Tuesday, 4 January 2022

भारत के राष्ट्रपति की स्थिति के सम्बन्ध में संवैधानिक प्रधान की धारणा का विश्लेषण कीजिए।

भारत के राष्ट्रपति की स्थिति के सम्बन्ध में संवैधानिक प्रधान की धारणा का विश्लेषण कीजिए।

भारत के संवैधानिक प्रधान कौन है ?

भारत का संवैधानिक प्रधान राष्ट्रपति होता है परन्तु वास्तविक शक्ति मंत्रिपरिषद में है जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है। भारतीय संविधान राष्ट्रपति को स्पष्ट शब्दों में मन्त्रिपरिषद का परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं करता, किन्तु फिर भी संविधान में प्रयुक्त वाक्यांशों से यह स्पष्ट है कि उसे ऐसा करना ही होगा।

पालनेदा के अनुसार, 'यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि उसे अपनी शक्तियों का प्रयोग संविधान के अनुसार करना है। इसका अर्थ यह है कि वह संवैधानिक शासक मात्र रहेगा। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर ने इस सम्बन्ध में कहा, "राष्ट्रपति की वही स्थिति है जो ब्रिटिश संविधान में सम्राट की है। वह राष्ट्र का प्रधान है, कार्यपालिका का नहीं। वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, उसका शासक नहीं। वह साधारणतया मन्त्रियो के परामर्श को मानने के लिए बाध्य होगा। वह न उसके परामर्श के विरुद्ध कुछ कर सकता है और न उसके परामर्श के बिना ही।" भूतपूर्व प्रधानमन्त्री नेहरू ने भी संविधान सभा में लगभग इन्ही शब्दों को दोहराते हुए कहा था, 'हम सरकार की इस मन्त्रिमण्डलीय विशेषता पर बल देना चाहते हैं कि वास्तविक शक्ति मन्त्रिमण्डल और व्यवस्थापिका में निहित है न कि राष्ट्रपति में। हमने अपने राष्ट्रपति का वास्तविक शक्ति नहीं दी है, वरन हमन उनके पद को गौरव और . प्रतिष्ठा से विभूषित किया है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था' संविधान में ऐसी कोई बात नहीं है जिसके कारण राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह मानने के लिए बाध्य हो फिर भी यह आशा की जाती है कि जैसे इंग्लैण्ड का राजा हमेशा अपने मन्त्रियों की सलाह को मानता है, वैसी ही प्रथा इस देश में भी अपना ली जायेगी और राष्ट्रपति सब कामों में केवल नाममात्र का शासक रहेगा।

वास्तव में भारतीय संविधान द्वारा जिस संसदात्मक शासन व्यवस्था की स्थापना की गई है, उसके अन्तर्गत राष्ट्रपति एक वास्तविक प्रधान हो ही नहीं सकता संसदात्मक शासन में कार्यपालिका, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। अतः व्यवहार में कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग उन्हीं व्यक्तियों के द्वारा किया जा सकता है जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। व्यवस्थापिका के प्रति कैबिनेट उत्तरदायी होती है। राष्ट्रपति नहीं अतः स्वभाविक रूप से शासन की शक्तियों का प्रयोग कैबिनेट द्वारा किया जा सकता है। और राष्ट्रपति केवल एक औपचारिक प्रधान होता है। इसी बात को स्पष्ट करते हुए पं. नेहरू ने 7 जुलाई 1959 को दोहराया था कि “हमारा संविधान राष्ट्रपति को इंग्लैण्ड के सम्राट या साम्राज्ञी जैसी स्थिति प्रदान करता है। अगर ऐसा नहीं हो तो मन्त्रिमण्डल और संसद के उत्तरदायित्व के प्रश्न को हानि पहुँचेगी।

यदि राष्ट्रपति जानबूझकर मन्त्रिपरिषद के परामर्श की अवहेलना करता है, तो मन्त्रिपरिषद त्याग पत्र दे देंगे, जिसके परिणामस्वरूप संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न हो जायेगा। यदि मन्त्रिमण्डल के दल का संसद में बहुमत है और यदि उनकी नीतियों' को सार्वजनिक समर्थक प्राप्त हैं, तो राष्ट्रपति के लिए त्यागपत्र देने वाले मन्त्रिमण्डल के स्थान पर दूसरे मन्त्रिमण्डल का निर्माण करना कठिन होगा। वैसे तो राष्ट्र के सर्वोच्च पद को धारण करने वाले व्यक्ति से इस बात की आशा की जा सकती है कि उसके द्वारा विवेकपूर्ण आचरण किया जायेगा, लेकिन यदि राष्ट्रपति दुराग्रही और अत्यधिक महत्वाकाँक्षी हो जाता है, तो फिर उसके विरुद्ध महाभियोग लगाया जा सकता है।

