Friday, 25 February 2022

संवैधानिक राज्य की उत्पत्ति एवं संविधानवाद के विकास का विवरण दीजिये।

संवैधानिक राज्य की उत्पत्ति एवं संविधानवाद

संवैधानिक राज्य की उत्पत्ति एवं विकास एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। संवैधानिक राज्य वह राज्य है जिसमें शासन की शक्तियों के अधिकारों और इन दोनों के बीच के सम्बन्धों का समायोजन किया जाता है। इस प्रकार राज्य एक ही समय में प्राचीन और आधुनिक दोनों ही होता है। इसका प्राचीनतम रूप यूनानियों और रोमन के इतिहास में मिलता है, यद्यपि वह आज के रूप में अत्यधिक भिन्न है क्योंकि आधुनिक संविधानवाद राष्ट्रवाद और प्रतिनिधि लोकतन्त्र के दोहरे आधार से विकसित हुआ है।

यूनानी संविधानवाद - प्राचीन यूनान में नगर राज्य प्रचलित थे। प्लेटो और अरस्तू ने नैतिक दृष्टि से राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन किया था। प्लेटो ने 'अति मानव' की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि अरस्तू ने व्यावहारिक राज्य पर अपने विचार प्रकट किये। चूँकि प्लेटो और अरस्तू दोनों ही नगर-राज्य की परिधि से बाहर नहीं निकल पाये जिसका परिणाम यह हुआ कि यूनानी संविधानवाद इतिहास की बदलती हुई परिस्थितियों के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सका।

रोमन संविधानवाद -रोमन के अधीन 'महान् साम्राज्यवाद' की स्थापना हुई। उन्होंने अपने कानून का संहिताकरण किया और उत्तरदायी सरकार के सिद्धान्तों का निर्धारण किया जो संविधानवाद के अत्यन्त लोकप्रिय सिद्धान्तों में शामिल किया जाने लगा।

मध्यकाल में संविधानवाद -मध्यकाल में प्रतिनिधि शासन का शुभारम्भ हुआ जो आधुनिक समय में प्रचलित अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र का आधार है। इसी युग का परिषदीय आन्दोलन संविधानवाद के विकास के लिए महत्वपूर्ण रहा है।

पुनर्जागरण और संविधानवाद -इस काल में नैतिकता और राजनीति को पृथक किया गया।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद संविधानवाद -प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 'राष्ट्र संघ' की स्थापना संविधानवाद के इतिहास में अभूतपूर्व व्यवस्था थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संविधानवाद -द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संविधानवाद का एक नया मॉडल अस्तित्व में आया जिसे दुनिया के सभी साम्यवादी देशों में देखा जा सकता है। तीसरी दुनिया के देशों में संविधान निर्माण के कई दिलचस्प प्रयोग किये गये ताकि वे संवैधानिक राज्य का रूप ले सकें। तीसरी दनिया के अनेक देशों ने ब्रिटिश या अमरीकी शासन व्यवस्था को अपनाया।

अरस्तु के समय से लेकर आज तक संविधानवाद के इस विकास के परिणामस्वरूप संविधानवाद के तीन रूप सामने आये हैं। ये हैं

  1. पाश्चात्य संविधानवाद या उदारवादी संविधानवाद, 
  2. साम्यवादी देशों का संविधानवाद और,
  3. विकासशील देशों का संविधानवाद। 


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