Tuesday, 1 March 2022

सामाजिक आंदोलन से आप क्या समझते हैं ? सामाजिक आंदोलनों के प्रमुख कारण बताइए।

सामाजिक आंदोलन से आप क्या समझते हैं ? सामाजिक आंदोलनों के प्रमुख कारण बताइए।

    सामाजिक आंदोलन का अर्थ

    सामाजिक आंदोलन का अर्थ है समाज में पतिवर्तन के लिए किया गया आंदोलन। समाज में अनेक परिवर्तन लोगों द्वारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप में प्रयत्नों द्वारा लाये गये हैं। ऐसे प्रयत्नों को सामाजिक आंदोलन की संज्ञा दी जाती है। अतः सामाजिक आंदोलन की परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि "यह एक समग्रता है जो समाज अथवा समूह, जिसका यह अंग है, में परिवर्तन लाने

    अथवा रोकने के लिए कुछ निरन्तरता से कार्य कर रहा है।"लुंडबर्ग एवं अन्य ने सामाजिक आंदोलन की परिभाषा इस प्रकार की है, "यह विशालतर समाज से अभिवृत्तियों, व्यवहार एवं सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन लाने हेत इकट्रे प्रयत्नों में लीन लोगों की ऐच्छिक समिति है।" इस प्रकार, सामाजिक आंदोलन समाज में परिवर्तन लाने के लिए किसी समिति द्वारा प्रयत्न है। सामाजिक आंदोलन किसी परिवर्तन को रोकने के लिये भी किया जा सकता है। कुछ आंदोलनों का उद्देश्य वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के कुछेक पहलुओं को बदलना होता है, जबकि अन्य आंदोलनों का उद्देश्य इसे पूर्णतया परिवर्तित करना होता है। पूर्वोक्त को सुधार-आंदोलन तथा अंतोक्त को क्रांतिकारी आंदोलन कहा जाता है।

    सामाजिक आंदोलन के प्रकार

    सामाजिक आंदोलन विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं, यथा धार्मिक आंदोलन, सुधार आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलन, राजनीतिक आंदोलन आदि।

    सामाजिक आंदोलनों का संस्थाओं से अन्तर स्पष्ट कर देना वांछनीय होगा। प्रथमतया सामाजिक संस्थाएँ संस्कृति के अपेक्षतया स्थायी एवं स्थिर तत्व होती हैं, जबकि सामाजिक आंदोलनों का जीवन अनिश्चित होता है। विवाह एक स्थायी सामाजिक संस्था है, परन्तु परिवार नियोजन आंदोलन का काल निश्चित नहीं है। दूसरे, संस्थाओं को संस्थागत स्थिति प्राप्त होती है। उन्हें संस्कृति का आवश्यक एवं मूल्यवान रूप समक्षा जाता है। सामाजिक आंदोलनों में संस्थागत स्थिति का अभाव होता है। कुछ लोग इसके प्रति उदासीन, यहाँ तक कि इसके विरोधी होते हैं।

    सामाजिक आंदोलनों तथा समिति में भी अन्तर किया जा सकता है। प्रथमतया, समिति एक संगठित समूह होता है, जबकि कुछ सामाजिक आंदोलन पूर्णतया असंगठित हो सकते हैं। द्वितीय, समिति समाज के परम्परागत व्यवहार का पालन करती हैं, जबकि सामाजिक आंदोलन व्यवहार के प्रतिमानों में कुछ परिवर्तन लाना चाहते हैं।

    सामाजिक आंदोलन की विशेषता कौन सी है ?

    सामाजिक आंदोलन की विशेषताएं

    सामाजिक आंदोलन की निम्नलिखित विशेषताओं पर ध्यान दिया जा सकता है

    1. यह किसी समूह द्वारा प्रयत्न है, 
    2. इसका लक्ष्य समाज में परिवर्तन लाना या उसका विरोध करना होता है, 
    3. यह संगठित अथवा असंगठित दोनों प्रकार का हो सकता है, 
    4. यह शांतिपूर्ण अथवा हिंसात्मक हो सकता है।
    5. इसका जीवन-काल अनिश्चित होता है। यह दीर्घकाल तक चल सकता है अथवा शीघ्र ही समाप्त हो सकता है। 

    प्रश्न 2. सामाजिक आंदोलन के कारण बताइए।

    सामाजिक आंदोलनों के कारण

    सामाजिक आंदोलन अकारण घटित नहीं होते। सामाजिक आंदोलन सामाजिक बैचैनी सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती है। सामाजिक बेचैनी के कारण निम्नलिखित हो सकते हैं. 

    (i) सांस्कृतिक विस्थापन (Cultural drifts)- समाज में निरन्तर परिवर्तन हो रहे हैं। सभी सभ्य समाजों में मूल्य एवं व्यवहार बदल रहे हैं। सांस्कृतिक विस्थापन की अवस्था में अधिकांश लोग नवीन विचारों को अपना लेते हैं। समाज में इन विचारों को क्रियान्वित करने हेतु वे आंदोलन का संगठन करते हैं। प्रजातंत्रीय समाज का विकास, स्त्रियों का उद्धार, जनशिक्षा का प्रसार, अस्पृश्यता का उन्मूलन, स्त्री-पुरुष दोनों के लिये अवसर की समानता, धर्म-निरपेक्षता की वृद्धि, सांस्कृतिक विस्थापन के अनेक उदाहरण हैं।

