Saturday, 26 February 2022

बहुदलीय प्रणाली क्या है ? इसके विभिन्न गुण दोष बताइये ?

बहुदलीय प्रणाली क्या है ? इसके विभिन्न गुण दोष बताइये ?

    बहुदलीय प्रणाली किसे कहते हैं ?

    बहुदलीय प्रणाली : यदि किसी देश की राजनीति में काफी बड़ी संख्या में राजनीतिक दल हों तो उसे बहुदलीय प्रणाली कहा जाता है। महाद्वीपीय यूरोप के अधिकांश देशों में विशेषतया फ्रांस में बहदलीय प्रणाली है। भारत में भी बहुदलीय व्यवस्था ही हैं।

    बहुदलीय प्रणाली वाले देश में जब संसदात्मक व्यवस्था को अपनाया जाता हैं तो कोई भी राजनीतिक दल अकेले ही मन्त्रिमण्डल का निर्माण करने की स्थिति में नहीं होता और मिले-जुले मन्त्रिमण्डल का निर्माण किया जाता है।

    बहुदलीय प्रणाली के लाभ

    यद्यपि आलोचकों ने बहुदलीय प्रणाली के प्रायः दोष ही निकाले हैं, फिर भी इसके कुछ गुण बताए जा सकते हैं। वास्तव में, द्विदलीय प्रणाली के दोष ही बहुदलीय प्रणाली के लाभ हैं, जिनका उल्लेख निम्न प्रकार से किया जा सकता है 

    (1) मतदाताओं को अधिक स्वतन्त्रता -जहाँ दलों की संख्या अधिक होती है, वहाँ मतदाताओं को स्वाभाविक रूप से चयन की अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त रहती है, क्योंकि वे कई दलों में से अपने ही समान विचार रखने वाले किसी दल का समर्थन कर सकते हैं।

    (2) मन्त्रिमण्डल की तानाशाही सम्भव नहीं -बहुदलीय पद्धति में सामान्यतया व्यवस्थापिका में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो पाता, अतः मिले-जुले मन्त्रिमण्डल का निर्माण किया जाता है। ये मिले-जुले मन्त्रिमण्डल कभी भी स्वेच्छाचारी नहीं हो सकते, क्योंकि सरकार में साझेदार विभिन्न दलों में से किसी एक दल की असन्तुष्टि सरकार के अस्तित्व को खतरे में डाल देती है।

    (3) सभी विचारधाराओं का व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व -जहाँ बहुदलीय पद्धति होती है, वहाँ व्यवस्थापिका में सभी विचारधाराओं के लोगों को प्रतिनिधित्व मिल जाता है और राष्ट्र के सभी वर्गों के विचार सुने जा सकते हैं। .

    (4) राष्ट्र दो विरोधी गुटों में नहीं बँटता -जहाँ बहुदलीय पद्धति होती है वही दलीय भावना प्रबल नहीं हो पाती और विभिन्न दलों के द्वारा कुछ सीमा तक पारस्परिक सहयोग का मार्ग अपनाया जा सकता है। इस प्रकार राष्ट्र दो विरोधी वर्गों में बँट जाने से बच जाता है।

    (5) व्यक्तित्व बनाए रखने का अवसर -यह व्यक्ति को कुछ सीमा तक अपना व्यक्तित्व बनाए रखने का अवसर देती है। यदि एक दल उनके विचारों के अनकल नहीं रहता, तो वह दूसरे दल को अपना सकता है और उसे अपना व्यक्तित्व इस भय से एक दल में नहीं खो देना पड़ता कि दूसरा दल उसके विचारों का पूर्णतया विरोधी है। इस प्रकार व्यक्ति की विचार स्वतन्त्रता और उसके व्यक्तित्व की रक्षा सम्भव होती है। 

    बहुदलीय प्रणाली के दोष

    बहुदलीय पद्धति के दोष : बहुदलीय पद्धति के दोष उसके गुणों की संख्या से अधिक हैं और उनका उल्लेख निम्न प्रकार किया जा सकता है

