मनोविश्लेषणवाद का सिद्धांत - Manovishleshanvad

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मनोविश्लेषणवाद का सिद्धांत - Manovishleshanvad 

मनोविश्लेषणवाद मानव-मन के विश्लेषण की पद्धति पर आधारित है। इसके जन्मदाता सिग्मण्ड फ्रायड हैं। फ्रायड ने मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोग चिकित्साशास्त्र में किया है। उन्होंने काव्य, कला, दर्शन अर्थ, समाज-विज्ञान. आदि के बारे में मनोविश्लेषण की मान्यताओं के आधार पर नवीन मान्यताएँ प्रस्तुत की, जिसे मनोविश्लेषणवाद कहा गया। 

फ्रायड ने सभ्यता और संस्कृति की श्रेष्ठतम उपलब्धियों को मानव की काम प्रवृत्ति की अभिव्यंजनाएँ माना है। उनके अनुसार मनुष्य-जीवन में कुछ भी मूल्यवान् और धार्मिक नहीं है। मनुष्य काम-प्रवृत्ति के हाथों की कठपुतली मात्र है।

फ्रायड उपचार गृह से दर्शन की ओर बढ़े हैं तथा रोगियों का उपचार करते करते व्याधियों के मूल उद्गम तक पहुँचे हैं और अन्तर्मन के विज्ञान की खोज में सफल रहे हैं।

अचेतन-सम्बन्धी धारणा--फ्रायड के अनुसार मानव-मस्तिष्क तीन भागों में विभक्त है-

  • चेतन (Conscious) 
  • अचेतन (Unconscious)
  • पूर्व-चेतन (Pre-conscious)

इनमें चेतन की अपेक्षा अचेतन अधिक प्रबल है। चेतन सामाजिक जीवन में सक्रिय रहता है और अचेतन सामाजिक स्वीकृति के अभाव में मन के अन्तःस्थल में रहकर अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष करता है।

तीन स्तरों वाले इस मानस-तन्त्र को फ्रायड ने पुनः तीन भागों में विभाजित किया है। ये हैं--

  • इदम् (Id) 
  • अहम् (Ego)
  • अति-अहम् (Super Ego)

इनमें इदम् एक प्रकार की ऊर्जा है । यह रागों का पुंज है। यह अतृप्त वासनाओं का अन्धकारमय कोष है। अहम् चेतन मन है, जो सामाजिक मूल्यों के प्रति सचेष्ट रहता है। अति-अहम् संचित सामाजिक मान्यताओं का प्रतीक है, जिसका काम आलोचना और अधीक्षण करना है।

फ्रायड के अनुसार 'काम' जीवन को मूल वृत्ति है, क्योंकि अचेतन जिन दमित इच्छाओं का पुंज है, वे मूलतः काम के चारों ओर केन्द्रित हैं। काम को फ्रायड ने 'लिबिडो' कहा है। मानव के व्यक्तिगत और समष्टिगत, सभी कार्य-व्यापारों के मूल में काम-वृत्ति की ही प्रेरणा रहती है।

कला की प्रेरणा - फ्रायड के अनुसार कला और अर्थ, दोनों का उद्भव अचेतन मानस की संचित प्रेरणाओं और इच्छाओं में से होता है। इस कामशक्ति के उन्नयन के फलस्वरूप रचनाकार सृजन करता है। मानसिक जीवन में यथार्थ और सुखेच्छा के बीच जो संघर्ष होता है, उसका समाधान कलाकार कला के द्वारा ही करता है।

फ्रायड ने काव्य में कल्पना को बहुत महत्त्व दिया है। उन्होंने कवि-कल्पना को दिवास्वप्न माना है। उनके अनुसार कल्पनात्मक काव्य-संसार की अवास्तविकता का साहित्यिक प्रविधि पर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है।

फ्रायड ने कल्पना-चित्र-सृष्टा व्यक्तियों को स्नायविक विकारग्रस्त' व्यक्तियों का समूह कहा है। उन्होंने दो प्रकार के साहित्यकार माने हैं। प्रथम वे, जो प्राचीन रचनाकारों एवं त्रासदो-प्रणेताओं की पूर्व-प्रस्तुत लोकमान्य सामग्री ग्रहण करके साहित्य का निर्माण करते हैं और दूसरे वे, जो अपने साहित्य की स्वयं रचना करते हैं। ये ही दिवास्वप्नदृष्टा अथवा 'स्रायविक विकारग्रस्त' समुदाय के व्यक्ति हैं। ऐसे साहित्यकार प्रेमाख्यान, कहानी, उपन्यास आदि की रचना करते हैं, जो मूलतः कल्पना पर आधारित हैं। उनकी अतृप्त इच्छाएँ या वासनाएँ ही उनकी रचनाओं के मूल में रहती हैं।

