Monday, 11 February 2019

ओजोन परत का क्षरण निबंध - Essay on Ozone Layer Depletion in Hindi

ओजोन परत का क्षरण निबंध - Essay on Ozone Layer Depletion in Hindi

Essay on Ozone Layer in Hindi
ओजोन परत का क्षरण अस्‍थायी विकास का विकट दुष्‍परिणाम है और यह समस्‍या वैश्‍विक स्‍तर पर भी काफी चर्चित है। ओजोन (O3) एक हल्‍के नीले रंग की गैस है, जो समतापमंडल (stratosphere) में धरती से 50 किमी की ऊंचाई तक विभिन्‍न सांद्रताओं में पायी जाती है। 16 से 48 किमी की ऊंचाई तक इसकी अधिकतम सांद्रता होती है। समताप मंडल से नीचे पृथ्‍वी पर ओजोन एक हानिकारक गैस है, जहां यह जानवरों व मनुष्‍यों के लिए प्रदूषक की तरह कार्य करती है। परंतु समतापमंडल में इसकी भूमिका सुरक्षात्‍मक है जहां सूर्य से विमुक्‍त हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्‍वी को एक सुरक्षा कवच उपलब्‍ध कराती है। ये पराबैंगनी किरणें पौधों तथा प्राणियों के लिए घातक होती हैं क्‍योंकि ये उनके आनुवांशिक पदार्थों को प्रभावित कर उत्‍परिवर्तन तथा उनमें अन्‍य विकार उत्‍पन्‍न कर सकती हैं।

मानव के अनियंत्रित विकास ने ओजोन परत को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ओजोन क्षरण के लिए मुख्‍यरूपसे जिम्‍मेदार हैं-क्‍लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) तथा हैलोजन गैसें-क्‍लोरीन, ब्रोमीन आदि। इन्‍हें ओजोन क्षारक तत्‍व (Ozone Depleling Substances –ODS) कहा जाता है। ये मुख्‍यत: क्‍लोरीन के व्‍युत्‍पन्‍न हैं। क्‍लोरीन का एक अणु ओजोन के एक लाख अणुओं को तोड़ सकता है। CFC, हैलोजेंस तथा फ्रेयोन (CFCL3, CF2CL2 आदि) पूर्णत: मानव निर्मित हैं, जिनका व्‍यापक प्रयोग वातानुकूलन, प्रशीतन, एफ्रोसोल, विद्युत व धातु सफाई, फोम फुलाने, अग्‍निशमन आदि मे होता है। ये तत्‍व समतापमंडल में पहुंचकर ओजोन को तेजी से विखंडित कर रहे हैं, जिससे ओजोन छि़द्र/ओजोनरिक्‍तकरण की समस्‍या उत्‍पन्‍न हो गयी है।
ओजोन छिद्र को सर्वप्रथम अंटार्कटिक में 1979 में देखा गया। इसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। शीताष्‍ण कटिबंध को छोड़कर विश्‍व के प्रत्‍येक क्षेत्र में रिक्‍तिकरण देखा जा रहा है।
ओजोन छिद्र की समस्‍या दक्षिणी ध्रुव पर काफी गंभीर है। इसका कारण यह है कि ऊपरी वायुमंडल में उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर हावएं चलाती हैं। फलत: उत्तरी ध्रुव का प्रदूषण दक्षिणी ध्रुव पहुंच जाता है। ध्रुवीय क्षेत्रों में N2O की अनुपस्‍थिति भी ओजोन रिक्‍तता का कारण है। N2O ओजोन भक्षक क्‍लोरीन मोनोऑक्‍साइड को नष्‍ट कर ओजोन क्षरण को रोकता है।

