Saturday, 13 January 2018

भगवान महावीर की कहानी। lord mahavir story in hindi

भगवान महावीर की कहानी। Lord Mahavir Story in Hindi

Lord Mahavir Story in Hindi

भगवान महावीर को वर्धमान महावीर भी कहा जाता है। वर्धमान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व बारत में बिहार के बैशाली के निकट कुण्डग्राम में हुआ था। वैशाली लिच्छवी साम्राज्य की राजधानी थी। वह कुण्डग्राम के राजा सिद्धार्थ और त्रिशला के सुपुत्र थे। सिद्धार्थ नाथ वंश के शूरवीर परिवार से बंध रखते थे। वर्द्धमान महावीर की माँ त्रिशला राजा चेटक की बहन थीं जो वैशाली के शक्तिशाली और सुप्रसिद्ध लिच्छवी राजा थे। वर्धमान महावीर के एक बड़े भ्राता थे जिनका नाम था- नंदीवर्धन।  वर्धमान महावीर की छः मौसियाँ थीं पूर्वी भारत के विभन्न राजाओं के साथ जिनका विवाह हुआ था। इस प्रकार वर्धमान विभिन्न राजओं से ताल्लुक रखते थे और जैन धर्म के सुधार में उन्होंने भरपूर सहायता की थी।

यह गलत धारणा थी कि वर्धमान महावीर जैन धर्म के संस्थापक थे। लेकिन बहुत से भारतीय और पश्चिमी विद्वान तथा इतिहासकारों ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्तापक नहीं थे वे धर्म-प्रवर्तक थे। उन्होंने 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ के सिद्धांतों को परिष्कृत और प्रचारित किया था।

वर्धमान महावीर को एक राजकुमार के रूप में सभी प्रकार की शिक्षा मिली थी। उन्होंने साहित्य¸कला¸दर्शनशास्त्र¸प्रशासनिक विज्ञान आदि शिक्षा बहुत शीघ्र और आसानी से ग्रहण कर ली थी। परंतु दुनिया की किसी भी वस्तु से उन्हें कोई लगाव नहीं था उनका मन तो वैराग्य से भरा हुआ था। वे इस दुनिया को त्यागकर वैराग्य लेना चाहते थे परंतु उनके माता-पिता ये नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र वैराग्य ले।

जब वर्धमान महावीर 28 वर्ष के थे तब उनके माता-पिता का देहांत हो गया। अब वह बैराग्य लेने के लिए स्वतंत्र थे। परंतु उनके भाई नंदीवर्धन ने वर्धमान महावीर को कुछ समय तक वैराग्य न लेने के लिए प्रार्थना की तो अपने बड़े भाई का मान रखते हुए उन्होंने 30 वर्ष तक राजमहल में रहने की उनकी बात मान ली। इन दो वर्षों में वर्धमान महावीर संन्यासी जीवन जीने का अभ्यास करने लगे।

उसके बाद जब वे 30 वर्ष के हो गए तो उन्होंने अपनी सारी व्यक्तिगत संपत्ति जरूरतमंद और गरीबों को दान कर दी शेष संपत्ति को वे अपने घर पर ही छोड़ गए। फिर वे जंगलों में नंगे पाँव घूमे उन्होंने वहाँ तपस्या की और अपना संपूर्ण समय उन्होंने किसी से कुछ बोले बिना जंगलों में ही व्यतीत किया। इस दौरान उन्होंने बहुत कम खाया और अधिकांशतः उन्होंने बिना कुछ खाए-पिए ही जीवन गुजारा। लोगों ने उन्हें तंग भी किया परंतु वे शांत रहे। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।

12 वर्ष बाद 42 की उम्र में उन्होंने सत्य की खोज कर ही ली। अर्थात् उन्हें कैवल्य की प्राप्ति हुई और वे अर्हत या जिन कहलाए। फिर वर्धमान महावीर दिगंबर भिक्षु बन गए। उन्होंने बिना किसी गाड़ी के पूर्वी भारत के विभिन्न् प्रांतों की यात्रा की जो बिहार¸ झारखंड¸ पश्चिमी बंगाल¸ उड़ीसा और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं। उन्होंने इन सब स्थानों पर उपदेश दिए। उनके तीन सिद्धांत जैन धर्म के तीन रत्न हैं- सम्यक् ज्ञान¸ सम्यक् धर्म और सम्यक् आचरण। उनके महाव्रत थे- सत्य¸¸ अहिंसा¸अस्तेय(चोरी न करना) ¸ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। उनका ध्येय था कि हर मनुष्य मोक्ष प्राप्त करे। वर्धमान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त कर लिया था।  आज उनके सिद्धांतों का संपूर्ण विश्व अनुसरण करता है। 

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