स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति - Swatantra Bharat Mein Mahilaon Ki Sthiti

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स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति - Swatantra Bharat Mein Mahilaon Ki Sthiti

स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति - Swatantra Bharat Mein Mahilaon Ki Sthiti

स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्थिति

स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आया। यद्यपि आधुनिक काल में सामाजिक परिवर्तन की नवीन शक्तियों ने स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को प्रभावित किया तथापि यह कहना अनुचित होगा कि उनकी स्थिति में सकारात्मक रूप से आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में महिलाओं को समतुल्य स्थान प्रदान करने हेतु विशेष प्रावधान किये गये। महिलाओं की स्थिति बीते दशकों में बहुत बदली है। यह बदलाव विशेषकर कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी हुआ है, जहाँ पुरुषों का वर्चस्व था और अपने प्रयासों से महिलाओं ने इन लक्ष्मण रेखाओं को भी तोड़ा है जो वर्षों से उनके लिए खींची गयी थी।

स्वतंत्रता से लेकर वर्तमान समय तक भारतीय महिलाओं की प्रस्थिति के आकलन के लिए उनका सामाजिक, आर्थिकए वं राजनैतिक क्षेत्र में वास्तविक हस्तक्षेप को जानना होगा।

पिछले दशकों में भारत में महिलाओं की प्रस्थिति का विश्लेषण समाज वैज्ञानिकों को अचंभित कर देता है। इसका कारण है एक ओर महिलाएँ घर से काम के लिए बाहर निकली हैं, अपने अधिकारों और कानूनी संरक्षण के प्रति जागृत दिखाई दे रही हैं, विभिन्न मंचों से समयसमय पर अपने विचारों को प्रकट कर रही हैं, वहीं वे समाज की दोहरी सोच के कारण पीड़ा में हैं। पिछले दो दशकों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उन पर यह दबाव लगातार बना हुआ है कि वे घर और परिवार की आर्थिक सुदृढ़ता के लिए आर्थिक सहयोग दें, धन अर्जित करें, स्वयं को किसी न किसी ऐसे कार्य में संलग्न करें जिससे अर्थ सर्जन हो, वहीं दूसरी ओर उनसे यह अपेक्षा पूर्वोत्तर कायम है कि घरेलू दायित्वों का भी वह निर्वहन करें। यह सोच अमूमन युवा वर्ग से लेकर प्रौढ़ावस्था के लोगों तक की है। चिल्ड्रेन्स मूवमेंट फॉर सिविक अवेयरनेस (सी.एम.सी.ए.) का शोध यह बताता है कि देश के ज्यादातर युवा मानते हैं (57 प्रतिशत) कि महिलाओं को मुख्य रूप से परिवार और बच्चों की देखभाल करनी चाहिए। परन्तु यह सोच इस तथ्य को पुरजोर तरीके से स्वीकार करती है कि परिवार की आर्थिक सुदृढ़ता के लिए महिलाओं को घर से बाहर निकलकर काम करना चाहिए। इस दोहरी सोच के चलते देश की महिलाएँ अवसाद का शिकार हो रही है।

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किसी भी समाज में स्त्री की स्थिति को मापने का सबसे सहज तरीका है 'उसके निर्णय लेने की क्षमता'। यह क्षमता तभी उत्पन्न हो सकती है जब स्त्री आत्मनिर्भर हो, परन्तु यह 'आत्मनिर्भरता' स्त्रियों की सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरी है। आम राय यही है कि बीते दशकों में महिलाएँ आत्मनिर्भर हुई हैं, परन्तु विभिन्न शोध इस तथ्य को नकार रहे हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन में श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी में तीव्र कमी दर्ज की गयी है। वर्ष 2004-05 से 2010-11 के बीच इसमें 12 से 14 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई क्योंकि कृषि से इतर और अपने आवास के आसपास उनके लिए रोजगार के सुरक्षित अवसर नहीं थे। कोई भी इस गिरावट की स्पष्ट वजह नहीं बता पाया पर यह तय है कि भारत में महिलाओं के प्रति कार्यस्थलों में संवेदनशीलता का अभाव है। स्त्री की आत्मनिर्भरता सिर्फ अपने परिवार को आर्थिक सुदृढीकरण देने की पहल मात्र नहीं थी,अपितु यह उसके आत्मविश्वास को बनाए रखने के लिए बेहद अहम बिन्दु है, परन्तु पितृसत्तात्मक भारतीय समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो इस स्वतंत्रता का न केवल पुरजोर विरोधी है, बल्कि अपने झूठे दंभ को बनाए रखने के लिए वह उसे किसी भी सीमा तक हानि पहुँचाने से गुरेज नहीं करता। वह इससे भली-भांति परिचित है कि स्त्री अपने विरुद्ध हो रहे दैहिक, मासिक या मौखिक अत्याचार का सहजता से विरोध नहीं करेगी, क्योंकि भारतीय समाज में तथाकथित प्रतिष्ठा का मोल जीवन से भी कहीं अधिक है।

