Sunday, 7 April 2019

अयोध्या राम मंदिर विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अयोध्या राम मंदिर विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

“जन्मभूमि ममपुरी सुहावन  
गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार ये शब्द हैं भगवान राम के। अथर्ववेद में भी अयोध्य का उल्लेख “ईश्वर के नगर” के रूप में मिलता है। शास्त्रों के अनुसार अयोध्या की स्थापना महाराज मनु द्वारा की गयी थी। प्रागैतिहासिक काल में अयोध्या सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही थी, उन्हीं में से थे महाराजा दशरथ और उनके पुत्र भगवान “राम”। यह नगर सरयू नदी के तट पर बसा है और वर्तमान युग में उसे मन्दिरों का शहर भी कहा जाता है। यहाँ हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा इस्लाम सभी धर्मों के प्राचीन मंदिर अथवा उनके अवशेष देखने को मिलते हैं यहाँ की विशेषता है।

सब नर करहिं परस्पर प्रीति

किन्तु ये सब बातें माना काल कंवलित हो गई हैं। आज की पीढ़ी तो उसे "विवादित स्थल” के नाम से जानती है। यह विवाद है क्या? विवाद है भूमि के एक टुकड़े पर जिसको हिन्दू सम्प्रदाय राम जन्मभूमि मानता है और मुस्लिम समुदाय उसे बाबर द्वारा स्थापित मस्जिद मानता है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का मामला लोगों की आस्था का विषय था किन्तु यह विवाद कब और कैसे राजनीतिक विवाद बन गया देश को पता भी न चला और स्वयं अयोध्या नगरी तो इस विवाद से बेखबर जैसी है। वहाँ हिन्दू मुस्लिम सौहार्द में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई है। विवाद और वाद अपनी जगह है और भाईचारा अपनी जगह क्योंकि अयोध्या की विशेषता है “सब नर करहिं परस्पर प्रीति” “चल हि स्वधर्म सुनहिं श्रुति नीति।” कितना स्पष्ट लिखा है कि हर धर्म के अनुयायी अपने-अपने धर्म के अनुसार चलते हैं। श्री राम मंदिर के समर्थक महंत भास्कर दास जी का मानना है कि विवाद अपनी जगह है और भाईचारा अपनी जगह। विवाद के मुस्लिम पैरोकार मुहम्मद हाशिम अंसारी गत साठ वर्ष से मुकदमें की पैरवी कर रहे हैं। वह बहुधा परमहंस रामचन्द्र हंस जी के साथ कचहरी जाते हैं। साथ ही चाय नाश्ता भी करते हैं। रमजान के महीने में महंत रामदास रोज़ा इफ्तारी की वयवस्था करते हैं तो भाई बाबू खां के निवास स्थल पर लगभग चार सौ साधु-सन्त ईद मिलन के अवसर पर गले मिलते हैं। यही नहीं उनके यहाँ हुनुमान चालीसा का पाठ भी कराया जाता है।

भूमि विवाद को प्रारम्भ हुए एक शताब्दी से अधिक व्यतीत हो चुकी है और साठ वर्ष से अधिक समय से इस विषय का वाद अदालतों में चल रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाये तो सन् 1528 में मुगल सम्राट बाबर के सेनापति ने उस भूमि पर एक मस्जिद का निर्माण कराया जिसे हिन्दू लोग भगवान राम की जन्मभूमि मानते थे और कहते हैं वहाँ एक मंदिर था। वर्ष 1889 में अंग्रेज शासकों ने “Divide and Rule" की नीति के अनुसार एक वाद बनाकर अलग-अलग पूजा स्थल बना दिये जिसका बाहरी भाग हिन्दुओं को और भीतरी भाग मुस्लिमों को आवंटित किया गया। वर्ष 1885 में महंत रघुबीर दास ने राम चबूतरे पर छतरी बनवाने की आज्ञा माँगी। 1949 में तीन गुम्बदों में से एक में राम लला की मूर्ति स्थापित कर दी गयी। 1950 में अदालत ने पूजा अंर्चना की आज्ञा प्रदान कर दी। 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपने स्वामित्व का दावा किया। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड की आरे से मुहम्मद हाशिम अंसारी ने रामलला की मूर्ति हटाने के लिए अदालत में अपनी प्रार्थना प्रस्तुत की। 1986 में जिला जज ने विवादित स्थल पर लगे ताले को खोलने का आदेश पारित किया। 1986 में उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में श्री अंसारी ने जिला जज के आदेश को चुनौती दी। 1989 में श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने विवादित स्थल को रामलला विराजमान की संपति घोषित करने की प्रार्थना उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में प्रस्तुत की। अंततः 1984 विवादित स्थल से संबंधित सभी वादों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के सुपुंद कर दिया गया। 

