अस्तित्ववाद का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।

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अस्तित्ववाद का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।

अस्तित्ववाद की निम्नलिखित तर्कों के आधार पर आलोचना की जाती है : 

अस्तित्ववाद की आलोचना 

  1. अस्तित्ववाद अनेक विचारों और प्रवृत्तियों का मिश्रण है। इसमें एक साथ परस्पर विरोधी विचार- उदारवाद, नाजीवाद. साम्यवाद के तत्व दिखलाई देते हैं, अतः इसे एक विशिष्ट दर्शन नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक दृष्टि से अस्तित्ववादियों में काफी भिन्नता है। किर्केगार्द अत्यन्त रूढ़िवादी था, 1848 में यह जन आन्दोलनों के दमन में गणतन्त्र का समर्थक था। जैस्पर्स उदारवादी है। हीडेगर कुछ समय तक नाजी रहे चुका था। सार्च काफी समय तक साम्यवादी दल से जुड़ा रहा। 

  2. अस्तित्ववादी बौद्धिकतावादियों की जिस शब्दावली एवं विचारों का विरोध करते हैं, प्रायः उनको ही अपनाकर उनकी विषय-वस्तु या प्रम्नावनाओं को मानने से इन्कार करते हैं। उनके तर्क अनुभववादियों से काफी मिलते-जुलते हैं, यद्यपि उनमें नाटकीयता अधिक पाई जाती है। 

  3. अस्तित्ववाद के मूल विचार बड़े ही अस्पष्ट और विरोधाभासी हैं। अस्तित्ववाद से सम्बन्धित प्रचुर साहित्य होने की बावजूद भी कोई व्यक्ति जो इस प्रकृत्ति के एकीकृत व विशद ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करता है उसे यह लगता है कि चलने के लिए कोई सपाट मार्ग नहीं है, बल्कि केवल एक भूल-भुलैया वाला विरोधाभासों से भरा रास्ता है। 

  4. आलोचकों के अनुसार यह निराशा, हताशा और त्रासदी का दर्शन है। आलोचक इस भयंकर दर्शन से हतप्रभ रहता है कि यद्यपि वह मानव अस्तित्व के यथार्थों से सम्बन्धित है, फिर भी क्या इसका इतना अमूर्त और इतना वीभत्स चित्रण होना चाहिए। 

  5. मार्क्सवादी आलोचक जॉर्ज लुकाक्स ने अस्तित्ववाद के व्यक्तिवाद को बुर्जुआ बुद्धि की बीमारी का चिह्न बताया है। बुर्जुआ व्यक्ति अपने समाज से मूल्यों को ग्रहण करने के बजाय अपने आन्तरिक अनुभव से अन्धविश्वासों का निर्माण करता जाता है. फिर उन्हें अपने चयन आदेश से अपने ऊपर तथा दूसरों पर थोपता है। 

  6. अस्तित्ववाद आज की महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का कोई ठोस विश्लेषण नहीं देता, वह एक प्रभावशाली आन्दोलन का रूप भी नहीं ले सका। 
आलोचकों के अनुसार अस्तित्ववाद को दर्शन का नाम देना उचित नहीं होगा और उसे राजनीतिक दर्शन की संज्ञा देना तो और भी अधिक अनुचित है। 1960 तक आते-आते अस्तित्ववाद का प्रभाव कम होने लगता है। 1960 में एक दुर्घटना में कामू की मृत्यु हो गई। जैस्पर्स और मार्सेल ने अस्तित्ववाद का परित्याग कर दिया। सार्च फ्रांस के साम्यवादी दल की गतिविधियों में अधिक उलझता गया। यह आश्चर्य की वात है कि फ्रांस को छोड़कर कहीं भी यह विचारधारा अधिक प्रभावपूर्ण नहीं बन सकी। कुल मिलाकर अस्तित्ववाद के सम्बन्ध में मुख्य बात यही है कि यह दमन और निरंकुशता के खिलाफ एक ऐसी प्रतिक्रिया है जिसकी सहानुभूति दिग्भ्रमित व्यक्ति के साथ है।

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