Saturday, 20 July 2019

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध

दोस्तों आज हमने राष्ट्रभाषा हिंदी की गिरती स्थिति पर निबंध लिखा है। यह निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 और 12 के लिए उपयुक्त है। Here you will find essays and paragraph on Hindi language for students.

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और यह भारत में बहुतायत से बोली जाती है। परंतु फिर भी भारत में इसकी स्थिति उत्तरोत्तर गिरती जा रही है। इस निबंध के माध्यम से हम जानेंगे कि आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का पतन हो रहा है। 

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (150 शब्द) 

यद्यपि हिंदी भारतवर्ष की राजभाषा है परंतु वर्तमान में इसकी स्थिति अत्यंत दयनीय है। यदि हमसे पूछा जाए कि हमने हिंदी भाषा की स्थिति में सुधार के लिए क्या किया है तो सिवाय इसके कि हम मौन होकर रह जाएं या दो चार आयोग के नाम गिना दें परंतु कोई तथ्य पूर्ण उत्तर नहीं दे सकते। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज भी विदेशी मानसिकता से पीड़ित कुछ ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी को हिंदी से श्रेष्ठ समझते हैं और इसी कारण आज हिंदी को अपने ही देश में तिरस्कृत होना पड़ रहा है। हिंदी भाषियों को हीन दृष्टि से देखा जाता है। यही नहीं देश के प्रमुख नेता, राजनेता, अभिनेता आदि अंग्रेजी बोलकर अपने अहम की पुष्टि करते हैं। अतः हम सभी को चाहिए कि हम अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग करें तभी इसकी स्थिति में सुधार आ सकता है। यह भी पढ़ें हिंदी भाषा का महत्व पर निबंध

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (200 शब्द)

आज भारतवर्ष को स्वतन्त्र हुए 72 वर्ष हो चुके हैंपरंतु इसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वास्तविकता तो यह है कि हिंदी जहां थी वहीं है, और दक्षिण भारत के राज्यों में तो इसकी स्थिति और भी बुरी है। यद्यपि भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया गया था परंतु वह सिर्फ सिर्फ एक दिखावा था। कई लोगों का मानना है कि हिंदी अभी पूर्णतया विकसित भाषा नहीं है परंतु इस तथ्य में कदापि सच्चाई नहीं है। ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो हिंदी को अच्छी तरह बोलना व लिखना जानते हैं लेकिन वे अपने मिथ्याभिमान का प्रदर्शन अंग्रेजी बोलकर करते हैं, फिर चाहे वो सरकारी व्यक्ति हो या आम आदमी। वास्तविकता तो यह है कि यदि आप भारत में किसी अहिंदी भाषी राज्य में भी चले जाएं तो वहां भी सभी लोग टूटी-फूटी हिंदी बोल तथा समझ सकते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में पिरौती है अतः हम सभी को हिंदी की स्थिति में सुधार के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए अब स्थिति काफी सुधर गयी है। बैंकों में चैक हिन्दी में स्वीकार किये जाते हैं। रेलवे टिकिट में हिन्दी अनिवार्य है। न्यायालयों के निर्णय भी हिन्दी में आने लगे हैं। आशा है कि राष्ट्रं भाषा निकट भविष्य में अपना वांछित स्थान और गौरव प्राप्त कर लेगी। Related : राष्ट्रभाषा की समस्या

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (300 शब्द)

