Monday, 13 August 2018

चार मित्र पंचतंत्र की कहानी। Panchtantra Story of Four Friends in Hindi

चार मित्र पंचतंत्र की कहानी। Panchtantra Story of Four Friends in Hindi

Story of Four Friends in Hindi
एक झील के किनारे चार प्राणी रहते थे – कौवा, कछुआ, चूहा और हिरण। कौवा वृक्ष पर रहता था, कछुआ जल में निवास करता था, चूहा बिल में रहता था और हिरण झाड़ी में रहता था। चारों प्राणियों में बड़ी मित्रता थी। चारों साथ-साथ रहते थे, प्रेम से बातचीत और सुख तथा शांति के साथ जीवन व्यतीत किया करते थे। 

एक दिन दोपहर के पश्चात का समय था। कौवा, चूहा और कछुआ तीनों झील के किनारे बैठ कर आपस में बातचीत कर रहे थे। हिरण वहां नहीं था। वह सवेरे भोजन की खोज में गया था, पर अभी तक लौटकर नहीं आया था। चूहा चिंतित होकर बोला, ’सवेरे का गया हुआ हिरण अभी तक लौटकर नहीं आया। कहीं ऐसा तो नहीं, वह किसी विपत्ति में फंस गया हो।’ 

कछुआ बोला, ’अवश्य वह किसी विपत्ति में फंस गया है। नहीं तो लौटने में इतनी देर ना लगाता। वह प्रतिदिन दोपहर के पहले ही आ जाता था। कौवा बोला, ’यदि ऐसी बात है, तो मैं पता लगाने के लिए जा रहा हूं। हिरण जहां भी कहीं होगा, मैं पता लगा कर शीघ्र ही लौट आऊंगा।’ कौवा अपनी बात समाप्त करके उड़ गया। वह उड़ते-उड़ते इधर-उधर देखता हुआ हिरण को पुकारने लगा, ’मित्र हिरण, तुम कहां हो ?’ 

अचानक ही कौवे के कानों में किसी का मंद-मंद स्वर पड़ा, ’मैं यहां हूं, मित्र। मैं यहां हूं।’ वह आवाज हिरण की थी। कौवा हिरन की आवाज को पहचानकर आश्चर्य से अपने आप ही बोल उठा, ’अरे, यह तो मित्र हिरण की ही आवाज है।’ कौवा तुरंत ही नीचे उतरा और हिरण के पास जा पहुंचा। हिरण जाल में फंसा हुआ था। कौवा उसे जाल में फंसा हुआ देखकर बोला, ’अरे, यह क्या ? तुम तो जाल में फंस गए हो।’ हिरण बड़े ही दुख के साथ बोला, ’हां मित्र, मैं जाल में फंस गया हूं। अब तो कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे मुझे जाल से मुक्ति मिल सके।’ 

कौवा बोला, ’घबराओ नहीं, धैर्य से काम लो। मैं शीघ्र ही मित्रों के पास जाकर उन्हें खबर करता हूं। हम तीनों तुम्हारी मुक्ति का कोई ना कोई उपाय अवश्य खोज लेंगे।’ कौवा हिरण को आश्वासन देकर उड़ चला और थोड़ी ही देर में मित्रों के पास जा पहुंचा। तीनों मित्र बड़ी उत्सुकता के साथ कौवे का इंतजार कर रहे थे। तीनों मित्र कौवे को देख कर एक ही साथ बोल उठे, ’कहो, मित्र, हिरण का कहीं पता चला ?’ कौवा बड़े ही दुखी स्वर में बोला, ’पता तो चल गया है, भाई, पर वह एक बहेलिया के जाल में फस गया है। हमें शीघ्र ही उसके छुटकारे के लिए कोई उपाय करना चाहिए। यदि देर हो गई तो बहेलिया उसे पकड़ के ले जाएगा और मार के खा जाएगा।’  

कौवे की बात सुनकर कछुआ बोला, ’हां भाई, हमें हिरण के छुटकारे के लिए अवश्य कोई उपाय करना  चाहिए। मित्र चूहे को जाल के पास पहुंचा कर जाल को काटा जा सकता है। अतः हम सब को बहेलिए के आने से पूर्व ही वहां पहुंचकर जाल को काटना होगा। फिर क्या था, कौवा, कछुए और चूहे के साथ हिरण को जाल से मुक्त कराने के लिए निकल पड़ा। चूहे ने फौरन ही जाल को काट कर हिरण को मुक्त करा लिया। जब बहेलिया वहां पहुंचा तो वह दुख से अपना माथा ठोककर रह गया। जाल के कटने का तो उसे इतना दुख नहीं था, जितना दुख मोटे-ताजे हिरण के निकल भागने का था, पर अब क्या हो सकता था ? 

