Tuesday, 12 February 2019

पर्यावरण के प्रति हमारा दायित्व निबंध

पर्यावरण के प्रति हमारा दायित्व निबंध

paryavaran ke prati hamara dayitva
मानव के चारों तरफ प्रकृतिक आवरण या परिवेश। जो भी प्रकृति प्रदत्त चीजें हमारे चारों ओर मौजूद हैं जैसे-वायु, जल, मृदा, वनस्‍पतियां, जीव-जंतु आदि सभी पर्यावरण के घटक हैं। इनसे मिलकर पर्यावरण की रचना होती है। पर्यावरण की ही वृहत्तर अवधारणा को पारिस्‍थितिकी की संज्ञा दी जाती है। इससे जीव और उनके आस-पास के वातावरण में संपूर्ण जैविक और अजैविक संघटकों के अध्‍ययन का बोध होता है। अत: प्रकृति को नष्‍ट करके नष्‍ट करके नहीं, उसे सुरक्षित रखकर जीवन जीना हमारा दायित्‍व है।
स्‍वच्‍छ पर्यावरण को हमारे देश में प्रचीनकाल से वरीयता दी गई है। सच तो यह है कि हमारा भारतीय दर्शन पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से जितना समृ‍द्ध है, उतना किसी अन्‍य देश की नहीं। पर्यावरण संरक्षण का भारतीय दर्शन इतना व्‍यावहारिक है कि यह हमारी जीवन-शैली से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि सभी सामाजिक-सांस्‍कृतिक परंपराओं व प्रथाओं के मूल में कहीं न कहीं पर्यावरण सुरक्षा को महत्‍व दिया गया है। प्राचीनकाल से ही सूर्य, पृथ्‍वी, जल, वायु, अग्‍नि, वनस्‍पतियां, नदियों आदि को पूजनीय मानने की पंरपरा रही है जिसके मूल में पर्यावरण सरंक्षण का ही भाव निहित है। पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जैव-विविधता के संरक्षण का भी प्राचीनकाल में गौरवमयी इतिहास रहा है। पर्यावरण और पारिस्‍थितिकी संकट मौजूदा दौर के ऐसे विषय हैं जिन पर दुनिया भर भी सर्वाधिक बहस हो रही है। यह होना आवश्‍यक भी है क्‍योंकि मानव का प्राकृतिक परिवेश अर्थात पर्यावरण खतरे में है। यह मानवीय सभ्‍यता पर आसन्‍न ऐसा खतरा है जो पूरी की पूरी सभ्‍यता को एक दिन लील सकता है।
औद्योगिक क्रांति के फलस्‍वरूप वैश्‍विक स्‍तर पर विकास की ऐसी दौड़ शुरू हुई कि पर्यावरण का अंधाधुंध नष्‍ट किया जाने लगा बड़ी-बड़ी नदी घाटी परियोजनाएं, जंगल का कटाव, जीवाश्‍म ईंधन का अधिकाधिक प्रयोग, भूगर्भीय जल का दोहन, ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍सर्जन और इसी प्रकार के अन्‍य संकेत कों का अधिकाधिक प्रयोग किया जा रहा है। भारत जैसे विकासशील देश में गरीबी, जरसंख्‍या और बेरोजगारी भी पर्यावरण प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। झूम खेती के कारण वनों का कटान जारी है। जलावन के लिए आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग लकड़ी का ही प्रयोग कर रहे हैं। आदि ऐसे सब कारण हैं जिससे पर्यावरण तथा जैव-विविधता नष्‍ट होने के कगार पर पहुंच गई। औद्योगिक कचरों के प्रवाह से नदियां नालों में बदल रही हैं। ऐसे में पर्यावरण असंतुलन से जुड़ी समस्‍याएं विकराल रूप से सामने आ रही हैं, जैसे ग्‍लोबल वार्मिंग, ओजोन परत की क्षीण होना, सुनामी, भूकंप, धरती के औसत द्रव्‍यमान में वृद्धि, बेमौसम बरसात, बाढ़, बहुत से जलीय तथा स्‍थलीय जीव-जंतुओं का लुप्‍त होना। नयी-नयी बीमारियां आम जन-जीवन को तबाह कर रहे हैं। मानसून में बदलाव भी पर्यावरण प्रदूषण का ही कारण है। यद्यपि यह वैश्‍विक समस्‍या है लेकिन भारत, जो कि एक कृषि प्रधान देश है। यहां के किसानों का भाग्‍य मौसम तक करता है। ऐसे में मानसून का सही समय पर आगमन बहुत ही महत्‍वपूर्ण है।