आज हिंदी भाषा भारतवर्ष के कोने-कोने में बोली जाती है और इसे देश की राजभाषा का भी दर्जा प्राप्त है परंतु अंग्रेजी के प्रति हमारे झुकाव के कारण आज हिंदी की स्थिति सोचनीय हो गई है। समाज में अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है जबकि हिंदी भाषी को हीन दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे लोगों का मानना है कि हिंदी अभी पूर्णतया विकसित नहीं है। वह अंग्रेजी भाषा को हिंदी से श्रेष्ठ समझते हैं। हमारे देश के नेता अभिनेता विदेशों में तो छोड़िए, अपने ही देश में अंग्रेजी का इस प्रकार प्रयोग करते हैं मानो अंग्रेजी ही उनकी मातृभाषा हो। वास्तविकता यह है कि हिंदी ना केवल अंग्रेजी से श्रेष्ठ है अपितु यह अंग्रेजी से प्राचीन भी है।रामायण, रामचरितमानस, महाभारत जैसे महाकाव्य हिंदी में ही लिखे गए। अतः हिंदी का साहित्य अंग्रेजी की अपेक्षा अधिक समृद्ध है। दु:ख की बात यह है कि हिन्दी जगत में नये साहित्यकार उत्पन्न नहीं हो रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी साहित्य को अधिक और अधिक रुचिकर सक्षम और समृद्ध बनाया जाए।यह प्रसन्नता का विषय है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में भी कुछ सीमा तक हिन्दी का अच्छा विकास हुआ। हमारे पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी में भाषण देकर सबको चौंका दिया था। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी शपथ के बाद प्रथम भाषण हिन्दी में देकर हिन्दी को गौरवान्वित किया और भारतवासियों के हदय में आशा की किरण जाग्रत की। अब स्थिति काफी सुधर गयी है। बैंकों में चैक हिन्दी में स्वीकार किये जाते हैं। रेलवे टिकिट में हिन्दी अनिवार्य है। न्यायालयों के निर्णय भी हिन्दी में आने लगे हैं। आशा है कि राष्ट्रभाषा निकट भविष्य में अपना वांछित स्थान और गौरव प्राप्त कर लेगी। अतः हम सब का कर्तव्य है कि हम सभी लोग मिलकर हिंदी भाषा को उसकी खोई हुई स्थिति वापस दिलाएं क्योंकि मातृभाषा का प्रयोग करना गौरव का विषय है ना कि हीनता का

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (1900 शब्द)

आज भारतवर्ष को स्वतन्त्र हुए 72 वर्ष हो चुके हैं, परन्तु यदि हमसे पूछा जाये कि हमने हिन्दी के उत्थान के लिये क्या किया, तो सिवाय इसके कि हम मौन होकर रह जायें, या दो चार आयोग के नाम गिना दें, कुछ तथ्यपूर्ण उत्तर नहीं दे सकते। यह प्रश्न हम अपने से करते तो उत्तर मिलता कि हिन्दी जहाँ थी, वहीं है और दक्षिणी राज्यों में तो उससे भी बुरी स्थिति में है। राजर्षि टण्डन, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी आदि नेताओं के जीवनकाल में, या स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व हिन्दी को अपनी भाषी समझकर हम लोग आदर करते थे या यों कहिये कि केवल अंग्रेजों को दिखाने के लिए हमारे अन्दर वह जोश था। यद्यपि भारतीय संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया गया था, फिर भी आज तक उसे समुचित स्थान प्राप्त नहीं हो सका है। यह निश्चय किया गया था कि चूंकि हिन्दी अभी इतनी समर्थ नहीं है, इसलिए हिन्दी के साथ सन् 1965 तक सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी।
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सन् 1965 आने से बहुत पहले ही अंग्रेजी के प्रबल समर्थक सचेत हो गए। उन्हें भय हुआ कि कहीं हिन्दी में आ जाये। इसके लिए उखाड़-पछाड़ शुरू हो गई। सन 1965 में ही लोक सभा में एक विधेयक लाने का प्रयत्न किया गया कि अभी हिन्दी इस योग्य नहीं हुई है कि राष्ट्र-भाषा के पद पर आसीन हो सके। अतः सन् 1965 के बाद भी अंग्रेजी की अवधि बढा दी जाये। नवम्बर में ही इस प्रकार का विधेयक लोकसभा में आने वाला था, जिसे तत्कालीन गृहमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री प्रस्तुत कर रहे थे, परन्तु 20 अक्टूबर, सन् 1962 को चीनी आक्रमण के कारण आपातकालीन स्थिति घोषित हो जाने के कारण यह विधेयक उस समय टल गया। पुनः सन् 1963 में इस विधेयक को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक की धारा इस प्रकार थी—