क्षतिपूरक सिद्धांत - फ्रायड ने मानव-मन की समस्त सर्जनात्मक क्रियाओं को क्षतिपूरक क्रिया के रूप में विवेचित किया है और कुण्ठा के उदात्तीकृत रूप को कला का नियामक-तत्त्व माना है। इस दृष्टि से साहित्य और कला प्रकृत-मूल्य सम्पन्न नहीं हैं। वे भ्रम हैं और थोथी क्षतिपूरक क्रियाएँ हैं, क्योंकि कल्पना-प्रवण लेखक की कृति में उसी की वर्जनाएँ काम-प्रतीकों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करती हैं । कला-सृजन, वस्तुतः काम-प्रतीकों का पुनर्निर्माण है। लेखक जीवन की विभीषिका और यथार्थता को वहन नहीं कर पाता, इसलिए वह संघर्षशील जगत् से पलायन करता है। इससे उसे क्षणिक सन्तोष प्राप्त होता है। अतः कला विशुद्ध रूप से एक शारीरिक प्रतिक्रिया है। इसमें नैतिकता या आध्यात्मिकता की खोज करना व्यर्थ है।

कला-चिन्तन का मूल स्त्रोत - फ्रायड के अनुसार कला-चिन्तन का मूल स्रोत काम है। उनके अनसार धर्म, अर्थ, कला और संस्कति के मल में इसी की प्रेरणा स्थित है। व्यक्ति की दमित एवं कण्ठित असामाजिक प्रवृत्तियाँ अपने परिशोधित रूप में कला और संस्कृति का निर्माण करती हैं। वे मौलिक वस्तु न होकर कुण्ठा का उदात्तीकृत रूप हैं अथवा वर्जना का रूप-परिवर्तन हैं। विविध कलाएँ भौतिक और शारीरिक वजनाओं से ही होती हैं। इसीलिए फ्रायड ने कला को काम-प्रवृत्ति की तुष्टि मात्र माना है।

मनोवैज्ञानिक समीक्षक आई.ए.रिचर्ड्स ने भी तृष्णाओं को सन्तुष्टि के मूल में अचेतन को क्रियाओं को माना है । फ्रायड जहाँ काम अथवा राग की माध्यम सहज वृत्तियों के परिष्कृत या उदात्तीकृत रूप को ही सर्वोपरि मानते हैं, वहाँ रिचर्ड्स उससे भी आगे बढ़कर विरोधी मनोवेगों के सन्तुलन या समन्विति में काव्य के चरम मूल्य की बात कहते हैं।

इसके विपरीत, एडलर का विचार है कि "काम-वृत्ति जीवन की प्राथमिक समस्या नहीं है। जब व्यक्ति काम-विषयक समस्याओं का अनुभव करता है, तब उसकी जीवन-शैली निर्मित हो चुकी होती है। 'काम' जीवन-शैली का एक अंश मात्र है, किन्तु इतना अवश्य है कि कुण्ठाओं और वर्जनाओं से श्रेष्ठ और उत्कृष्ट साहित्य की रचना सम्भव नहीं है और यदि ऐसा होता तो विश्व से सुन्दर-असुन्दर का, सत्साहित्य और असत्साहित्य का भेद मिट जाता। अतः कुण्ठाओं से श्रेष्ठ साहित्य की रचना सम्भव नहीं है।"

काव्य-मूल्य : प्रायड के अनुसार काव्य या कला का उदात्त रूप सभ्यता और संस्कृति के मूल्यों की एक प्रगतिशील उपलब्धि है। जब कुण्ठा के उदात्तीकरण की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है, तब उसको बर्बरता जाती रहती है और उसमें सांस्कृतिक मल्य का समावेश हो जाता है। इस प्रकार कला या काव्य से प्राप्त आनन्द की उपलब्धि हल्के उन्माद के रूप में होती है, जो जीवन की कठोरताओं से बचने के लिए एक अस्थायी आश्रय प्रदान करता है। इसी से फ्रायड कला में सम्प्रेषण को महत्त्वपूर्ण समझते हैं और साधारणीकरण की आवश्यकता पर बल देते हैं।