केवल एक ही धरती है और हमारा सामूहिक भविष्‍य उसी पर टिका है इसलिए पर्यावरण संरक्षण को लेकर वैश्‍विक चेतना जागृत करने के उद्देश्‍य से लगातार प्रयास जारी हैं। जैसे 1972 मानव पर्यावरण सम्‍मेलन, क्‍योटो सम्‍मेलन (1999), पृथ्‍वी सम्‍मेलन (1992), कोप सम्‍मेलन आदि। लेकिन प्रारंभ से लेकर अब तक जो भी विमर्श हुए हैं वे पर्यावरणीय मुद्दों की अनदेखी करते रहे हैं। ये मंच अमीर बनाम गरीब देशों के बीच लड़ाई के लिए जाने जाते हैं। गरीब राष्‍ट्र अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करते हैं और अमीर मनमानी। अत: समय आ गया है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए ईमानदारी से प्रयास किया जाय।
स्‍वतंत्र भारत में विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को कानूनी मान्‍यता दी गयी है। संविधान के अनु. 48(क) (राज्‍य के नीति के निदेशक तत्‍व) मूल कर्तव्‍य अनु. 51 (क) में राज्‍य तथा देश के नागरिकोंसे पर्यावरण तथा जैव-विविधता के संरक्षण की उपेक्षा की गयी है। के.एम. मुंशी द्वारा 1952 में शुरू कियावन महोत्‍सव पर्यावरण संरक्षण की ही एक मुहिम थी। देश में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अन्‍य कई कानून भी हैं। जैसे-राष्‍ट्रीय पर्यावरण नीति 2006, वन्‍य संरक्षण अधिनियम 1972, जल संरक्षण अधिनियम 1988 आदि। वैधानिक प्रावधान के अलावा गैर सरकारी संगठन तथा समाजसेवियों द्वारा भी पर्यावरण संरक्षण के प्रयास लगातार जारी है। जैसे गुग्‍गुल बचाओ अभियान, चिपको आंदोलन, अपिको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन आदि। फिर भी अभी बहुत प्रयास की आवश्‍यकता है। जैसे 33% वन की बजाय अभी मात्र 21.5% वन ही हैं। ऐसे में वनारोपण को बढ़ावा देना है। खेती में रासायनिक खाद के प्रयोग के बजाय जाय। ग्रामीण इलाकों में जलावन के लिए लकड़ी का प्रयोग प्रतिबंधित हो। आदिवासियों से संबंधित जल, जमीन, जंगल के अधिकार के बजाय उन्‍हें मुख्‍यधारा में शामिल किया जाय आदि ऐसे बहुत से उपाय हैं जिनके माध्‍यम से हम अपने पर्यावरण संरक्षण के दायित्‍व का पालन करके अपने जीवन को अधिक सुखी, स्‍वस्‍थ, समृद्ध और प्रकृति के करीब बना सकते हैं। तथा सतत और समावेश विकास को अपना कर भावी पीढि़यों के भविष्‍य को भी सुरक्षित कर सकते हैं।
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उपर्युक्‍त विवेचन से स्‍पष्‍ट है कि मनुष्‍य सभी वस्‍तुओं का मापदंड है। विकास चाहे जितनी ऊंचाई प्राप्‍त कर ले मानव जीवन का विकल्‍प नहीं हो सकता है। अत: समावेशी और सतत विकास के लिए पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारा दायित्‍व अपरिहार्य है। आधुनिक सुख-सुविधओं की बजाय प्रकृतिके करीब रहना समय की मांग है। महान विचारक और माध्‍यमिक प्रौद्योगिकी के प्रवर्तक ई. एफ. शुमाखर के अनुसार पर्यावरणीय क्षति की समस्‍या केवल तकनीकी नहीं है, इसे तो आधुनिक विश्‍व के जीवन चक्र से पोषण मिलता है। हमें ब्रह्मांड और सभी जीव रूपों बल्‍कि समूची प्रकृति के अस्‍तित्‍व के अन्‍तर्संबंधों की अनवार्य अखंडता को समझना होगा। उबंटू के जुलू दर्शन को जिसका अर्थ है आप हैं, तो मैं हूँ को अपनाने का यही उचित समय है।

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