ज्यां पाल सार्त्र किस प्रकार के समीक्षक माने जाते हैं?

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ज्यां पाल सार्त्र किस प्रकार के समीक्षक माने जाते हैं?

ज्यां पाल सार्त्र एक कट्टर व्यक्तिवादी समीक्षक माने जाते हैं। चिंतन की अधुनातन प्रवृनियों में अस्तित्ववाद के प्रवर्तक ज्यां पॉल सार्त्र की राजनीति दर्शन में उपस्थिति ऐतिहासिक महत्व रखती है। नोबेल पुरस्कार पाने और उसे अस्वीकार कर देने वाले प्रखर चिन्तनशील रचनाकार सार्त्र व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व की अर्थपूर्ण व्याख्या करते हैं।

सार्त्र एक लेखक, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, सामाजिक अभिकर्ता. मानव मुक्ति के पैगम्बर, शब्दों के मसीहा-एक अद्भुत मिश्रण थे। उनका जीवन इस पूरी शताब्दी की सबसे महानतम् बौद्धिक घटना है। 70 वर्ष तक लेखन कर्म निभाने के बाद, एक के बाद एक सीढ़ियां, परिवर्तन के घुमावदार मोड़-आरम्भ में कल्पना लोक में रहने वाले सार्त्र-बाद में जगत में, सांसारिक घटनाओं में पूरी तरह निमज्जित-वे मानव स्वातन्त्र्य की आखिरी पुकार थे।

ज्यां पॉल सार्त्र का जन्म पेरिस में 1905 ई. में हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा पेरिस में लहाव्र तथा लाओन नामक विद्यालयों में हुई। बचपन में वह अपनी युवा विधवा मां के साथ पेरिस के अपने छठी मंजिल के मकान में रहते थे। सार्त्र के नाना चार्ल्स श्वाईलर. जर्मनी के लिए फ्रांसीसी संस्कृति और फ्रांसीसियों के लिए जर्मन संस्कृति का आदान-प्रदान करते थे। फ्रांसीसी और जर्मन ग्रन्थों से भरा नाना का अध्ययन कक्ष एक सांस्कृतिक स्मारक या जिसके बारे में सार्त्र ने लिखा है. "किताबों के बीच ही मेरी जिन्दगी शुरू हुई और इसमें सन्देह नहीं कि उसका अन्त भी इन्हीं के बीच होगा। उन्होंने लिखा है, "मैं कभी मिट्टी से नहीं खेला. न कभी पेड़-पौधे इकट्ठे किए, न मैंने घोंसले ढूंढे और न चिड़ियों पर पत्थर मारे। पुस्तकें. मेरी चिड़ियां, मेरे घोसले, मेरे पालतू जानवर, मेरे खेत-खलिहान सब कुछ धीं।"

छः वर्ष की आयु में सार्त्र ने लिखना सीखा और नौ वर्ष की आयु तक वह अपना लेखक होना स्थापित कर चुके थे। अपने प्रारम्भिक वर्षों में सार्त्र हमेशा अकेले रहे, कोई संगी-साधी नहीं। ये वास्तविक जगत से कटे हुए थे। 14 जुलाई, 1935 की ‘पापुलर फ्रण्ट' के महान् ऐतिहासिक जुलूस को वे अपने झरोखे से देखते भर रहे। वे नीचे उतरकर जुलूस में शामिल नहीं हुए। वे दार्शनिक थे, जगत में अलगावित अपनी मानस की दुनिया में रहते थे। उन दिनों वे सक्रिय कर्मी नहीं थे क्योंकि वे अराजनीतिक धे, इसीलिए 'पापुलर फ्रण्ट के लिए मतदान भी नहीं करते थे हालांकि श्रमिक वर्ग के इन आन्दोलनों को वे मानवीय गरिमा की सबसे बड़ी

अभिव्यक्ति मानते थे। स्वभाव से अराजक और अतिवादी सात्रं हर यथास्थिति के खिलाफ एक दिली सहानुभूति रखते थे और चाहते थे कि बूर्जुआ वर्ग का पूरी तरह से उन्मूलन हो। 1956 में हंगरी की क्रान्ति को कुचले जाने के बाद वह साम्यवादियों से नाता तोड़ लेता है।

सार्त्र ने बौद्धिक की परिभाषा करते हुए कहा कि केवल बौद्धिक कसरत से ही कोई बौद्धिकक नहीं हो जाता। जैसे इंजीनियर बौद्धिक हो राकता है जबकि इसका सारा कार्य श्रम पर निर्भर करता है। व्यावहारिक

