Friday, 4 March 2022

लोकतंत्र में दबाव समूह की भूमिका की विवेचना कीजिए

लोकतंत्र में दबाव समूह की भूमिका की विवेचना कीजिए

लोकतंत्र में दबाव समूहों की भूमिका : लोकतांत्रिक प्रणाली में दबाव समूहों की भूमिका के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं

लोकतंत्र में दबाव समूहों की भूमिका 

  1. जनतान्त्रिक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति के साधन, 
  2. शासन के लिए सूचनाएँ एकत्रित करने वाले संगठनों के रूप में दबाव समूह, 
  3. शासन को प्रभावित करने वाले संगठनों के रूप में दबाव समूह, 
  4. सरकार की निरंकशता को सीमित करना, 
  5. समाज और शासन में सन्तुलन स्थापित करना ,
  6. व्यक्ति और सरकार के मध्य संचार के साधन, 
  7. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के पूरक, 
  8. विधानमण्डल के पीछे विधानमण्डल का कार्य

(1) जनतान्त्रिक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति के साधन - दबाव समूहों को लोकतन्त्र की अभिव्यक्ति का साधन माना जाता है। लोकतन्त्र की सफलता के लिए लोकमत तैयार करना आवश्यक है ताकि विशिष्ट नीतियों का समर्थन या विरोध किया जा सके। विभिन्न देशों में दबाव गुट विभिन्न तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। लोकमत को शिक्षित करके, आँकड़े इकट्ठे करके, निर्माताओं के पास आवश्यक सूचनाएँ पहुँचाकर अपने अभिष्ट की प्राप्ति करना आज जनतान्त्रिक प्रक्रिया का अंग बन गया है।

(2) शासन के लिए सूचनाएँ एकत्रित करने वाले संगठनों के रूप में दबाव समूह - प्रत्येक देश में सरकार तथा शासन के पास आवश्यक सूचनाएँ पर्याप्त रूप से होनी चाहिए। शासन की सूचनाओं के गैर-सरकारी स्रोत के रूप में दबाव समूह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। दबाव समूह आँकड़े इकट्टे करते हैं,शोध करते हैं तथा सरकार को अपनी कठिनाइयों से परिचित करवाते हैं।

(3) शासन को प्रभावित करने वाले संगठनों के रूप में दबाव समूह - आजकल दबाव समूहों का अस्तित्व एक ऐसी संस्था के रूप में हैं जिनके पास इस दृष्टि से काफी शक्ति होती है की वे स्वार्थ या हित विशेष की रक्षा के लिए सरकारी मशीनरी पर उपयोगी व सफल प्रभाव डाल सकें।

(4) सरकार की निरंकशता को सीमित करना - प्रत्येक शासन-व्यवस्था में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है और समूची शक्तियाँ सरकार के हाथों में केन्द्रित होती जा रही हैं। दबाव समूह अपने साधनों द्वारा सरकारी निरंकुशता को परिसीमित करते हैं।

(5) समाज और शासन में सन्तुलन स्थापित करना - दबाव समूहों के अस्तित्व का एक लाभ यह है कि विभिन्न हितों के बीच सन्तुलन-सा बना रहता है और इस प्रकार कोई भी एकमात्र प्रभावशील सत्ता स्थापित नहीं हो पाती। व्यापारी, श्रमिक, किसान, जातीय समुदाय, स्त्रियाँ और धार्मिक समुदाय, आदि सभी अपने स्वयं के हितों को प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु उनको एक-दूसरे से प्रतियोगिता करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप समाज और शासन में सन्तुलन स्थापित हो जाता है और यह सन्तुलनकर्त्ता प्रवृत्ति समाज को उस स्थिति से बचाती है जिसमें कि व्यक्तिगत समुदाय ही सारी शक्ति को हथिया लेते हैं।

(6) व्यक्ति और सरकार के मध्य संचार के साधन - दबाव समूह लोकतान्त्रिक राज-व्यवस्था में व्यक्तिगत हितों का राष्ट्रीय हितों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं। ये समूह नागरिक और सरकार के बीच संचार साधन का कार्य करते हैं। रॉडो के अनुसार, “निर्वाचित नेता दबाव समूहों के माध्यम से अपने निर्वाचकों की इच्छा-आकांक्षाओं का पता लगा लेते हैं। अतः इन्हें गैर-सरकारी संचार सूत्र भी कहा जा सकता है।"

(7) क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के पूरक - वर्तमान समय की प्रजातान्त्रिक प्रणाली में सामान्यतया क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की प्रणाली को अपनाया जाता है। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व उपयोगी और व्यावहारिक होते हुए भी इसकी एक त्रुटि यह है कि कुछ विशेष प्रकार के व्यवसायों या आर्थिक कार्यों में संलग्न व्यक्तियों के हितों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो ही नहीं पाता। ये व्यक्ति अपने हितों की रक्षा और वृद्धि के लिए दबाव गुटों के रूप में संगठित हो सकते हैं। बी० ओ० के शब्दों में, "इस प्रकार ये दबाव समूह दलीय पद्धति में व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के कार्य को सम्पन्न करते और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की कमी को दूर कर देते हैं।" क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के तत्व को सम्मिलित कर इनके द्वारा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के पूरक' की भूमिका निभायी जाती है।

(8) विधानमण्डल के पीछे विधानमण्डल का कार्य - दबाव समूह विधि-निर्माण में विधायकों की सहायता करते हैं। अपनी विशेषता तथा ज्ञानगुरुता के कारण ये गुट विधि-निर्माण समितियों के सदस्यों को आवश्यक परामर्श देते हैं। इनका परामर्श और सहायता दोनों ही इतनी उपयोगी होती हैं कि इन्हें विधानमण्डल के पीछे का विधानमण्डल कहा जा सकता है।

वस्तुतः दबाव समूह लोकतान्त्रिक व्यवस्था का दूसरा नाम है और इन्हें 'लोकतान्त्रिक व्यवस्था की प्राणवायु' कहा जाने लगा है। दबाव समूह के जो दोष बताये जाते हैं, वे सैद्धान्तिक ही अधिक हैं। वस्तुतः दबाव समूहों को अप्रजातान्त्रिक, राष्ट्रीय हित में बाधक या सार्वजनिक हितों की उपेक्षा करने वाले संगठन नहीं कहा जा सकता है।

वस्तुतः दबाव समूह उस आधार को जन्म देते हैं, जिसके बल पर लोकतन्त्र और राष्ट्रीय एकता को प्राप्त किया जा सकता है। दबाव समूहों के बिना जनता और शासन के बीच सम्पर्क सूत्रों का अभाव हो जायेगा तथा यह स्थिति लोकतान्त्रिक संस्कृति और राष्ट्रीय हित तथा एकता के लिए घातक होगी। 


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