    1. शासन में अस्थिरता
    2. नीति की अनिश्चितता
    3. शक्तिशाली विरोधी दल का प्रभाव
    4. कार्यपालिका की निर्बल स्थिति
    5. स्वार्थी नीतियों का प्रभुत्व
    6. कार्यकुशलता में कमी
    7. दीर्घकालीन नियोजन सम्भव नहीं

    (1) शासन में अस्थिरता - बहुदलीय व्यवस्था मिले-जुले मन्त्रिमण्डलों को जन्म देती है जो कि बहुत अधिक अस्थिर होते हैं। जहाँ कहीं शासन में साझेदार राजनीतिक दलों के हित परस्पर टकराते हैं, वहीं विवाद उत्पन्न हो जाता है जिसके परिणाम से शासन का पतन होता है। बहुत जल्दी-जल्दी बदलने वाली ये सरकारें जनता के हित पर विचार ही नहीं कर पातीं। बहुदलीय व्यवस्था के कारण ही फ्रांस को एक लम्बे समय तक राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरना पड़ा था। फ्रांस के विदेशमन्त्री एम० ब्रियां (M. Briand) ने एक अवसर पर कहा था कि "फ्रांस में जिस दिन प्रधानमन्त्री पद ग्रहण करता है, उसी दिन उसके किसी साथी के द्वारा उसके पतन के लिए कार्य करना प्रारम्भ कर दिया जाता है।"

    (2) नीति की अनिश्चितता - सरकारों के शीघ्र परिवर्तन के कारण नीति की अनिश्चितता उत्पन्न होती है जिसका शासन के समस्त स्वरूप पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सरकार में होने वाले निरन्तर परिवर्तन दीर्घकालीन योजना को व्यावहारिक रूप में असम्भव बना देते हैं।

    (3) शक्तिशाली विरोधी दल का प्रभाव - बहुदलीय पद्धति में एक व्यवस्थित तथा शक्तिशाली विरोधी का जो कि संसदीय प्रजातन्त्र का आधार है, विकास सम्भव नहीं हो पाता। शक्तिशाली विरोधी दल के अभाव में जनहित की अवहेलना की आशंका बनी रहती है।

    (4) कार्यपालिका की निर्बल स्थिति - बहुदलीय पद्धति में वास्तविक कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल और प्रधानमन्त्री की स्थिति बहुत निर्बल रहती है क्योंकि प्रधानमन्त्री को हमेशा ही इन अलग-अलग राजनीतिक दलों को प्रसन्न रखना पड़ता है। ऐसी कार्यपालिका की स्थिति शोचनीय ही होती है जिसके सिर पर सदैव अविश्वास के प्रस्ताव की तलवार लटकी रहती हो।

    (5) स्वार्थी नीतियों का प्रभुत्व - बहुदलीय पद्धति में सरकार जनता के निर्णय का परिणाम नहीं होती, वरन् यह तो चालाक और स्वार्थी राजनीतिज्ञों के पारस्परिक गठजोड़ का परिणाम होती है।

    (6) कार्यकुशलता में कमी - बहुदलीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजनीतिक दलों के नेताओं का ध्यान सरकार तोड़ने, गठजोड़, करने तथा किसी भी प्रकार से सरकार बनाने की ओर रहता है, ऐसी स्थिति में प्रशासनिक कार्यकुशलता में बहुत अधिक कमी हो जाती है।

    (7) दीर्घकालीन नियोजन सम्भव नहीं - बहुदलीय पद्धति में जब जल्दी-जल्दी सरकारों में परिवर्तन होता है तो लम्बे समय को ध्यान में रखकर देश की प्रगति के लिए किसी भी प्रकार की योजना का निर्माण सम्भव नहीं हो पाता। इस प्रकार बहुदलीय पद्धति देश की प्रगति में बाधक होती है।

    बहुदलीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषता

    बहुदलीय व्यवस्था में इस प्रकार की बहुत-सी विशेषताएँ होती हैं जो राजनीतिक स्थिरता को आघात पहुँचाती हैं तथा सरकार के कामकाज को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करती हैं। इस प्रकार की विशेषताओं में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के गुण होते हैं। बहुदलीय पद्धति में राजनीतिक स्थिरता को हानि पहुँचाने वाले निम्नलिखित तत्व होते हैं

