Thursday, 3 February 2022

राजनीतिक सिद्धांत के पतन के प्रमुख कारणों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

राजनीतिक सिद्धांत के पतन के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए।

  • इतिहासवाद का राजनीतिक सिद्धांत के पतन में योगदान ।
  • राजनीतिक सिद्धांत के पतन हेतु उत्तरदायी कारकों का उल्लेख कीजिए।
  • राजनीतिक सिद्धांत के पतन के कारणों का उल्लेख कीजिए।

राजनीतिक सिद्धांत के पतन के कारण (Causes for the Decline of Political Theory)

डेविड ईस्टन तथा अल्फ्रेड कॉबेन जैसे विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धान्तों के ह्रास (पतन) कारणों की विस्तार से विवेचना की है। डेविड ईस्टन के अनुसार राजनीतिक सिद्धान्तों का अभ्युदय और उत्कर्ष सामाजिक अस्त-व्यस्तता और परिवर्तन की दशा में होता है। प्राचीन यूनान सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल ने प्लेटो और अरस्तू जैसे महान् विचारकों को जन्म दिया, इसी प्रकार मध्ययुग ने सामाजिक चिन्तकों को जन्म दिया। उनमें एक ओर सन्त आगस्टाइन सन्त और टॉमस एक्वीनास जैसे महान विचारक हैं जिन्होंने चर्च की सर्वोपरिता का समर्थन किया दूसरी ओर पाडुआ के मार्सीलियो और ओकम के विलियम हुए जिन्होंने राज्य को सर्वोच्च स्थान दिया। इंग्लैण्ड में 16वीं और 17वीं शताब्दी में राजदर्शन के अभ्युदय का कारण गहन धार्मिक और राजनीतिक विवाद की स्थिति रही है अथवा 18वीं शताब्दी में महान क्रान्ति की कोख से फ्रांस में नवीन राजनीतिक विचारों का उदय हुआ।

20वीं शताब्दी के मध्य में जैसा कि डेविड ईस्टन का कहना है हम सामाजिक तनाव और सांस्कृतिक परिवर्तन के बुनियादी संकट से गुजर रहे हैं। किन्तु यह आश्चर्य की बात है कि दुनिया के किसी भी कोने में राजनीतिक दर्शन का उत्कर्ष नहीं हुआ।

डेविड ईस्टन के शब्दों में, “समसामयिक राजनीतिक विचार एक शताब्दी पुराने विचारों पर परजीवी के रूप में जीवित हैं और सबसे बड़ी हतोत्साही बात यह है कि हम नए राजनीतिक संश्लेषणों के विकास की कोई संभावना नहीं देखते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि समाज विज्ञान किसी नए अरस्तू और किसी नए न्यूटन के आने का इन्तजार कर रहे हैं। यदि राजनैतिक सिद्धांत के लिए वर्तमान सम्भावनाएँ आने वाली घटनाओं के वास्तविक मोड़ की कोई द्योतक हैं. तो इस प्रकार का इन्तजार बेकार है क्योंकि हम ऐसी भूमि तैयार नहीं कर रहे हैं जिसमें क्रान्तिकारी रचनात्मक चिन्तन उत्पन्न हो सके।"

राजनीतिक सिद्धांत के ह्रास के निम्नलिखित कारण बतलाए जाते हैं -

1. नए 'राजनीतिक संश्लेषण' को विकसित करने में सफलता - सर्वप्रथम ईस्टन कहता है कि राजनीतिक सिद्धांत के पतन का कारण समकालीन राजनीति वैज्ञानिकों की शताब्दी पुराने विचारों पर नरता तथा उनकी नए राजनीतिक संश्लेषण को विकसित करने की असफलता है। वे पुराने घों के अन्वेषण तथा उन्हें उस वातावरण से जिसने पैदा किया था, मिलाने में लग रहे हैं। होंने अपने युग के मूल्यों के विषयों का पुनर्निर्माण नहीं किया जबकि अर्थशास्त्री तथा समाजशास्त्री अपनी धारणाओं, दृष्टिकोणों तथा सिद्धान्तों के निर्माण तथा पुनर्निर्माण में लगे रहे, राजनीतिक सिद्धांतकार भूतकाल के अध्ययन में ही लगे रहे। अतः राजनीतिक सिद्धांत को न का मुँह देखना पड़ा क्योंकि यह विकसित होने में असफल रहा तथा यह वर्तमान का वर्णन ने में असमर्थ हो गया।

2. राजनीतिक सिद्धांत की कमजोरी (Weakness of Political Theory) - ईस्टन की सूची में राजनीतिक सिद्धांत की एक अन्य कमजोरी यह है कि यह तथ्यों को भुलाकर तथ्यों में ही उलझा रहा। इसके आदर्शवादी चरित्र ने इसे एक विचारवादी सिद्धांत बना दिया जो समकालीन राजनीति के तथ्यों के परिणामों पर आधारित नहीं था। यह एक मूल्य सिद्धांत था। ईस्टन मूल्य सिद्धांत के महत्व को स्वीकार करता है लेकिन कहता है कि इसने तथ्यों के अध्ययन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया तथा कारण कार्य-सिद्धांत (Causal Theory) को कोई महत्व हीं दिया। यह अपने सिद्धान्तों को आनभाविक तथ्यों पर आधारित करने में असफल रहा। नने राजनीति के आनभाविक तथ्यों के व्यवस्थित अनुसन्धान की महत्ता को पहचाना नहीं। नलिए 20वीं शताब्दी में इसका पतन हो गया।

3. इतिहासवाद की बढ़ती हुई प्रवृत्ति - कतिपय विद्वानों का कहना है कि इतिहासवाद (Historicism) की बढ़ती हुई प्रवृत्ति के कारण भी राजनीतिक सिद्धांत का पतन हुआ है, न कि नवनिर्माण। प्लेटो, अरस्तू से लेकर 19वीं शताब्दी तक राजनीतिक सिद्धांत की रचनात्मक भूमिका रही, जिसका अर्थ यह था कि राजनीतिक चिन्तक अपने समय की घटनाओं का यथार्थ मूल्यांकन कर यह निर्देशित करते थे कि सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं को किस दिशा में मोड़ना चाहिए अर्थात् क्या होना चाहिए ? राजनीतिक सिद्धांत का स्थान अब राजनीतिक विचारों के इतिहास ने ले लिया और उसने उपर्युक्त रचनात्मक भूमिका त्याग दी, यही इतिहासवाद के नाम से जाना जाता है।

जी० एच० सेबाइन, आर० डब्ल्यू कार्लाइल, डब्ल्यू० ए० डनिंग, एच० सी० मैकिलवेन, ए० डी० लिण्डसे जैसे लेखकों ने पश्चिमी (यूरोपीय) देशों के इतिहास के सन्दर्भ में राजनीतिक सद्धान्त और उसके विकास का अध्ययन किया है। इनकी रचनाओं के गहन अध्ययन से पता लता है कि उन्हें नये मूल्य सिद्धांत के विश्लेषण और निर्माण करने में रुचि लेने की अपेक्षा समसामयिक व पुराने राजनीतिक मूल्यों के ऐतिहासिक विकास एवं आन्तरिक संगतता व भिप्राय के बारे में जानकारी को बनाए रखने विचार से अधिक प्रेरणा मिली है। इस प्रकार के विश्लेषण ने बौद्धिक गतिविधि की एक प्रजाति को समाप्त करने में मुख्य भूमिका निभाई है। 


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