Tuesday, 29 October 2019

राजा उदयन का चरित्र चित्रण - स्वप्नवासवदत्तम्

राजा उदयन का चरित्र चित्रण - स्वप्नवासवदत्तम्

राजा उदयन का चरित्र चित्रण – महाकवि भास द्वारा रचित 'स्वप्नवासवदत्तम्' का नायक उदयन है। वह वत्सदेश का राजा है। नाटककार ने जिस रूप में उदयन का प्रस्तुतीकरण इस नाटक में किया है, उससे उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएं व्यक्त हुई हैं - 

धीरललित नायक – नाट्यशास्त्रीय ग्रंथों में जो नायक के भेद प्रस्तुत किये गये हैं, उस वर्गीकरण के अन्तर्गत उदयन धीरललित नायक की श्रेणी में आता है। दशरूपक के रचयिता आचार्य धनन्जय के अनुसार धीरललित नायक “निश्चिन्तो धीरललितः कलासक्तः सुखी मृदुः।" अर्थात् धीरललित नायक प्रकृति से निश्चिन्त, कला प्रेमी व मृदु स्वभाव का होता है। ये सभी गुण उदयन में विद्यमान हैं। निश्चिन्त तो वह इतना है कि सम्पूर्ण राज्यभार पूर्णतः मंत्रियों पर छोड़ देता है। कलापरायणता के विषय में कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। उसकी वीणावादन की प्रसिद्धि सर्वत्र फैल चुकी है। वह प्रकृति से इतना मृदु है कि कहीं भी क्रोध की मुद्रा में दिखाई नहीं देते। Read also : स्वप्नवासवदत्ता नाटक का सारांश

रूपवान – राजा उदयन अत्यन्त रूपवान है। उसके रूप की प्रशंसा सभी समानरूपेण करते हैं। द्वितीय अंक में वासवदत्ता उसे दर्शनीय कहती है तो तृतीय अंक में चेटी उसे शरचापहीन कामदेव कहती है। उसके सौन्दर्य के कारण उज्जयिनी के सभी लोग आकर्षित है। 

विविधगुण सम्पन्न - उदयन विविध गुणों से युक्त है। वह रूपवान होने के साथ-साथ समुद्र के समान गंभीर एवं धीर प्रकृति का है। वह सुशीलता की प्रतिमूर्ति है। उसका हृदय अत्यन्त कोमल तथा दृढ़ निश्चयी है। वह मृगया प्रेमी है। वह दाक्षिण्य गुण से युक्त है। इसी दाक्षिण्य गुण के कारण अपने वासवदत्ता के प्रति प्रेम को वह पद्मावती के सामने प्रकट नहीं होने देता। Read also : स्वप्नवासवदत्ता नाटक की समीक्षा

आदर्श पत्नीव्रत - उदयन का पत्नीव्रत उल्लेखनीय है। उसका अपनी पत्नी के प्रति प्रेम बड़ा ही अचल एवं निष्कपट है। जब उसकी प्रियतमा वासवदत्ता के अग्नि में जल जाने का प्रवाद प्रसारित हो जाता है तथा यह समाचार जब उदयन तक पहुँचता है तो वह इतना व्यथित एवं उन्मत्त हो जाता है कि स्वयं को भी उसी अग्नि में भस्मसात् कर देना चाहता है। मन्त्रियों द्वारा रोके जाने पर वह वासवदत्ता के आभूषणों को छाती से लगा कर मूर्च्छित हो जाता है। उसके इस अनन्य प्रेम का वर्णन करते हुये ब्रह्मचारी को भी कहना पड़ता है
"नैवेदानीं तादृशाश्चक्रवाका नैवाप्यन्ये स्त्रीविशेषैर्वियुक्ता।" 
पद्मावती से विवाहोपरान्त भी वासवदत्ता को नहीं भूलते हैं, उसकी स्मृति उसे सदैव बनी रहती है। विदूषक जब उससे दोनों के विषय में पूछता है तब वह स्पष्टतया कहता है -
'पद्मावती बहुमता मम यद्यपि रूपशीलमाधुर्यैः
वासवदत्ताबद्धं न तु तावन्मे मनो हरति ।। 
जब पदमावती के बीमार होने का समाचार उसे मिलता है तो वह तुरन्त समुद्रग्रह में पहुंचता है। जब स्वप्नावस्था में वासवदत्ता के स्पर्श-सुख की अनुभूति होती है तो वह रोमांचित हो जाता है तथा उसके पीछे दौड़ता हुआ दरवाजे से टकरा जाता है। वह उसके जीवित होने की बात विदूषक को कहता है। विदूषक इसे स्वप्न में देखना बतलाता है। तब उदयन कहता है 'यदि यह स्वप्न था तो मेरा न जागना ही अच्छा था, और यदि यह मतिभ्रम है तो मेरा (यह मतिभ्रम) चिरकाल तक बना रहे -
"यदि तावदयं स्वप्नो धन्यमप्रतिबोधनम्।
अथायं विभ्रमो वा स्यात् विभ्रमो ह्यस्तुमेचिरम् ।। 
इसका मतलब यह नहीं कि वह पद्मावती से कम प्रेम करता है। पद्मावती के प्रति भी उसका प्रगाढ़ प्रेम है। वह उसके सिर के दर्द की बात सुनकर व्याकुल हो जाता है तथा मन में अनेक प्रकार की आशंकायें करते हुये कहता है -
'रूपश्रियां समुदितां गुणतश्च युक्तां 
लब्ध्वाप्रियां यम तु मन्द इवाद्य शोकः ।
पूर्वाभिघातसरुजोऽप्यनुभूतदुःखः
पद्मावतीमपि तथैव समर्थयामि ।। 
इस प्रकार एक आदर्श प्रति के रूप में उसका चरित्र नाटक में उभरकर सामने आया है। Read also : पद्मावती का चरित्र चित्रण