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपने पक्ष में 36 गवाह पेश किये। 6 दिसम्बर 1994 को विवादित स्थल पर बना दांचा गिरा दिया गया जिसके परिणामस्वरूप देश भर में साम्प्रदायिक दंगे हुए और लगभग 2000 व्यक्तियों की मौत हो गयी। ढाँचे को गिराये जाने की जांच के लिए न्यायमूर्ति लिब्राहन आयोग का गठन किया गया जिसको 6 माह के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया। जनवरी 1993 में केन्द्र सरकार ने विवादित स्थल तथा आस पास की 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया। अधिग्रहण के विरूद्ध दोनों पक्षों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका पेश की गई और हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय को अग्रसित कर दिया। जनवरी 1995 में लखनऊ पीठ में फिर सनवाई प्रारम्भ हुई। वर्ष 2002 में मामले को जल्दी निपटाने के लिए प्रतिदिन सुनवाई का आदेश हुआ। 2003 में अधिग्रहित परिसर में पुरातात्विक आधार पर खुदाई का आदेश हुआ। पुरातत्त्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट समय पर सौंप दी जिसमें प्राचीन मूर्तियों के अवशेष और शिलालेख मिलने का उल्लेख था। 2009 में गठन के 19 साल बाद लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी इस बीच इस आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया। इस प्रकार एक लम्बी कानूनी लड़ाई के उपरान्त अन्ततः 30 सितम्बर 2010 को उच्च न्यायालय की विशेष पीठ ने अपना फैसला सुनाया। फैसला 8189 पृष्ठों का है। क्यों न हो इतना भारी भरकम फैसला, ऐसे विवाद का जो साठ साल से अधिक समय तक चला जिसमें 50 गवाहों ने हिन्दू पक्ष की ओर से 1209 पृष्ठों में अपनी गवाही दर्ज कराई और 36 गवाहों ने मुस्लिम पक्ष की ओर से 2311 पृष्ठों में अपनी गवाही दर्ज करायी। यही नहीं सब मिलाकर 40 पक्षकार भी थे।

विवाद के बिन्दु थे-
  • क्या विवादित स्थल भगवान राम की जन्मभूमि है? 
  • क्या विवादित भवन मस्जिद थी यदि थी तो उसका निर्माण कब हुआ और किसने करवाया ? 
  • क्या मस्जिद का निर्माण मन्दिर तोड़कर कराया गया?
  • क्या दिसम्बर 1949 में रामलला की मूर्तियों को विवादित स्थल पर विराजमान कराया गया था?
  • क्या विवादित स्थल के स्वामित्व के वाद की समय सीमाबद्ध था अथवा किसी पक्ष की स्वामित्व की सीमा समाप्त हो चुकी थी।
  • विवादित स्थल का स्वामित्व किसका हो?
  • उपरोक्त बिन्दुओं पर माननीय न्यायाधीशों के निर्णयों का संक्षिप्त सार अग्र प्रकार है-
न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा के अनुसार-
विवादित स्थल भगवान राम की जन्मभूमि है। यह दैव्य शक्ति का जन्म स्थल है और पूजनीय है। यह विवादित स्थल बाबर ने बनवाया था जिसकी निश्चित तिथि का पता नहीं चल पाता। किन्तु यह इस्लाम के नियमों के विरूद्ध बनवाई गयी थी और इसे मस्जिद नहीं कहा जा सकता। विवादित ढाँचा पुराने भवन को तोड़कर ही बनाया गया था जैसा कि भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग ने भी माना है। विवादित भवन में दिसम्बर 1949 में भगवान राम की मूर्तियों को विराजमान कराया गया था। 0.0.3 नं० 4, 1989 सुन्नी सैन्ट्रल बोर्ड ऑफ वक्फ यू० पी० लखनऊ व मान्य बनाम गोपाल सिंह निर्मोही अखाड़ा व अन्य बनाम जमुना प्रसाद सिंह की अवधि समाप्त हो चुकी है। यह स्थापित सत्य है कि मुकदमें में जो सम्पत्ति है वह भगवान राम के जन्म से सम्बन्धित है। वहाँ सीता की रसोई, चरन पादुका और अन्य मूर्तियों की पूजा विधिवत होती रही है। हिन्दुओं में वहाँ पूजा काफी समय से हो रही है। यही स्टेट्स बरकरार रहेगा। हिन्दुओं को वहाँ पूजा करने का पूरा अधिकार होगा।