  • इस कानून का नाम राजभाषा कानून होगा, 
  • हिन्दी का अर्थ देवनागरी में लिखित है, 
  • सन् 1965 के बाद हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकता है, 
  • दस वर्ष बाद तीन संसद सदस्यों की एक समिति हिन्दी की पुनः जाँच करेगी, 
  • सन् 1965 के बाद केन्द्रीय कानूनों या राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश या संविधान के अन्तर्गत जारी किए नियम आदि के हिन्दी अनुवाद प्रामाणिक माने जायेंगे। 
  • सन् १९६५ के बाद किसी विधान सभा द्वारा स्वीकृत कानून के हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किये जा सकते हैं, 
  • सन् 1965 के बाद किसी राज्य के राज्यपाल राष्ट्रपति से अनुमति लेकर अंग्रेजी के साथ हिन्दी व राज्य की और किसी भाषा को राज्य-भाषा का स्थान दे सकते हैं, तथा 
  • केन्द्रीय सरकार राज्य भाषा सम्बन्धी कानून के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए नियम बना सकती है।
स्वर्गीय पं. जवाहरलाल नेहरू ने उक्त विधेयक का बड़ा समर्थन किया और कांग्रेस संसदीय पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने अपनी निम्नलिखित राय जाहिर की—“इस समय देश में एकता रखना अत्यन्त आवश्यक है। हिन्दुस्तान को बिगाड़ कर हिन्दी की तरक्की नहीं हो सकती। हमें दक्षिण के लोगों में यह विचार पैदा नहीं होने देना चाहिये कि उत्तर वाले उन पर हिन्दी थोप रहे हैं।” ‘हिन्दी तथा अहिन्दी भाषियों को दो भागों में बाँट देने से देश का भारी अहित होगा। हिन्दी को रजामंदी से आगे ले जाना है, अगर हिन्दी वाले जबरदस्ती करेंगे तो दूसरे लोग विरोध करेंगे। इससे ऐसी खाई पैदा हो जायेगी जो हिन्दी के लिए ही नहीं वरन् पूरे देश के लिए घातक सिद्ध होगी। हिन्दी का और ताकत मिलेगी, यदि हिन्दी के साथ अंग्रेजी को सहायक भाषा रहने दिया जाए, क्योंकि अंग्रेजी के जरिये नये-नये विचार आते रहेंगे।

इस विधेयक को लोक सभा में प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन गृहमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था कि-"आप मुझ पर विश्वास रखें, मेरे द्वारा हिन्दी का अहित कभी भी नहीं हो सकता, परन्तु मुझे अपना कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी पूरा करना है। परन्तु दूसरी बात उन्होंने भी स्वयं स्वीकार करते हुए कहा कि “जब तक हिन्दी विकसित नहीं हो जाती और जब तक लोग उसे अच्छी तरह से सीख नहीं लेते, तब तक अंग्रेजी को बनाये रखना ही पड़ेगा। आज अंग्रेजी सभी राज्यों की साझी भाषा है और राज्यों तथा केन्द्रों के बीच पत्र-व्यवहार भी उसी में होता है। यदि अगले पाँच वर्षों में अंग्रेजी का त्याग कर दिया गया, तो भारत अपने आप अलग-अलग भागों में बँटकर बिखर जायेगा।” शास्त्री जी के वक्तव्य से भी ध्वनित होता था कि हिन्दी अविकसित थी। हिन्दी के मूर्धन्य कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने इस विधेयक के विषय में कहा था-"अंग्रेजी को आगे जो इतनी आयु दी जा रही है वह सावधि होगी या निरावधि? हिन्दी-भाषी राज्यों का मत है कि अंग्रेजी के प्रयोग को निरावधि नहीं छोड़ना चाहिये। दिनकर ने यह सोचा था कि एक अवधि ही निश्चित हो जाये तो अच्छा है।

भारतीय लोक सभा के अन्य सदस्यों की भाँति श्री अनन्त गोपाल शेवड़े भी इस विधेयक को प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा था कि- “देश के सारे नेताओं को जो शासन के भीतर तथा बाहर हैं, और जो राजनीतिक, सांस्कृतिक या साहित्यिक क्षेत्रों में काम करने वाले हैं। ऐसा वातावरण निर्माण करने का प्रयत्न करना चाहिये, जिससे इस विषय पर शान्ति से न्याययुक्त और तर्कयुक्त बुद्धि से केवल राष्ट्रीय हित में विचार हो सके, उसमें क्रोध, अविश्वास और राजनीतिक पैंतरेबाजी के लिये स्थान न हो। राज-भाषा के प्रश्न पर विचार करते हुये हमें राष्ट्र हित को ही सर्वोपरि रखना चाहिये, राजनीतिक दलगत स्वार्थों से तो हिन्दी या राष्ट्र का अहित ही होगा है।”

