती है। इधर वासवदत्ता उदयन के द्वितीय विवाह को सुनकर दुःखी होती है तथा दुःख भुलाने के उद्देश्य से शयनागार में चली जाती है। 

    स्वप्नवासवदत्ता नाटक के चतुर्थ अंक का सारांश

    राजकीय उपवन का दृश्य है। उपवन में पद्मावती वासवदत्ता तथा एक दासी बैठी है। इसी समय उदयन और विदूषक भी वहां आ जाते हैं। उन्हें देखकर पद्मावती व वासवदत्ता दोनों लतामण्डप में चली जाती हैं। राजा और विदूषक शरत्कालीन सूर्य की धूप से व्याकुल होकर लतामण्डप में प्रवेश करना चाहते हैं परन्तु दासी भंवरों से व्याप्त अवलम्बन लता को हिलाकर उन्हें रोक देती है। Read also : पद्मावती का चरित्र चित्रण

    अतः वे लतामण्डप के बाह्य भाग में बैठकर परस्पर वार्तालाप करते हैं। वहां विदूषक राजा से पूछता है – 'आप को तब वासवदत्ता अधिक प्रिय थी या अब पद्मावती?' राजा प्रारंभ में टालने का प्रयास करता है परन्तु अधिक आग्रह करने पर रूप, गुण और सौन्दर्य द्वारा पद्मावती की प्रशंसा करता है, साथ ही वह यह भी कहता है कि वह वासवदत्ता में अनुरक्त मेरे मन को खींच नहीं पाती है। यह सुनकर वासवदत्ता को परम प्रसन्नता होती है तथा राजा के दाक्षिण्य की पद्मावती भी प्रशंसा करती है। इसके बाद राजा विदूषक का मत पूछता है कि उसे कौन प्रिय है, इस प्रकार पारस्परिक वार्तालाप में वासवदत्ता का शोक उमडने के कारण राजा की आंखों में आंसू आने लगते हैं। विदूषक मुंह धोने के लिए पानी लाने जाता है। इधर अवसर पाकर वासवदत्ता पद्मावती को राजा के पास भेजकर स्वयं वहां से खिसक जाती है। विदूषक के लौटने पर पद्मावती उससे राजा के आंसू आने का कारण पूछती है। वह चतुरता से रहस्य छिपाते हुए उत्तर देता है कि आंखों में काश पुष्प का पराग पड़ जाने से आंसू आ गये। तब पद्मावती जल से राजा का मुखमार्जन कराती है। इसके बाद राजा को प्रणय संकट से बचाने के लिए विदूषक स्मरण दिलाता है कि उनको तो मगधराज के सम्मानार्थ एक उत्सव में जाना है, अतः शीघ्रता करनी चाहिए। राजा भी उसके प्रस्ताव का समर्थन कर वहां से प्रस्थान कर देता है। 

    स्वप्नवासवदत्ता नाटक के पंचम अंक का सारांश

    पंचम अंक में ज्ञात होता है कि पद्मावती शीर्षवेदना से पीड़ित है। इसकी सूचना राजा तथा वासवदत्ता को प्राप्त होती है। राजा अपनी रोग पीड़ित पत्नी के औषधोपचार के लिए शीघ्रता से समुदगृहक जाते हैं। परन्तु वहां शय्या को रिक्त पाते हैं। वे उसकी प्रतीक्षा में शय्या पर स्वयं लेट जाते हैं। विदूषक उन्हें कहानी सुनाने लगता है। कहानी सुनते-सुनते उन्हें नींद आ जाती है। विदूषक प्रावारक लाने के लिए वहां से चला जाता है। इसी समय वासवदत्ता वहां आ जाती है। वह उदयन को सोया हुआ देखकर उसे पद्मावती समझती है तथा पार्श्व में लेट जाती है। उदयन स्वप्न में वासवदत्ता का नाम लेकर बोलने लगता है। वासवदत्ता को पता लगता है कि यह पद्मावती नहीं अपितु उदयन है। वह पलंग से उठ जाती है तथा अपने प्रियतम का मुंह निहारते हुए उसकी नीचे लटकती हुयी भुजा को धीरे से शय्या पर रखकर बाहर चली जाती है।

