आधुनिक भावबोध को स्पष्ट कीजिये ?

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आधुनिक भावबोध को स्पष्ट कीजिये ?

आधुनिक बोध महानगरों में बसने वाले मनीषियों का दृष्टि बोध है, जो ग्रामों और छोटे शहरों में रहने वालों की समझ में कठिनाई से आता है। साहित्य में, सामान्यतः जिसे आधुनिक बोध कहा जाता है, वह कोई शाश्वत मूल्य नहीं है। मूल्य शायद वह है ही नहीं। मूल्यों के विघटन से उत्पन्न वह एक दृष्टि है, जिसमें घबराहट, निराशा, शंका, त्रास और असुरक्षा के भावं हैं। अतएव आधुनिक बोध की सारी व्याप्तियाँ ऐसी नहीं हैं, जो आँख मूंद कर स्वीकार कर ली जाएँ।

साहित्य में आधुनिक बोध के अन्यतम प्रवर्तक फ्रांसीसी कवि मालार्मे ने कहा था कि "कृति का विषय बाहर आता है। अतएव जो भी कलाकार अपना ध्यान विषय पर केन्द्रित करता है, वह शुद्ध कलाकार नहीं है। शुद्ध कलाकार तो वही हो सकता है, जिसका सारा ध्यान कृति पर केन्द्रित है, भाषा, शैली और शब्दों में सन्निविष्ट है।"

पश्चिमी देशों के कलाकार मुख्यतः शैली के कलाकार हैं। वे पाठकों को चौंकाते हैं, उनकी शान्ति भंग करते हैं, किन्तु उन्हें ज्ञान नहीं देते, उपदेश नहीं देते, क्योंकि इनके अनुसार ज्ञानदान और उपदेशवाद की गंध आने से कला सोद्देश्य हो जाती है और सोद्देश्यता कला का सबसे बड़ा अपराध है।

आधुनिक बोध का एक अन्य प्रखर लक्षण यह है कि कलाकार कर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्वीकार नहीं करता। कर्म का त्याग सोद्देश्यता के त्याग से उत्पन्न हआ है अथवा सोद्देश्यता का त्याग कर्म त्याग का परिणाम है, यह स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है। केवल अनुमान होता है कि उद्देश्य का त्याग पहले किया गया, कर्म का त्याग उसके बाद आया है। ज्ञान और उपदेश कर्म के आदि.सोपान हैं। जो लेखक ज्ञान या उपदेश की ओर झुकता है, निश्चय ही वह समाज को किसी कर्म की ओर प्रेरित करना चाहता है।

कर्म से यहाँ तात्पर्य खाने-पीने और रोजी कमाने से नहीं है, बल्कि तात्पर्य राष्ट्रीयता से है, युद्ध से है समाज को परिवर्तित करने वाले आन्दोलन से है। पश्चिमी देशों के कलाकार इन कर्मों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्वीकार नहीं करते। वे केवल कवि होकर जीना चाहते हैं।

आधुनिक होने की सार्थकता इसमें है कि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक स्तर पर अधिगत अद्यतन बौद्धिक विकास का स्फूर्तिपूर्वक सजग रूप में स्वागत करे या करने को तैयार रहे।

भाव बोध के दो अर्थ हो सकते हैं--एक तो भाव जगत् का सूक्ष्म और बाह्य भौतिक जगत् का स्थूल बोध व दूसरा जिसे हम हृदय का भाव कहते हैं, वह सत्ता।

भाव बोध अपने-अपने ढंग से सभी युगों में होता है। अर्थात् प्रत्येक युग के सभी क्षेत्रों के वैशिष्ट्य अलग-अलग होते हैं, जो कवि युग विशेष के इन सभी वैशिष्ट्यों को अपनी यथार्थता में सहज भाव से अपनी रचना में उतारकर रख देता है, उसे युग बोध प्रधान कवि कहते हैं। 

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