हिन्दी को ही यदि राष्ट्र भाषा बना दिया गया तो और भाषायें अशक्त या अप्रतिभा हो जायेंगी या हिन्दी में ही श्रेष्ठ और सत्साहित्य है इसका मतलब यह कभी नहीं समझना चाहिये और यह भी नहीं सोचना चाहिये कि हिन्दी उन पर थोपी जा रही है क्योंकि दक्षिणात्य समझते हैं। कि हम भी भारत माता की संतान हैं, हिन्दी हैं, संस्कृत की उत्तराधिकारिणी हिन्दी हमारे देश की राष्ट्र-भाषा है। दक्षिणात्यों में जितना देववाणी संस्कृत का अध्ययन है, उसका शतांश भी उत्तर वालों में नहीं। अधिकांश दक्षिणवासी हिन्दी का समर्थन करते देखे गये हैं। श्री रसक पुन्निगे का कथन था कि हिन्दी साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग, मुम्बई, आगरा आदि की हिन्दी परीक्षायें दक्षिण में खूब चलती हैं। लगभग 15 वर्ष से राज्य स्कूलों और कॉलिजों में हिन्दी अध्यापन की व्यवस्था है। दक्षिण में हिन्दी का समर्थन करने वालों का एक कट्टर समुदाय भी है, जो हिन्दी के लिये सब कुछ त्याग सकता है। दक्षिण में अधिकाधिक मात्रा में हिन्दी फिल्में दिखाई जाती हैं।

15 सदस्यों ने विधेयक के विरोध में मत दिया। प्रसिद्ध कांग्रेसी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार सेठ गोविन्ददास ने कांग्रेसी होते हुए भी विधेयक का लोक सभा में घोर विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि, “भले ही मुझे कांग्रेस छोड़नी पड़े पर मैं आँखों देखा विष नहीं खा सकता।" परिणाम वही हुआ जो होना था। विधेयक बहुमत से पास हुआ। इसके पश्चात् राज्य सभा में भी थोड़े बहुत नेताओं के विरोध के पश्चात् यह विधेयक पास हो गया। अब अंग्रेजी आगे भी बारह वर्षों तक राष्ट्र-भाषा के रूप में बनी रही, इसे संयोजक भाषा कहा गया। 10 वर्ष बाद हिन्दी की स्थिति पर फिर विचार हुआ।

हिन्दी को संविधान ने राष्ट्र-भाषा स्वीकार किया, इसके पीछे भी भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों का बल निहित था।

1967 के आम चुनावों के पश्चात् बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों की सरकारों ने हिन्दी में ही कार्य करने का दृढ़ संकल्प लिया, उधर छात्रों में मातृ भाषा के प्रति अपूर्व श्रद्धा उमड़ती हुई दिखाई पड़ी, हिन्दी भाषी प्रान्तों में अंग्रेजी में लिखी हुई कोई भी वस्तु दिखाई न पड़े इसलिए छात्रों ने अंग्रेजी के साइन बोर्डों की जगह हिन्दी के साइन बोर्ड लगाइये, अंग्रेजी को वैकल्पिक विषय घोषित कर दिया। हिन्दी टाइप राइटरों के निर्माण के लिए कंपनियों को आदेश दे दिये गये। विधान सभा की निश्चित कार्यवाहियां हिन्दी में की जाने लगीं। सरकारी कार्यायलों को आदेश दे दिये गये कि अपना सारा काम हिन्दी में करें। सहसा एक बार ऐसा प्रतीत होने लगा कि शायद हिन्दी के दुर्दिन बीत चुके हैं।

सन् 1965 के बाद भी अंग्रेजी को संयोजक भाषा के रूप में प्रथिष्ठित करने वाले विधेयक के पास हो जाने पर भी बहुत से लोग शासन की भाषा नीति से प्रसन्न नहीं थे। परिणामस्वरूप राजभाषा विधेयक संशोधक बिल राज्यसभा तथा लोकसभा में पस्तुत किया गया। विरोधी दलों के विरोध के बावजूद संशोधन पास हो गया।