    प्रियतमा के हाथ का स्पर्श पाकर राजा उठ जाता है तथा उसे पकड़ने के लिए लपकता है परन्तु दरवाजे से टक्कर खाकर गिर पड़ता है। इसी समय विदूषक वहां आ जाता है। उदयन उससे कहता है कि उसने वासवदत्ता का दर्शन कर लिया है। पर विदूषक इसे स्वप्न अथवा माया बतलाता है। उदयन कहता है कि यदि यह स्वप्न है तो स्वप्न ही सदैव बना रहे क्योंकि जागरण से यही अधिक हितकर है। उनके बातचीत करते समय ही मगधराज का काचुकीय वहां आता है तथा कहता है कि आपका अभात्य रूमण्वान् आरूणि नामक शत्रु पर चढ़ाई करने जा रहा है। आप शीघ्र तैयार हों। इस प्रकार संदेश पाकर राजा युद्धोचित उत्साह दिखलाते हुए लड़ाई के लिए प्रस्थान कर देता है।

    स्वप्नवासवदत्ता कहानी के षष्ठम अंक का सारांश

    षष्ठम अंक में महासेन का कंचुकी रैम्य तथा वासवदत्ता की धात्री वसुन्धरा अवन्ती से उदयन से भेंट करने के लिए आती हैं। प्रतिहारा से यह भी सूचना मिलती है कि किसी व्यक्ति ने नर्मटातटीय जंगल में घोषवती नामक वीणा प्राप्त की थी जिसकी ध्वनि को सुनकर महाराज ने उसे मंगा लिया है तथा वासवदत्ता का स्मरण कर विलाप कर रहे हैं। उदयन को महासेन के यहां से कांचुकीय तथा धात्री के आने की सूचना दी जाती है। वह पद्मावती के साथ उनसे भेंट करता है। महासेन की महिषी अंगाखती का संदेश सुनाते हुए धात्री कहती है कि महारानी ने कहा है कि "तुम्हारा और वासवदत्ता का संबंध तो हम लोगों को अभीष्ट था ही, पर तुम चपलतावश शीघ्र ही भाग गये। तुम्हारे जाने पर हम लोगों ने चित्रफलक के सहारे तुम दोनों का विवाह कर दिया। अब इस चित्रफलक को लेकर धैर्य धारण करो।" उस चित्रफलक को देखकर पदमावती कहती है कि ऐसी ही एक स्त्री मेरे पास है जिसे एक ब्राहमण ने प्रोषितपतिका कहकर न्यास के रूप में रखा है। उसका नाम अवन्तिका है। यह सुनकर राजा उसें बुला लाने की आज्ञा देता है। Read also : राजा उदयन का चरित्र चित्रण

    इसी बीच योगन्धरायण अपनी धरोहर वापस लेने के लिए उपस्थित हो जाता है। अवन्तिका के वेष में वासवदत्ता जब वहां लाई जाती है तो उसकी धाई वसुन्धरा उसे पहचानकर कहती है - "अरे! यह तो वासवदत्ता है।" इस पर राजा अपनी आज्ञा से उसका चूंघट हटवाता है। अवसर देखकर यौगन्धरायण भी अपना कल्पित वेश हटाकर राजा का जयघोष करता है। वासवदत्ता भी उसके स्वर में स्वर मिलाती है। यौगन्धरायण राजा के पैरों में गिर पड़ता है। पद्मावती भी अविनय के लिए वासवदत्ता से क्षमा मांगती है। वत्सराज उदयन के द्वारा इस प्रपन्च का रहस्य पूछे जाने पर यौगन्धरायण बताता है कि दैवज्ञों ने आपका पद्मावती के साथ परिणय बताया था। अतः यह परिणय तथा मगधराज के साहाय्य से वत्सभूमि की प्राप्ति दोनों ही कार्य सिद्ध हो गये। इसके बाद महासेन को यह प्रिय संवाद सुनाने के लिए पद्मावती के साथ सभी लोग उज्जयिनी जाने के लिए प्रस्तुत होते हैं। भरतवाक्य के साथ नाटक समाप्त हो जाता है। 

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