    1. विचारधारा का अभाव-बहुदलीय पद्धति में सत्ता पर नियन्त्रण हासिल करने के उद्देश्य से अनेक राजनीतिक दाँव-पेंच चले जाते हैं जिससे इस प्रणाली में आदर्श विचारधारा का कोई स्थान नहीं रहता है। कई बार धुर विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दल से भी सत्ता प्राप्ति की खातिर गठबन्धन करना पड़ता है।
    2. अस्थायित्व-बहुदलीय पद्धति में अस्थायित्व की भावना शामिल होती है। अनेक राष्ट्रों में राजनीतिक अस्थिरता का प्रमुख कारण बहुदलीय प्रणाली ही है। भारत में भी 1995-1999 तक दलों की अधिकता के कारण किसी दल को बहुमत न मिल पाने के कारण राजनीतिक अस्थिरता रहीं।
    3. क्षेत्रवाद, व्यक्तिवाद व साम्प्रदायिकता को बढ़ावा-बहुदलीय प्रणाली में अनेक दल क्षेत्रीयता, वर्गवाद, साम्प्रदायिकता पर आधारित होते हैं। ये दल स्वयं तो बहुमत प्राप्त करने में सक्षम नहीं होते हैं परन्तु इनके कुछ सदस्य जो व्यवस्थापिका में चुन लिये जाते हैं जिनकी जोड़-तोड़ नीति से सरकार सदैव अस्थिर रहती है तथा अपने हितों को साधने के लिए ये दल क्षुद्र राजनीतिक उद्देश्यों से क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता, आदि को बढ़ावा देते हैं।
    4. नैतिकता का ह्रास-सत्ता प्राप्ति के खेल में नैतिकता कहीं पीछे छूट जाती है अनेक दल-बदल, आरोप-प्रत्यारोप, भ्रष्टाचार व घोटाले आदि इसी व्यवस्था के कारण अधिक पनप रहें है क्योंकि सम्बन्धित तथा आरोपी राजनीतिज्ञों को क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के कारण बचाया जा रहा है। लोकतन्त्र में एक-एक सीट तथा सदस्य का महत्व होता है तथा इस प्रकार के भ्रष्ट व अनैतिक सदस्यों को इसी भावना के वशीभूत संरक्षण प्राप्त होता है।
    5. विकास में अवरोध-बहुदलीय पद्धति में विकास भी अपेक्षित गति से नहीं हो पाता है क्योंकि मन्त्रिमण्डल अल्पकालीन होते हैं। इसलिए राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ आर्थिक विकास भी अस्थिर होता है। 
    6. राजनीतिक अस्पष्टता-बहुदलीय प्रणाली में अनेक दल होने के कारण मतदाता यह निश्चित नहीं कर पाते हैं कि वह किस दल को मत दें। इसी अस्पष्टता के कारण मतदाता भ्रमित हो जाता है तथा किसी एक दल को मत नहीं दे पाता है जिससे अपेक्षित सदस्य संख्या न प्रमुख पाकर राजनीतिक दल भी राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो जाता है।

    इन्हीं सभी तथ्यों के कारण बहुदलीय पद्धति में स्थिरता नहीं हो पाती है तथा सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त होती है।

    बहुदलीय पद्धति द्वारा भारतीय राजनीति में अस्थिरता

    बहुदलीय पद्धति द्वारा भारतीय राजनीति में अस्थिरता जिस राजनीतिक पद्धति में दो से अधिक दल होते हैं उसे बहुदलीय पद्धति कहते हैं। विश्व के अधिकांश देशों में बहुदलीय पद्धति पाई जाती है। इस प्रकार की पद्धति में जहाँ अनेक राजनीतिक दल हों वहाँ शासन सत्ता पर नियन्त्रण करने व कार्यपालिका व व्यवस्थापिका पर अधिकार स्थापित करने के लिए कई बार दो या दो से अधिक दल मिलकर कोई मोर्चा या गठबन्धन बना लेते हैं तथा जिस दल की माँगों को न माना जाये वही दल सरकार को छोड़ने की धमकी देता है। ऐसी व्यवस्था में अस्थिरता का जन्म होने की सम्भावना पैदा होती है। इस व्यवस्था में प्राय: गुटबाजी होती है।


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