उधर हिंदी भाषा मंत्रिमंडल अपने अपने राज्यों में केंद्रीय सरकार के इस निर्णय के विरूद्ध थे और अपने राज्यों में अंग्रेजी को प्रोत्साहित करने के पक्ष में नहीं थे। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने सन् 1968 प्रारंभ होते ही अंग्रेजी को परिक्षाओं से निकाल बाहर फेंकने के लिए वैकल्पिक विषय घोषित कर एक पुनीत कर्तव्य का पालन किया। बिहार और राजस्थान में भी सरकारों ने इसी प्रकार के पवित्र निर्णय लिये। राजस्थान में तो यह सुविधा तक दी गई कि टेलीफोन पर हिन्दी अंग्रेजी के हिन्दी पर्यायवाची शब्द बताये जाने लगा।

प्रसन्नता का विषय है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में भी कुछ सीमा तक हिन्दी का अच्छा विकास हुआ तथा अन्य प्रदेश भी इस ओर प्रयत्नशील हुए। 1967 के आम चुनावों के बाद नये शिक्षा मंत्री श्री त्रिगुणसेन ने इस ओर विशेष रूचि ली। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल का रुख भी हिन्दी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण था। हमारे पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी में भाषण देकर सबको चौंका दिया था। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी शपथ के बाद प्रथम भाषण हिन्दी में देकर हिन्दी को गौरवान्वित किया और भारतवासियों के हदय में आशा की किरण जाग्रत की। बिहार के मन्त्रिमण्डल ने हिन्दी को सरकारी भाषा घोषित कर बड़ा पुनीत कार्य किया।

हिन्दी के आज तीन स्वरूप हैं। पहला स्वरूप भारतीयों की मातृभाषा का, दूसरा स्वरूप राजभाषा का और तीसरा स्वरूप भारत से बाहर बस जाने वाले प्रवासी भारतीयों का । हिन्दी का तीसरा स्वरूप सर्वाधिक व्यापक उसका विश्व भाषा वाला रूप है। मारीशस फिजी गियाना सरीनाम श्रीलंका इण्डोनेशिया थाइलैण्ड और जापान को मिलाकर तीस ऐसे देश हैं जहाँ कई लाख की संख्या में भारतवासी बसे हुये हैं और आपसी व्यवहार में हिन्दी का प्रयोग करते हैं। हिन्दी आज विश्व की प्रमुख भाषाओं की पंक्ति में जा पहुँची है। उसके बोलने वालों की संख्या के अनुसार संसार में तीसरा स्थान हिन्दी का है। पिछले वर्षों में सम्पन्न हुये विश्व हिन्दी सम्मेलनों के कारण हिन्दी के इस तीसरे स्वरूप की चर्चा अधिक जोरों पर है। ये सम्मेलन जनवरी 1975 में भारत के नागपुर शहर में और अगस्त 1976 में। मारीशस में सम्पन्न हुये। निश्चित ही इन सम्मेलनों के सत्यप्रयासों का प्रभाव विश्व के बौद्धिक जनमानस पर पड़ा और हिन्दी ने संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया। 1977 से प्रतिष्ठित भारत सरकार के विदेश मन्त्री के संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य विदेशों की यात्राओं में हिन्दी के प्रयोग से सम्भवतः विश्व में हिन्दी को आगे बढ़ने में कुछ बल मिला, परन्तु हिन्दी की स्थिति यथावत् रही। भारत की समृद्धि की जहाँ अनन्त उपलब्धियाँ रहीं वहाँ हिन्दी की समृद्धि बहुत मन्द रही। राजीव गाँधी के युग में भी यही स्थिति रही। सन् 1996 तक हिन्दी का कोई महत्त्वपूर्ण उत्थान नहीं हुआ।

अब स्थिति काफी सुधर गयी है। बैंकों में चैक हिन्दी में स्वीकार किये जाते हैं। रेलवे टिकिट में हिन्दी अनिवार्य है। न्यायालयों के निर्णय भी हिन्दी में आने लगे हैं। आशा है कि राष्ट्रं भाषा निकट भविष्य में अपना वांछित स्थान और गौरव प्राप्त कर लेगी। दु:ख की बात यह है कि हिन्दी जगत में नये साहित्यकार उत्पन्न नहीं हो रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी साहित्य को अधिक और अधिक रुचिकर सक्षम और समृद्ध बनाया जाए।

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