भारतीय समाज में स्त्री जीवन की किसी भी समस्या को आम वर्ग से लेकर खास तक संवेदनशीलता से नहीं लिया जाता है। ऑफिस में महिलाओं की सुरक्षा पर सिर्फ तीन प्रतिशत संस्था ही ध्यान देती है। चौंकाने वाली बात यह है कि मुम्बई में कार्यस्थल पर ही यौन उत्पीड़न को लेकर बने कानून के बारे में ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को जानकारी ही नहीं। 'कॉम्पलाई करो' नामक निजी संस्थान द्वारा किए गए शोध में पता चला क8 6प,तिशतस स्थानोंक के न्द्रस रकारके म हिलाउ त्पीड़न (रोकथाम निषेधव निवारण) अधिनियम 2013 के बारे में पता ही नहीं है।

भारतीय महिलाओं का देश की राजनीति में हस्तक्षेप, उनकी वास्तविक प्रस्थिति को बताता है। भारतीय राजनीति की बात करें तो स्वतंत्रता के बाद जब 1951 में पहली लोकसभा बैठी तो उसमें सिर्फ 22 महिला सदस्य थी और 2014 के लोकसभा चुनाव में 66महिलाएँ चुनकर लोकसभा पहुँची। इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन (आई.पी.यू.) की रिपोर्ट तो यही बताती है कि भारत की संसद या विधानसभा में महिला जनप्रतिनिधियों की काफी कम उपस्थिति महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है।

यह सत्य है कि महिलाओं को उनके अधिकार तो मिल गए हैं, लेकिन उसके प्रयोग की स्वतंत्रता नहीं मिली है। यहाँ तक कि विभिन्न शोध यह भी बताते हैं कि भारत में राजनीति में आने के महिलाओं के अधिकार से उन्हें रोका जाता है। उन्हें शारीरिक हिंसा और हिंसा की धमकी देकर रोके जाने के प्रयास किए जाते हैं।

स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक महिलाओं की स्थिति को सुधारने हेतु अनेक संवैधानिक उपायों एवं योजनाओं को क्रियान्वित किया गया। सातवीं पंचवर्षीय योजना में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा महिलाओं हेतु 27 लाभार्थी उन्मुख योजनाओं की संकल्पना शुरू हुई। वहीं आठवीं योजना (1992-97) में लैंगिक परिदृश्य और सामान्य विकासात्मक क्षेत्रों के द्वारा महिलाओं के लिए निधियों के निश्चित प्रवाह को सुनिश्चित करने पर बल दिया गया। नौवीं पंचवर्षीय योजना में 'महिला घटक योजना' को एक प्रमुख कार्य नीति के रूप में अंगीकार किया गया तथा दसवीं पंचवर्षीय योजना में, लैंगिक भेद को समाप्त करने एवं लैंगिक प्रतिबद्धताओं को बजट प्रतिबद्धताओं में परिवर्तित करने के लिए 'जेंडर बजटिंग' के प्रति प्रतिबद्धता को बल दिया गया। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण पत्र में लैंगिक विभाजन की रेखा को समाप्त करने की कटिबद्धता दृष्टिगोचर होती है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य भी लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना है।

भारतीय महिलाएँ वैदिक संस्कृति से लेकर आज तक विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई अपनी अनंत यात्रा को यथावत बनाए रखे हुए हैं। इस यात्रा के मध्य बहुत कुछ बदला, परन्तु यदि कुछ नहीं बदला तो वह महिलाओं की सहिष्णुता, संघर्षशीलता एवं जीवटता। शायद यही कारण है कि विभिन्न अवरोधों के बावजूद भी महिलाएं अपनी पहचान बना रही है और यही उनकी विजय है। 

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