आलोचना-दृष्टि : फ्रायड की आलोचना-दृष्टि उनको इस मान्यता पर आधारित है कि कल्पना-चित्र अपनी अन्तर्हित इच्छा से तथा तीनों कालों से सम्बद्ध है। इस दृष्टि से लेखक को कृतियों का परीक्षण तथा जीवन और कृतियों के पारस्परिक सम्बन्ध का अध्ययन करना चाहिए और उन घटनाओं का पारस्परिक मूल्यांकन करना चाहिए । फ्रायड का अभिमत है कि एक यथार्थ अनुभव लेखक के मानस पर प्रबल प्रभाव अंकित करता है । वह किसी पूर्व अनुभव-स्मृति या साधारण बाल्यकाल की अनुभव-स्मृति को उद्वेलित करता है। इससे इच्छा उत्पन्न होती है, जिसकी पूर्ति उस कलाकृति से होती है। उस कृति में वर्तमान की घटना और अतीत की स्मृति के तत्त्व अलग-अलग देखे जा सकते हैं। 

फ्रायड का मत है कि 'सृजनात्मक साहित्य के अध्ययन का यह प्रकार व्यर्थ नहीं जाता। कल्पना-प्रधान कृति, दिवास्वप्न की तरह बाल्यक्रीड़ा की श्रृंखला की ही एक कड़ी और उसकी स्थानापन्न है।''

इस प्रकार फ्रायड ने साहित्य-रचना का सम्बन्ध दिवास्वप्नों से जोड़ते हुए साहित्य की मनोवैज्ञानिक क्रिया का विवेचन किया है।

काव्य की अभिव्यक्ति : फ्रायड के अनुसार दिवास्वप्न (कवि-कल्पना) की अभिव्यक्ति ही काव्य है। उन्होंने अभिव्यक्ति के कलात्मक स्वरूप को ही काव्य या साहित्य कहां है।

फ्रायड ने कल्पनांप्रवण लेखक की तुलना क्रीड़ारत शिशु से की है, जिसका क्रीड़ा जगत, यथार्थ जगत् से बिल्कुल पृथक् होता है। कवि भी बालक के समान कल्पना-छवियों का निर्माण करता है। उसे गम्भीर भाव से ग्रहण कर अपनी मानसिक सृष्टि को तीन रूप से यथार्थ से पृथक् करता है और अपनी बहुत-सी भावनाएँ उसमें सन्निविष्ट कर देता है।

फ्रायड की शक्ति और सीमा : फ्रायड की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि उसने अचेतन की खोज कर मानव-मनोविश्लेषण के लिए असीमित क्षेत्र का उद्घाटन कर दिया है। रहस्य के घने आवरण में पड़ी मानव और समाज की अनेक समस्याएँ बुद्धि और विवेक के प्रकाश में आईं। इससे जीवन के पुनर्मूल्यांकन के नवीन साधन उपलब्ध हुए।

दूसरी शक्ति यह है कि 'काम' को मूलभूत वृत्ति मानते हुए मनुष्य के रागात्मक सम्बन्धों का सटीक व्याख्यान प्रस्तुत किया है। इससे जीवन में बौद्धिक मूल्यों की प्रतिष्ठा में सहायता मिली है।

फ्रायड की कुछ सीमाएँ भी हैं। उनके निष्कर्ष अस्वस्थ व्यक्तियों की मनःस्थिति पर आधारित हैं। अतः वे स्वस्थ व्यक्ति का जीवन-दर्शन कैसे हो सकते हैं?

'काम' जीवन की मूल वृत्ति अवश्य है, परन्तु वह अंग ही है, सर्वांग नहीं। फ्रायड ने उसे सर्वांग मान कर अपने दर्शन को एकांगी बना दिया है समाज के लिए उनके पास कोई सन्देश नहीं है। फिर भी, फ्रायड ने प्रगति की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए साहित्यकार के व्यक्तित्व और साहित्य की प्रवृत्तियों के विश्लेषण के लिए नवीन मार्ग का प्रवर्तन किया है।

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