Monday, 12 March 2018

राष्ट्रभाषा की समस्या। Rashtrabhasha Ki Samasya


राष्ट्रभाषा की समस्या। Rashtrabhasha Ki Samasya

Rashtrabhasha Ki Samasya

भारत सांस्कृतिक परंपराओं की विविधता एवं भाषाओं की बहुलता से विशिष्टता प्राप्त किए हुए हैं। इस तथ्य के कारण इसमें अलग ही आकर्षण और सौंदर्य है किंतु राजनीति में झूठे नेताओं के दिमाग इतने खराब कर रखे हैं कि जो कोई मुद्दा नहीं उसे भी मुद्दा बनाए हुए हैं कि भारत में बहुत सी भाषाएं हैं यह तो गर्व का विषय है ना की किसी समस्या का। यह भारत की समृद्धि और विविधतापूर्ण संस्कृति का द्योतक है किंतु भारत में निराश और असफल राजनीतिज्ञ भाषा के नाम पर लोगों को हिंसा करने के लिए भड़काते हैं। इन चीजों का अंत होना चाहिए। हमें प्रत्येक विषय के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना है। हमें भारत के विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाओं से प्यार करना है और उन्हें सम्मान देना है। साथ ही साथ हमें एक संपर्क भाषा का भी विकास करना है क्योंकि भारत के अधिकांश लोगों द्वारा हिंदी बोली जाती है अतः इसी को सभी की संपर्क भाषा अपनाए जाने का स्वाभाविक दावा होना चाहिए। क्षेत्रीय भाषाओं को भी उन्नति एवं विकास के अवसर मिलने चाहिए। उनका सामान्य संपर्क भाषा से संबंधित होना उनको समृद्ध बनाएगा ना कि उन्हें हानि प्रदान करेगा। हिंदी भारत की भाषा है। जो लोग दक्षिण राज्यों में रहते हैं वह भी भारत के हैं। इन राज्यों में कुछ लोगों के द्वारा हिंदी का प्रतिरोध क्यों? भारत की चीजों के प्रति घृणा क्यों? हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी के प्रतिस्थापन की वकालत करना देश भक्ति के विरुद्ध है। कोई भी विदेशी भाषा भारत की राष्ट्रीय भाषा नहीं हो सकती और ना ही होनी चाहिए। अंग्रेजी को यहां जरूर रखना चाहिए¸ इसका अध्ययन भी किया जाना चाहिए क्योंकि यह विश्व की अत्यंत समृद्धि भाषाओं में से एक है और भारतीयों के लिए बाहरी दुनिया के लिए एक खिड़की के समान है। इसकी भूमिका यहीं समाप्त हो जाती है किंतु राष्ट्रीय एकता और भावनात्मक एकजुटता¸ सांस्कृतिक विकास और सामाजिक परिवर्तन हेतु समस्त भारत के लिए एक लिंक भाषा का होना अत्यंत अनिवार्य है। जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि जिस राष्ट्र के पास अपनी भाषा नहीं है वह गूंगा है और वह वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता। भाषा हमारी संस्कृति का अंग है और सांस्कृतिक गरीबी से राष्ट्रीय पहचान और व्यक्तित्व का नाश हो जाता है।

भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन एक बड़ी भूल थी जिसकी हमें काफी कीमत चुकानी पड़ी है किंतु जो हो गया सो हो गया। उसमें अब कुछ नहीं हो सकता। देशभक्त नागरिकों की हैसियत से भाषायी मामलों पर हमें स्वार्थी राजनीतिज्ञों के इशारों पर आंदोलित नहीं होना चाहिए। यदि हमें कोई शिकायत है तो इसके समाधान के लिए हमें सकारात्मक रूप से सोचना चाहिए। नीचे कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं जिनको भाषायी विषयों को स्पष्ट पैटर्न पर रखने¸ भाषायी संवेदना का आघात पहुंचने से बचने और भाषा की समस्या के समाधान हेतु क्रियान्वित किया जा सकता है-

(1) त्रिभाषा फार्मूला का तत्परतापूर्ण क्रियान्वयन।

(2) गैर पब्लिक स्कूलों में अंग्रेजी के अध्ययन को उन्नत करना जिसमें कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अंग्रेजी का ज्ञान पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के ज्ञान के बराबर हो।

(3) जिन भाषाओं को अभी तक कोई सरकारी दर्जा प्रदान नहीं किया गया है उनके दावे को मान्यता प्रदान करना।

(4) भारत के विभिन्न भागों के विद्वानों और बुद्धिजीवियों में अधिक गहरे संपर्क का संवर्धन।

(5) हिंदी के द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं के अधिक संख्या में शब्द अपनाना जिससे एक ऐसी भाषा का विकास हो सके जिसमें भारत की सभी मुख्य भाषाओं के शब्द हों।

(6) भाषा के मुद्दे पर एक आम एवं व्यापक राष्ट्रीय सहमति किंतु इससे पूर्व इस विषय पर किसी निम्नतम अवधि के लिए राष्ट्रीय डिबेट आवश्यक हो चुकी हो। राष्ट्रीय सहमति प्राप्त करने के पश्चात उसका तत्परतापूर्ण कार्यान्वयन।

(7) अंग्रेजी शिक्षा की खुद अपनी खातिर क्रेज समाप्त होना चाहिए। अंग्रेजी से अधिक हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के अच्छे ज्ञान को अधिक सम्मान प्रदान किया जाना चाहिए और उच्च स्तर पर रोजगार के मामले में अंग्रेजी के द्वारा हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए स्थान खाली करना चाहिए।

(8) भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी के अतिरिक्त और कोई भी विदेशी भाषा नहीं हो सकती जिस प्रकार चीन ने चीनी भाषा को और रूस ने रूसी भाषा को अपनी राज भाषाओं का दर्जा दिया है।

(9) हमारी प्रतिभा और मस्तिष्क की सुषुप्त शक्तियों के वास्तविक विकास के लिए मातृभाषा ही शिक्षा का माध्यम होनी चाहिए। एक समय बद्ध कार्यक्रम होना चाहिए जिससे उत्तरोत्तर अंग्रेजी से हिंदी या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा के माध्यम से प्रतिस्थापित किया जा सके।

(10) विभिन्न विषयों के लेखकों को भारतीय भाषाओं में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अंग्रेजी की भूमिका अंतरराष्ट्रीय संपर्कों तक सीमित रखनी है। इसका अध्ययन पूरी गंभीरता से किया जाना चाहिए क्योंकि हमारी भाषाओं की उसकी संगति से उन्नति नहीं¸ ह्वास नहीं।

इसी प्रकार के उपायों से हमें भाषा की समस्या से मुक्ति मिल सकती है। आइए भारत के हम सभी वर्ग और क्षेत्र अपने चिंतन को सकारात्मक रूप में लगाएं। हमें क्षेत्रीय अंधभक्ति का परित्याग करना चाहिए चाहे वह किसी प्रकार की हो और भाषा के प्रति अंधभक्ति का परित्याग तो और भी अधिक आवश्यक है। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत लिंक भाषा के त्वरित विकास की आवश्यकता और साथ ही साथ क्षेत्रीय भाषाओं के उन्नयन हेतु जोर डाला गया है। हमारी एक राष्ट्रभाषा अवश्य होनी चाहिए और वह हिंदी के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा नहीं हो सकती। जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि एक राष्ट्र सच्चे अर्थों में राष्ट्र नहीं है यदि उसके पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है।


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