ज्ञान के प्रविधिकारी अथवा टेक्नोक्रेट उस समय बुद्धिजीवी हो जाते है जब उनका ज्ञान सार्वभौमिक उद्देश्य रखते हुए भी किसी विशिष्ट वर्ग या कुछ-एक व्यक्तियों के सेवार्थ प्रयुक्त होने लगता है।

सार्त्र बुद्धिजीवियों की भूमिका का प्रबल आलोचक है। बौद्धिक क्रिया-कलापों का एक बड़ा उदाहरण वियतनाम युद्ध के समय मिलता है। कुछ-एक बुद्धिजीवियों ने वियतनाम युद्ध के खिलाफ संस्थाएं बनाई, नारे लगाए और यह दिखाने की चेष्टा की कि वियतनाम युद्ध किस-किस प्रकार में मानवता का अहित कर रहा है। इसमें डॉक्टर, वैज्ञानिक, इतिहासविद तथा न्यायाधीश सभी शामिल थे। सार्त्र इनको शास्त्रीय बुद्धिजीवियों की संज्ञा देते हैं क्योंकि ये कर्म के पथ पर अग्रसर नहीं होते। बुद्धिजीवियों से सार्त्र सक्रियता की मांग करते है। सार्त्र के शब्दों में, “मेमोरेण्डम, दस्तखत करके, जुलूस निकालकर चा वियतनामी युद्ध की निन्दा करने

से क्या होगा? चाहे लाखों लोग इसमें लगे रहें...कहीं कुछ नहीं होगा; किन्तु अगर कुछ चुने हुए बौद्धिक गन्दी बस्तियों में जाएं, आर्केलैण्ड पार्ट पर जाएं. युद्ध फैक्टरियों में जाएं तो फर्क जरूर पड़ेगा। मैं समझता हूं कि अपने दफ्तर में बैठकर जो बौद्धिक लड़ाई करता है, वह प्रति क्रान्तिकारी है, चाहे वह कुछ भी लिखें।

सार्त्र के अनुसार वियतनाम युद्ध की निन्दा करके अमेरिकन बौद्धिक उन विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे, जहां युद्ध पर शोध कार्य होते हैं। उसकी नजर में ऐसे बौद्धिक, दमन और हत्या के लिए उतने जिम्मेदार हैं जितनी कि सरकार है या सरकारी संगठन है।

ज्यां पाल सार्त्र की आलोचना 

सार्त्र एक कट्टर व्यक्तिवादी विचारक है जिसके लिए अस्तित्ववाद और मानववाद पर्यायवाची है। यह ऐसी सामाजिक व्यवस्था का समर्थक है जिसमें मानव स्वतंत्रता और मानव सामाजिक सम्बन्ध साथ-साथ चलते हैं। मार्क्सवाद को वह तब तक अधूरा मानता है जब तक अस्तित्ववाद को उसके आधार के रूप में स्वीकार न कर लिया जाए।

गिल और शर्मन के अनुसार सार्त्र अस्तित्ववाद का मानवीकरण है। कतिपय आलोचकों के अनुसार उसने अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद को मिलाने का प्रयास किया है। इसका यह परिणाम हुआ कि वह मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद दोनों का समर्थन करता है और नये अनुभवों के सन्दर्भ में दोनों परस्पर विरोधी विचारधाराओं में संशोधन करके अपने ही तरीके से उनका सामंजस्य करना चाहता है जो एक आलोचक को यह कहने के लिए मजबूर करता है कि “सार्त्र ऐसा विचित्र समाजवादी है जो शायद ही कभी हुआ हो। 

वस्तुतः सार्त्र वर्तमान साम्यवादी व्यवस्थाओं का आलोचक एवं ऐसी नई व्यवस्था का समर्थक प्रतीत होता है जिसमें मानव स्वतंत्रता और मानव सामाजिक सम्बन्ध साथ-साथ रहते हैं। "अलगाव की पीड़ाओं को हटाना चाहिए, चाहे वह बुर्जुआ समाज में हो या समाजबादी समाज जिसकी स्थापना एक सफल क्रान्ति के परिणामस्वरूप निन्दनीय वुर्जुआ प्रणाली को हटाकर की गई है।"

आलोचकों के अनुसार सार्त्र का दर्शन सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से क्रान्तिकारी दर्शन माना जाता है। उसकी चेष्टा "हर व्यक्ति को उस दिशा में सजग करना है कि वह क्या है और उसके अस्तित्व की पूरी जिम्मेदारी उसी पर रखना है।"

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