दिसम्बर 1970 में 'संसदीय अध्ययन संस्थान ने लोकसभा भंग करने के संवैधानिक प्रश्न पर सेमिनार आयोजित किया था जिसमें अपने विधानशास्त्रियों, न्यायविदों और राजनीतिज्ञों को आमन्त्रित किया गया।

इस 'सेमिनार' में भाग लेने वाले लगभग सभी वक्ताओं डॉ. हृदयनाथ कुंजरु, न्यायमूर्ति दास, जॉर्ज बर्गीज, बी. के. पी. सिन्हा, तारकेश्वरी सिन्हा, अजित प्रसाद जैन व डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने कहा कि राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सहायता और परामर्श स्वीकार करने के लिए बाध्य है। यू० एन० आर० राव की रिट याचिका पर निर्णय देते हुए मुख्य न्यायाधीश सीकरी ने भी 17 मार्च 1971 को कहा था कि “संविधान का 74वां अनुच्छेद आदेशात्मक है और राष्ट्रपति कैबिनेट की सहायता तथा परामर्श के बिना कार्य नहीं कर सकता है।"

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय संविधान और राजनीतिक व्यवस्था के कार्यकरण की उचित विवेचना है, लेकिन बारहवी तथा तेरहवीं लोकसभा के चुनाव ने जिस राजनीतिक स्थिति को जन्म दिया है। उसके आगे भी बने रहन की संभावना है और इस राजनीतिक स्थिति के सन्दर्भ में इस बात पर सभी विधिवेत्ता (एफ एस नरीमैन, सोली सोराबाजी और के० के० वेणुगोपाल, आदि लगभग सभी) सहमत हैं कि दो बातों के सम्बन्ध में राष्ट्रपति निश्चित रूप से अपने विवेक के अनुसार कार्य करने के लिये स्वतन्त्र है। ये दो बातें हैं .

  1. प्रधानमंत्री का दमन
  2. लोकसभा को भंग करना।

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि सामान्यतया राष्ट्रपति एक संवैधानिक अध्यक्ष ही हैं और अत्यन्त विशेष परिस्थितियों में ही उनके द्वारा किन्हीं मामलों में अपने विवेक का प्रयोग किया जा सकता है। राष्ट्रपति वेंकटरमण ने एक अवसर पर टिप्पणी की थी कि 'राष्ट्रपति का पद आपातकालीन प्रकाश व्यवस्था की भाँति है। संकट की स्थिति में इसकी भूमिका स्वतः प्रारम्भ हो जाती है और संकट समाप्त हो जाने पर इसकी भूमिका स्वतः समाप्त हो जाती है। इस सम्बन्ध में श्री. एच. एम. जैन लिखते हैं कि “राष्ट्रपति की शक्तियों का प्रश्न कानून नहीं वरन एक राजनीतिक प्रश्न है तथा इसका उत्तर कानूनी अथवा संविधान के प्रश्नों पर उतना निर्भर नहीं करता, जितना व्यावहारिक राजनीतिक की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ये परिस्थितियाँ हैं -

  1. संसद में विविध पक्षों की स्थिति तथा उनका नेतृत्व
  2. राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री के मध्य परस्पर सम्बन्धों की स्थिति
  3. राष्ट्र की स्थिति,
  4. जनमत की स्थिति।

उदाहरण के लिए यदि देश में बाहरी आक्रमण या आन्तरिक अव्यवस्था के कारण आपात की स्थिति हो, प्रधानमन्त्री एक निर्बल व्यक्तित्व वाला व्यक्ति हो और उसे लोकसभा में क्षीण बहुमत प्राप्त हो, तो निःसन्देह जनता संरक्षण और निर्देशन के लिए राष्ट्रपति की ओर उन्मुख हो सकती हैं, विशेषकर यदि राष्ट्रपति सुदृढ़ चरित्र वाला और प्रभावशाली व्यक्ति है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में द्वितीय श्रेणी का प्रधानमंत्री भी राष्ट्रपति पर छाया रहेगा।


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