शरणदाता कहानी की मूल संवेदना - Sharandata Kahani ki Mool Samvedna

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शरणदाता कहानी की मूल संवेदना - Sharandata Kahani ki Mool Samvedna

शरणदाता कहानी की मूल संवेदना: शरणदाता कहानी देश विभाजन की त्रासदी पर लिखी गई हिंदी कहानियों में सर्वोत्कृष्ठ रचना मानी गई है। इस कहानी में एक मुस्लिम युवती अपने परिवार में शरणार्थी बने एक हिंदू की जान बचाती है और अपने ही घर में परिवार के धर्मांध व्यक्तियों द्वारा भोजन में विष दिये जाने के षड़यंत्र को उजागर करके मानवता के उच्च गुणों की प्रतिष्ठा करती है। इस प्रकार शरणदाता कहानी अपनी मूल संवेदना में भारत विभाजन के भयावह दृश्यों एवं घटनाओं को प्रस्तुत करते हुए शरणागत की रक्षा, साम्प्रदायिक सद्भाव, मानवता की सेवा आदि का संदेश देने में पूर्णरूपेण सफल रही है।

देविंदरलाल एक शरणार्थी है, जो रफिकुद्दीन वकील के घर में शरण लेते हैं। वकील साहब शरण देना अपना इन्सानी फर्ज़ मानते है: "मैं तो इसे मेजारिटी का फर्ज़ मानता हूँ कि वह माईनारिटी की हिफाज़त करे और उन्हें घर छोड़-छाड़ कर भागने न दे। हम पड़ोसी की हिफाज़त न कर सके तो मुल्क की हिफाज़त क्या खाक करेंगे ? और मुझे पूरा यकीन है कि बाहर की खैर बात ही क्या, पंजाब में कई हिंदू भी जहां उनकी बहुतायत है, ऐसा ही सोच और कर रहे होंगे। आप न जाइये न जाईए, आपकी हिफाज़त की जिम्मेदारी मेरे सर बस।" 

परन्तु रक्षक ही देविंदरलाल का दुश्मन बन जाता है। वकील साहब पर मुस्लिम फिरकापरस्तों का दबाव पड़ता है। देविंदरलाल इस मकान के पिछवाड़े की कोठरी में पड़ा हुआ कुछ शब्दों को ही पकड़ पाता है। बेवकूफी,गद्दारी, इस्लाम कौम के रहनुमा एक काफिर को खाने में जहर मिलाकर मार देने का फतवा देकर चले जाते हैं। देविंदरलाल को जब खाना भेजा जाता है उसमें तीन फुलकों की तह के बीच कागज की एक पुडिया भी है जिस पर लिखा है : 'खाना कुत्ते को खिलाकर खाईएगा जैबू।" जैबू के माध्यम से लेखक ने इंसानियत का चित्रण किया है। जैबू की होशियारी और इंसानियत को देखकर देविंदरलाल का मन ग्लानि से उमड़ आया। देविंदर का विवेक उद्बुद्ध होकर आगाह करता है : "दुनिया को खतरा बुरे की ताकत के कारण नहीं, अच्छे की दुर्बलता के कारण है। भलाई की साहसहीनता ही बड़ी बुराई है। घने बादल से रात नहीं होती सूरज के निस्तेज हो जाने से होती है।”

 कहानी की मूल संवेदना देविंदरलाल से जुड़ी है। देविन्दर लाल के माध्यम से लेखक ने विभाजन के दौरान लोगों को जान बचाने के लिए जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उसी का चित्रण शरणार्थी कहानी में हुआ है। देविंदरलाल किसी तरह अपनी जान बचाकर भारत आ जाते हैं । एक-डेढ़ महीने के बाद अपने घर का पता लेने के लिए देविंदरलाल अपना पता देकर दिल्ली रेडियो से अपील करवा रहे थे तब एक दिन उन्हें लाहौर की मुहरवाली एक छोटी सी चिट्ठी मिली थी।

"आप बचकर चले गये, इसके लिए खुदा का लाख लाख शुक्र है। मैं मानती हूँ कि रेडियों पर जिनके नाम आपने अपील की है, वे सब सलामती से आपके पास पहुंच जाएं। अब्बा ने जो किया या करना चाहा उसके लिए मैं माफी मांगती हूँ और यह भी याद दिलाती हूँ कि उसकी बात मैंने ही काट दी थी। अहसान नहीं जताती। मेरा कोई अहसान आप पर नहीं है सिर्फ यह इल्तज़ा करती हूँ कि आपके मुल्क में अकलीयत का कोई मजलूम हो तो याद कर लीजिएगा। इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है, इसलिए कि आप इन्सान है।” 

अतः इंसान का पतन चाहे कितना भी हो जाए, परन्तु इंसानियत मरती नहीं है। यह कहानी अज्ञेय जी की धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी दृष्टि का मौलिक दस्तावेज़ है।

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