Sunday, 13 March 2022

संरचनावाद का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप बताइये।

संरचनावाद का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप बताइये। 

    संरचनावाद आज के युग की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और व्यापक बौद्धिक व्यवस्थापद्धति या प्रणाली है, जिसकी व्याप्ति में साहित्य, जीव-विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा नृतत्त्वशास्त्र आदि को समेटा जा सकता है। यह अमूर्त एवं जटिल प्रत्यय है। इसका मूल आधार है - भाषा विज्ञान । विभिन्न विषयों की व्याप्ति के कारण ही साहित्य की वैज्ञानिक आलोचना के लिए संरचनावाद का प्रयोग होने लगा है। पाश्चात्य आलोचक रोनाल्ड बार्थ ने इसी आधार पर कुछ व्यावहारिक समीक्षाएँ लिखी हैं।

    संरचनावाद का अर्थ और स्वरूप

    'संरचनावाद' विभिन्न अवयवों एवं घटकों से सम्पन्न वस्तुस्थिति के लिए प्रयुक्त होता है। प्रत्येक वस्तु का एक अवयव होता है, उसके अपने घटक होते हैं । इस विवेचन की पद्धति को ही 'संरचनावाद' का नाम दिया गया है।

    संरचनावाद के बीज-तत्त्व सभी रूपवाद में मिलते हैं, जहाँ सारा बल भाषा पर है। भाषा से बाहर उसे कुछ भी ग्राह्य नहीं है। ज्याँ पेजे ने इसके तीन घटकों का उल्लेख किया है--

    1. साकल्य - इसका अभिप्राय है विभिन्न इकाइयों की आन्तरिक संगति। यह स्वयं में पूर्ण होती है। यह अवयव-सहित और अवयव-रहित हो सकती है।
    2. रूपान्तरण - भाषा के विभिन्न घटकों के पारस्परिक सम्बन्धों का परिवर्तन संरचना में रूपान्तरण कहलाता है। रूपान्तरण की यह प्रक्रिया निरन्तर गतिशील होती है।
    3. आत्मानुशासन - संरचना अपने अनुशासन तथा नियमों के अनुसार कार्य करती है। इसके अपने आन्तरिक नियम होते हैं और उन्हीं के अनुसार यह अनुशासित होती है। संरचना के घटक आन्तरिक होते हैं। भाषिक सरंचना के शब्द 'तुम', 'आप', 'मैं' आदि सर्वनाम, कर्ता आदि हो सकते हैं।

    संरचना पूर्ण होती है। वह चाहे साहित्य की संरचना हो या मिथक की। किसी साहित्यिक कृति के घटकों का योग संरचना नहीं है । प्रत्येक घटक पूर्ण के अंग-रूप में, एक आन्तरिक नियम से परिचालित होकर संरचना का संश्लिष्ट अंश बनता है। घटक अंग हैं तो संरचना अंगी। दोनों में अंगांगी सम्बन्ध है। अतः संरचना अपनेआप में पूर्ण भी है और प्रक्रिया भी है।

    संरचनावाद की परिभाषा

    • डॉ. नरेश मिश्र के अनुसार--"भाषा-संरचना का मूलाधार संरचनात्मक पद्धति है। जिस प्रकार भवन-रचना में ईंट, सीमेन्ट, लोहा, शक्ति अर्थात् मजदूर और कारीगर की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार भाषा-संरचना में ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य, प्रोक्ति और अर्थ की अपनी-अपनी भूमिका होती है।'' इस दृष्टि से भाषा के अन्तर्गत ध्वनि-संरचना, शब्द-संरचना, पद-संरचना, वाक्य-संरचना, प्रोक्ति-संरचना, तथा अर्थ-संरचना का अध्ययन किया जाता है।
    • डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार--"किसी संघटना के अंगीभूत घटकों का क्रमविन्यास और पारस्परिक सम्बन्ध ही संरचना है।"
    संरचनावाद मूलतः एक पद्धति है । साहित्य की प्रत्येक विधा इस पद्धति पर आधारित है। यह वैज्ञानिक पद्धति है। संरचनावादी इसे साहित्यालोचन का विज्ञान भी कहते हैं। संरचनावादियों का सम्बन्ध अर्थ से न होकर पद्धति से होता है।

    संरचनावाद का आधार

    संरचनावाद का मूलाधार सस्यर का भाषा-सम्बन्धी अध्ययन है। वह भाषा के दो तत्त्वों का अध्ययन करते हैं --लॉग (भाषा) और पेरोल (वाक्)।

    भाषा के अपने नियम होते हैं । भाषा की अपनी एक परम्परा होती है। भाषा के अपने अमूर्त नियम होते हैं, जिनसे वाक् नियन्त्रित होता रहता है। भाषा वाक् में ही खण्डशः मूर्त होती है। वाक् वैयक्तिक उच्चारण है । वह भाषा के नियमों के आधीन है। दूसरो शब्दों में, वाक् को अभिव्यक्ति कह सकते हैं । सस्यूर ने भाषा और वाक् के अन्तर को शतरंज के खेल द्वारा स्पष्ट किया है--

    शतरंज के खेल के कुछ नियम हैं, जो अमूर्त हैं। ये अमूर्त नियम खेल के समय क्रियान्वित होते हैं। शतरंज के अमूर्त नियमों के समान भाषा के भी कुछ नियम हैं, किन्तु वास्तविक खेल को पेरोल (वाक्) कह सकते हैं। स्पष्टतः भाषा के अमूर्त नियम ही 'वाक् ' पर लागू होते हैं।

    प्रसिद्ध नृतत्त्ववेत्ता लेवी स्रौस अपनी संरचना के लिए सस्यूर से ही प्रेरणा ग्रहण करते हैं। आदिम मनुष्यों, कबीलों और मिथकों की संरचना की खोज वे रूपवादी याकोब्सन के मॉडल पर करते हैं। समस्त संसार के मिथकों का अध्ययन करते हुए वह उनके सर्वमान्य नियमों को स्पष्ट कर लेते हैं। एक ही मिथंक के भिन्न-भिन्न रूप वाक् हैं तो मूल मिथक भाषा है। वाक् के आधार पर भाषा के अपने नियमों को खोजना ही संरचना है।

    सस्यूर की यह पद्धति साहित्यिक रचना पर घटाई जा सकती है। रचना विशेष को पढ़ना ही वाक् है । आलोचक उसकी संरचना को खोजता है । वह रचना के द्वारा सम्पूर्ण साहित्य की पद्धति को खोजने का भी प्रयास करता है । साहित्य की एक मूल पद्धति होती है। विधाएँ उस पद्धति के विभिन्ना रूपान्तरण मात्र हैं। इस प्रकार संरचनावाद में उस पद्धति को महत्त्व दिया जाता है, जिसके अनुसार रचना का सृजन हुआ है। इसीलिए पद्धति के कारण ही रचना साहित्यिक कहलाती है।

    संरचनावाद का सीधा सम्बन्ध पाठ की समीपी छानबीन से है। उसके विभिन्न घटकों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा अंगों के साथ प्रत्येक घटक के सम्बन्धों के विश्लेषण से है। यह रूपात्मक संघटना पर बल देता है। कृति के पाठ को संरचनावाद महत्त्व नहीं देता। शैली-विज्ञान


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