वीर एवं व्यवहार कुशल – यद्यपि वह धीर ललित नायक है तथापि उसमें शौर्य का अभाव नहीं है। पञ्चम अंक के अन्त में जब उसे सूचना मिलती है कि रूमण्वान् ने आरूणि पर आक्रमण कर दिया है तब वह वीरोचित शब्दों में कहता है
"उपेत्य नागेन्द्र तुरंगतीर्णं तमारूणिं दारूणकर्मदक्षम्
विकीर्ण बाणोग्रतरंग ड्गे महार्णवाभे युधि नाशयामि ।। 
उक्त वाक्य एक वीर एवं साहसी व्यक्ति ही बोल सकता है भीरू अथवा विलासी नहीं। उदयन की पराक्रमता एवं उत्साह सम्पन्नता का उल्लेख कंचुकी भी करता है
"कातराः येऽप्याशक्ता वा नोत्साहस्तेषुजायते।
प्रायेण हि नरेन्द्र श्रीः सोत्साहैरवे भुज्यते।।' 
उदयन व्यवहार कुशल एवं गुरूजनों के प्रति आदर सत्कार की भावना रखने वाला है। जब महासेन तथा अंगारखती के यहाँ से आया ब्राह्मण तथा धात्री सन्देश सुनाती है, तो 'क्या आज्ञा है' यह कहकर आसन से उठा जाता है। जो व्यक्ति किसी के आदेश को सुनने के लिए आसन से उठ जाता है, वह गुरुजनों के प्रत्यक्ष में उपस्थित होने पर कितना आदर सत्कार करेगा – यह सहज अनुमेय है।

अवन्तिका को लौटाने के समय साक्षियों की नियुक्ति करना उसके व्यावहारिक ज्ञान को व्यक्त करती है। इसी प्रकार वासवदत्ता के पिता महासेन जी को वह अपने पिता तुल्य ही मानता है तथा अपने ऊपर उनकी महान् कृपा का उल्लेख करता है, जो बड़ों के प्रति उनके सम्मान भाव को प्रकट करता है -
'अहमवजितः पूर्वं तावत् सुतैः सह लालितो 
दृढमपहृता कन्या भूयो मया न च रक्षिता। 
निधनमपि च श्रुत्वा तस्यास्तथैव मयि स्वता
ननु यदुचितान् वत्सान् प्राप्तुं न्पोऽत्र हि कारणम् ।। 

विलासप्रिय – राजा उदयन वीर, कला प्रेमी, व्यवहार कुशल है तथापि मनुष्य होने के नाते कुछ कमजोरियाँ उसके चरित्र में हैं। यथा – वह इतना अधिक विलासी एवं कामुक प्रवृत्ति का है कि वासवदत्ता के सौन्दर्य पर आसक्त होकर राज्य तक को खो बैठता है। Read also : वासवदत्ता का चरित्र चित्रण

विवेक की कमी – इसके अलावा उसमें कुछ विवेक की भी कमी है। यही कारण है कि अन्तिम अंक में यौगन्धरायण के विरोध करने पर भी वह वासवदत्ता को भीतर आने के लिए कहता है, यद्यपि उसे उसका पर्ण परिचय नहीं प्राप्त हो सका है। यह उसके सद्यः पर्व के वक्तव्य "परस्परगता लोके दृश्यतो तुल्यरुपता।'' से मेल नहीं खाता। यवनिका प्रक्षेप के बाद ही उसे वस्तुस्थिति का ठीक ज्ञान होता है।

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि उदयन का चरित्र एक नायक के रूप में चित्रित करने में भास को पूर्ण सकलता प्राप्त हुई है। 

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