ओजोन क्षरण (रिक्‍तता) के खतरे
मानव-स्‍वास्‍थ्‍यपर दुष्‍प्रभाव- पृथ्‍वी पर पराबैंगनी किरणें अधिक मात्रा में आने पर, सकती है। मनुष्‍य को अनेक बीमारियां हो जाने का खतरा है यथा-त्‍वचा कैंसर, त्‍वचा का जलना, स्‍नो ब्‍लांइडनेस, मोतियाबिंद, चर्मरोग, बुढापा आदि। शरीर को रोगरोधक क्षमता में कमी आ सकती है। डीएनए को भारी नुकसान के कारण जीन स्‍तर पर भी गंभीर क्षति पहुंच सकती है।
समुद्री पानी में ऑक्‍सीजन की कमी हो जाएगी, जिसके कारण फइटोप्‍लैंक्‍टनूस पर बुरा असर पड़ेगा और पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला दुष्‍प्रभावितहो जाएगी।
पराबैंगनी विकिरणों के अधिक मात्रा में आने से भूमंडलीय तापन में वृद्धि हो जाएगी, फलत: भूमंडलीय तापन में उत्‍पन्‍न होने वाले खतरे उत्‍पन्‍न होंगे।
पराबैंगनी विकिरण पौधों में प्रकाश संश्‍लेषण की दर घटा देता है। इससे वानस्‍पतिक उत्‍पदान तंत्र प्रभावित होगा, खाद्य सुरक्षा संकट में पड़ जाएगी।
समतापमंडल में ओजोन की कमी के कारण जब पराबैंगनी किरणें क्षोभमंडल में पहुंचती हैं तो विभिन्‍न अभिक्रियाओं के कारण ओजोन की मात्रामें वृद्धि होने लगती है। क्षोभमंडल में मौजूद ओजोन पशुओं व मानवों के लिए हानिकारक है। एक अनुमान के अनुसार यूरोप के ऊपर क्षोभमंडल में पिछले 100 वर्षों में ओजोन की मात्रा दोगुनी हो गयी है।
प्रकाश रासायनिक धुआँसा (smog) यह धुंए और कोहरे का समायोजन है जो वाहनों से निकले विभिन्‍न रसयानों पर पराबैंगनी विकिरण की अभिक्रिया से बनता है। अधिक मात्रा में पराबैंगनी विकिरण से यह आम हो जाएगा, जिससे परिवहन में दिक्‍कत आएगी और स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी परेशानियां भी होंगी।
पराबैंगनी किरणों भवनों, पेंट पैकेजों तथा कई जगहों पर उपयोग में लाए जाने वाले बहुलकों का विघटन करती हैं।
पराबैंगनी किरणों की अधिक मात्रा धूप की प्रचंडता को काफी बढ़ा देगी।
ओजोन क्षरण रोकने को वैश्‍विक प्रयास
मांट्रियल प्रोटोकॉल (1987) : विकसित देश 1990 तक CFC उत्‍पादन तथा उपभोग को 1986 के स्‍तर पर ले जाएं तथा हैलोजेन्‍स के उत्‍पादन व उपभोग को 1994 तक 1986 के स्‍तर पर ले जाएं।
हेलसिंकी घोषणा (1989) : 2000 तक CFC उत्‍पादन व उपभोग के स्‍तर को घटाना।
लंदन सम्‍मेलन (1990) : विकसित देश 2000 तक तथा विकासशील देश 2010 तक CFC का उत्‍पादन व उपभोग चरणबद्ध तरीके से समाप्‍त करें।
कोपेनहेनगेन सम्‍मेलन (1992) : 1996 तक CFC का, 2000 तक हैलोजन्‍स का, 1996 तक CCL3  का एवं 2030 तक HCFC को समाप्‍त करें।
संयुक्‍त राष्‍ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में Project sky hole patching (PSHP) कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसका उद्देश्‍य है, ODS के व्‍यापार तथा तस्‍करी को रोकना। परियोजना के प्रथम चरण में व्‍यापार व तस्‍करी को रोका जाएगा और दूसरे चरण में अपशिष्‍टों के निस्‍तारण पर बल दिया जाएगा।

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