द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं बताइए।

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द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं बताइए। 

मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की मुख्य विशेषता यह है की यह सिद्धांत हीगल के दर्शन पर आधारित है लेकिन वह हीगल के द्वंद्वावाद से भिन्न है। मार्क्स ने स्वयं कहा है कि "मैंने हीगल के द्वंद्वावाद को सिर के बल खड़ा पाया इसलिए मैंने उसे सीधा कर पैरों के बल खड़ा कर लिया।"

मार्क्स के अनुसार, "हमारा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद हीगल के द्वंद्वात्मक से भिन्न नहीं है बल्कि ठीक इसके विपरीत है उनके अनुसार मानव मस्तिष्क की जीवन प्रक्रिया अर्थात् मनन और चिन्तन की प्रक्रिया जिसे वह 'विचार' का नाम देकर स्वतंत्र विषय के रूप में परिवर्तित कर देता है वास्तविक जगत 'विचार' का बाहा संगठनात्मक रूप है इसके विपरीत हमारे लिए आदर्श मानव के मन में वास्तविक भौतिक जगत के प्रतिबिम्ब से भिन्न कुछ नहीं है जो विचारों के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसकी कुछ निम्नलिखित विशेषताएँ इस प्रकार से हैं

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं

(1) आँगिक एकता - द्वंद्वावाद के अनुसार विश्व एक भौतिक जगत है जिसमें वस्तुएँ एवं घटनाएँ एक-दूसरे के साथ सम्बद्ध हैं। प्रकृति के सभी पदार्थों में पारस्परिक निर्भरता है तथा आँगिक एकता पाई जाती है प्रकृति एक सम्पूर्णता है इसका प्रत्येक पहलू दूसरे पर निर्भर करता है तथा यह एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

(2) गुणात्मक परिवर्तन - मार्क्स का मत है कि विकास की प्रक्रिया में एक ऐसा समय आता है जबकि यह परिवर्तन परिमाणात्मक के स्थान पर गुणात्मक होने लगता है। मार्क्स का कथन है कि जल उष्ण नोकर भाप बनता है और फिर ताप के गिर जाने पर वही जल ठोस बनकर बर्फ बन जाता है और वही बर्फ पिघलकर अपने मूल तत्व पानी में मिल जाती है तथा भाप जल से अलग और बर्फ भाप से अलग गुण रखती है। इस प्रकार जो विचार विभिन्न विचारों के टकराव से उत्पन्न होते हैं उनमें भी विभिन्न गुणों का सम्मिश्रण पाया जाता है। इस तरह मार्क्स ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में सदैव परिमाणात्मक परिवर्तन ही नहीं वरन् एक ऐसी भी स्थिति आ जाती है जबकि परिवर्तन परिमाणात्मक के स्थान पर गुणात्मक भी होने लगते हैं।

(3) गतिशीलता की विरोधपरकता - मार्क्स इस बात में विश्वास करता है कि विकास की प्रक्रिया में गतिशीलता पाई जाती है उससे यह सिद्ध होता है कि जगत् का विकास परस्पर विरोधी आर्थिक शक्तियों के कारण होता है। मार्क्स का विचार है कि गतिशीलता में सदैव विरोधी तत्त्वों का मिश्रण पाया जाता है।

(4) निषेध के निषेध का सिद्धांत - इनका मत है कि विकास क्रम की प्रत्येक श्रेणी अपनी पूर्ववर्ती श्रेणी की प्रतिरोधी होती है यह सिद्धांत निषेध का निषेध कहलाता है। इस सिद्धांत में यह बतलाया जाता है कि मानव समाज के विकास की कौन-कौन सी अवस्थाएँ हैं तथा उनका पारस्परिक सम्बन्ध पाया जाता है।

(5) वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया सरल नहीं - इस सिद्धांत के अनुसार वस्तुओं में विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया सरल नहीं है वस्तुएँ सरलता से आगे की ओर बढ़ती हैं वरन् उनका रूपान्तर होता रहता है।

(6) विश्व का रूप एक अवयवी का रूप है - मार्क्स के अनुसार, विश्व का रूप एक अवयवी का रूप है जिसके सब अंग व सभी वस्तुएँ परस्पर सम्बन्ध व अन्योन्याश्रित हैं। वे सब एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं व एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं।

(7) प्राकृतिक जगत की आर्थिक तथ्यों के आधार पर व्याख्या - इस द्वंद्वात्मक सिद्धांत में प्राकृतिक जगत की आर्थिक व्याख्या आर्थिक तथ्यों के आधार पर करता है और पदार्थ को समस्त विश्व की नियन्त्रक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है।

(8) विरोधी विचारों का समन्वय - मार्क्स का यह भी विचार है कि समाज के अन्दर जो परस्पर विरोधी श्रेणियाँ पाई जाती हैं वे विकास के कार्य में सहायक होती हैं इस सिद्धांत के आधार पर यह पता लगाया जाता है कि विकास अन्तर्विरोधी अवस्था में किस प्रकार होता है।

(9) पूँजीवाद के विनाश का सिद्धांत - मार्क्स का मत है कि दो विरोधी भावनाएँ पाई जाती हैं। एक प्रतिक्रिया व दूसरी प्रतिवाद कहलाती हैं। पूँजी को मार्क्स प्रतिक्रिया के नाम से जाना जाता है और श्रम को प्रतिवाद नाम देता है। मार्क्स का कथन है कि पूँजीवाद के कारण उत्पादन में वृद्धि होती है और श्रमिकों को संगठन का अवसर मिलता है। पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग में जो संघर्ष उत्पन्न होता है उस संघर्ष से पूँजीपतियों की संख्या कम होने लगती है और श्रमिक वर्ग संगठित होकर पूँजीपतियों का विनाश करने हेतु जुड़ जाता है। धीरे-धीरे श्रमिक वर्ग पूँजीपति वर्ग को समाप्त कर देता है। 

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