    (ii) सामाजिक विघटन (Social Disorganisation)- परिवर्तनशील समाज कुछ सीमा तक विघटित समाज होता है, क्योंकि समाज के विभिन्न अंगों में परिवर्तन साथ-साथ नहीं होते। एक अंग में परिवर्तन अधिक तीव्रता से हो जाता है, जिससे अनेक सांस्कृतिक विलम्बनाएँ (cultural lags) उत्पन्न हो जाती हैं। औद्योगीकरण ने नगरीकरण को जन्म दिया है, जिसके फलस्वरूप विभिन्न सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हो गई है। सामाजिक विघटन से समाज में अनिश्चितता एवं अस्त-व्यस्तता फैल जाती है, क्योंकि प्राचीन परम्परायें आचरण को नियंत्रित करने में असमर्थ होती हैं। व्यक्ति दिशाहीन हो जाते हैं। वे स्वयं को समाज से पृथक् समझते हैं। उनमें यह भावना पनप जाती है कि समाज के नेता उनकी आवश्यकताओं के प्रति विमुख हैं। व्यक्ति असुरक्षित, निराश्रित एवं विचलित महसूस करते हैं। निराशा एवं अस्त-व्यस्तता सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती है।

    (iii) सामाजिक अन्याय- जब व्यक्तियों के किसी समूह के मन में यह धारणा बैठ जाती है कि उनके साथ अन्याय हुआ है तो वे निराश एवं विघटित महसूस करते हैं। अन्याय की ऐसी भावना सामाजिक आंदोलनों के लिये एक उपर्युक्त आधार प्रदान करती है। सामाजिक अन्याय की भावना केवल निर्धन लोगों तक ही सीमित नहीं होती। किसी भी पदीय स्तर पर कोई भी समूह स्वयं को सामाजिक अन्याय का शिकार समझ सकता है। धनी वर्ग नगरीय सम्पत्ति सीमा अधिनियम या उच्च करों, जिनका उद्देश्य निर्धन वर्ग को लाभ पहँचाना है, को अपने लिये अन्याय समझ सकता है। सामाजिक अन्याय व्यक्ति निष्ठ मूल्य-निर्णय है। सामाजिक व्यवस्था उसी स्थिति में अन्यायपर्ण होती है. जब इसके सदस्य ऐसा महसस करें।

    इस प्रकार, सामाजिक आंदोलन उसी समय उत्पन्न होते हैं, जब अनुकूल परिस्थितियाँ हों। यह ध्यान रहे कि स्थिर, सुगठित समाज में आंदोलन कम होते हैं। ऐसे समाज में सामाजिक तनाव अथवा विघटित समूह कम होते हैं। लोग संतुष्ट होते हैं परन्तु परिवर्तनशील एवं निरन्तर विघटित समाज में लोग तनावों से पीड़ित होते हैं। वे पूर्णतया संतुष्ट नहीं होते। ऐसे समाज में वे अन्याय महसूस करते हैं, एवं असंतुष्ट हो जाते हैं। असंतुष्ट लोग ही सामाजिक आंदोलनों का निर्माण करते हैं। आधुनिक समाज सामाजिक आंदोलनों से अधिक ग्रस्त हैं।

    सामाजिक आंदोलनों के प्रति संवेदनशीलता के कारण :

    निम्नलिखित प्रकार के लोग सामाजिक आंदोलनों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं

    1. ऐसे व्यक्ति, जो अधिक गतिशील हैं तथा जिन्हें सामुदायिक जीवन में एकीकृत होने के कम अवसर प्राप्त होते हैं;
    2. ऐसे व्यक्ति जो समूह में पूर्ण रूप से स्वीकृत तथा एकीकृत नहीं होते तथा जिन्हें सीमान्तीय (marginal) कहा जाता है;
    3. ऐसे व्यक्ति जो समुदाय से पृथक् हैं; 
    4. ऐसे व्यक्ति जिन्हें आर्थिक अरक्षा एवं सामाजिक स्थिति के खोये जाने का भय है; 
    5. ऐसे व्यक्ति जो कुसमायोजित हैं।

    इस प्रकार ऐसे लोग जो बेघर एवं समाज में अनुपयुक्त हैं, जन-आंदोलनों के समर्थक होते हैं। यह भी ध्यान रहे कि कुछ लोग सामाजिक आंदोलनों में ऐसे कारणों से भाग लेते हैं, जिनका आंदोलन के उद्देश्यों से कोई सम्बन्ध नहीं होता। कुछ इसमें केवल अपना समय व्यतीत करने के लिये अथवा इसके सदस्यों के प्रति मैत्री-भावना के कारण भाग लेते हैं अथवा उनका उद्देश्य आंदोलन में किसी पद को प्राप्त करना हो सकता है, जिससे उनकी प्रतिष्ठा अथवा शक्ति की वृद्धि हो, बेशक उससे आंदोलन के उद्देश्यों की प्राप्ति का कोई सम्बन्ध न हो। इस बात पर पुनः बल देने की आवश्यकता है कि जब तक तीव्र एवं व्यापक सामाजिक असंतोष नहीं होगा, सामाजिक आंदोलनों का जन्म एवं विकास भी नहीं होगा। अधिकांश सामाजिक आंदोलन बेचैनी, उत्तेजना, औपचारिकरण एवं संस्थायीकरण की चार अवस्थाओं से गुजरते हैं।


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