बहेलिया जब वापस जाने लगा तो उसकी नजर कछुए पर पड़ी। कछुआ धीरे-धीरे रेंगता हुआ झाड़ी की ओर जा रहा था। कछुए को देखकर बहेलिए ने सोचा हिरण तो हाथ से निकल ही गया है, अब कछुआ ही सही। आज इसी से पेट की पूजा की जाएगी। बहेलिया ने कछुए को उठाकर थैले में रख लिया। वह थैला कंधे पर रखकर अपने घर की ओर चल पड़ा। जब बहेलिया दूर चला गया, तो कौवे ने अपने दोनों मित्रों को आवाज दी, “हिरण भाई, आओ। चूहे भाई, तुम भी बिल से बाहर निकलो।” कौवे की आवाज को सुनकर हिरण आ गया। चूहा भी बिल से निकल आया और कौवा भी नीचे उतर आया। तीनों मित्र इस नई मुसीबत पर विचार करने लगे। कौवे ने कहा, “बहेलिया कछुए को अपने थैले में रख कर ले गया है। हमें उसे छुड़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि वह उसे लेकर घर पहुंच गया, तो मार कर खा जाएगा।” 

कौवे की बात सुनकर हिरण बोला, “हां, हमें कछुए को छुड़ाने के लिए अवश्य कोई उपाय करना चाहिए। मुझे एक उपाय सूझा है। मैं बहेलिए के मार्ग में जाकर घास चरने लगूंगा। बहेलिया जब मुझे देखेगा तो उसके मन में लालच उत्पन्न हो जाएगा। वह थैले को जमीन पर रखकर मुझे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेगा। मैं पहले तो लंगड़ाता हुआ भागूंगा, पर कुछ दूर जाने पर चौकड़ी भरने लगूंगा। बहेलिया मुझे पकड़ नहीं सकेगा।” बहेलिया थैले को जमीन पर रख दे, तो चूहे को वहां पर पहुंचकर थैले को काटकर कछुए को छुड़ाना होगा। हिरण की बात दोनों मित्रों को पसंद आई। दोनों ने कहा, “ठीक है ऐसा ही करेंगे।” 

हिरण शीघ्र ही बहेलिए के मार्ग में जा पहुंचा और हरी-हरी घास चरने लगा। बहेलिए ने जब हिरण को देखा तो उसके मुंह में पानी आ गया। वह झट से थैले को जमीन पर रखकर, हिरण को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा। पहले तो हिरण लंगड़ाता हुआ भागने का दिखावा करने लगा, पर जब कुछ दूर निकल गया, तो चौकड़ी भरता हुआ बहेलिए की आंखों से ओझल हो गया। बहेलिया ने जब थैले को कंधे से उतारकर जमीन पर फेंका, उसके तुरंत बाद ही चूहा वहां पहुंच गया। उसने थैले को काटकर कछुए को छुड़ा लिया। बहेलिया जब हिरण को पकड़ नहीं सका। तो निराश होकर थैले के पास लौटा, पर यहां तो थैला भी फटा हुआ था और कछुए का कहीं अता-पता नहीं था। 

बहेलिया माथा ठोकता रह गया और अपने आप ही बोल उठा, “हाय, आज ना जाने किसका मुंह देख कर चला था, जिसे भी पकड़ता हूं वह हाथ से निकल जाता है। हिरण तो निकल ही गया और कछुआ भी हाथ ना लग सका। आज तो भूखा ही रहना पड़ेगा।” बहेलिया जब अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया तो चारों मित्र पुनः एकत्र हुए और प्रसन्नता प्रकट करते हुए आपस में बातचीत करने लगे। चारों मित्र हंसते गाते हुए झील के किनारे गए और सुख तथा शांति से जीवन व्यतीत करने लगे। 

कहानी से शिक्षा: 
अधिक से अधिक मित्र बनाना सबसे बड़ा गुण है। 
सच्चा मित्र वही है, जो विपत्ति में काम आता है। 
अपने को संकट में डाल कर भी मित्र की सहायता करनी चाहिए।


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