न्यायमूर्ति एस०यू०खान के अनुसार- 
यह बात विवादित नहीं है कि भगवान राम का जन्म विवादित स्थल पर हुआ या नहीं। यद्यपि इतिहास में सीधा कोइ प्रमाण नहीं मिलता फिर भी माना जाता है कि राम का जन्म विवादित स्थल पर ही हुआ था। मस्जिद बनने के बाद भी हिन्दुओं में राम के जन्म को प्रचारित करना शुरु किया था। विवादित भवन मस्जिद के रूप में बाबर द्वारा या उसके आदेश के अनुसार ही बनवाया गया था। यह भी साबित नहीं हो सका कि विवादित भवन का सम्बन्ध मस्जिद से था या नहीं या इसके किसी हिस्से से सम्बन्धित था। मंदिर को तोड़कर विवादित भवन नहीं बनाया गया था। 1949 से पहले हिन्दुओं ने यह प्रचारित किया था कि राम का जन्मस्थान ही यहाँ था और बीच वाले गुम्बद में राम का जन्म होना प्रमाणित भी करना आरम्भ किया था। यह बात भी सही है कि दिसम्बर 1949 में बीच वाले गुम्बद में राम की मूर्तियाँ रखी गयी थी। इसी के साथ हिन्दुओं ने अपना कब्जा बनाना आरम्भ किया था। हिन्दुओं और मुसलमानों तथा निर्मोही अखाड़ा के अलावा और सभी के क्लेम की अवधि समाप्त हो चुकी है। दोनों का ज्वाइंट टाइटिल होगा। निर्मोही अखाड़ा भी एक हिस्सेदार होगा। दोनों के अधिकार बराबर होंगे और किसी को कोई हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होगा।

न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के अनुसार-
यह कोई विवादित बात नहीं है कि विवादित स्थल पर भगवान राम का जन्म हुआ था। केन्द्र में जो तीन गुम्बद बनी हुई हैं उनमें ही भगवान राम का जन्म हुआ था। विवादित स्थल बाबर के समय ही बनवाया गया जो राम के नाम से किसी भी प्रकार से सम्बन्धित नहीं था। इसके बनवाने की कोई तिथि निश्चित नहीं है। हिन्दुओं के भवन होने के प्रमाण वहाँ उपलब्ध हैं। यह विवादित भवन दोनों ही समुदायों द्वारा प्रयोग में लाया गया है। दोनों का ही कब्जा माना जा रहा है। हिन्दुओं द्वारा यहाँ राम चबूतरों और सीता की रसोई पर पूजा अर्चना होती रही है वहाँ इस पूजा को पूरी करने के लिए दिसम्बर 1949 में भगवान राम की मूर्तियों को रखा गया था जिससे हिन्दुओं के विश्वास को बढ़ावा मिला था। हिन्दुओं और मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया और क्लेम की अवधि समाप्त होने पर कोई लाभ किसी को नहीं दिया जा सकता लेकिन यह बात भी सही है कि मुसलमानों को निराश नहीं किया जा सकता। हिन्दुओं और मुसलमानों को निर्मोही अखाड़े के साथ ही बराबर का हिस्सा दिया जाएगा। यदि मुसलमानों को देने के लिए स्थान कम होता है तो केन्द्र सरकार ने जो भूमि अधिग्रहीत की हुई है उसमें से दी जा सकती है।

विवादित स्थल का क्षेत्रफल 2.77  एकड़ है। रामलला जहाँ विराजमान हैं वहीं रहेंगे। वह स्थान रामलला को दिया जायेगा। राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़े को दी जाएगी।

तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाएगा। यह फैसले का निष्कर्ष है। फैसले से स्पष्ट है कि यह ऐतिहासिक फैसला मात्र शहादतों साक्ष्यों तथा गवाहों की गवाहियों पर आधारित न होकर दोनों धर्मों की आस्था विश्वास को भी पूरा आदर दिया गया है। पुरातत्त्व विभाग की भूमिका भी अहम रही है। रिपोर्ट में 2500 वर्ष पहले विवादित स्थल पर मंदिर का अस्तित्व होने के संकेत मिले थे। 131 मजदूरों द्वारा जिनमें 29 मुसलमान भी थे खुदाई में मिले साक्ष्यों के आधार पर मस्जिद से पहले दसवीं शताब्दी में मिली मंदिर के अस्तित्व के प्रमाण निकले थे। खुदाई में शिला लेख भी मिले थे। खुदाई की 574 पृष्ठ की रिपोर्ट को भी ध्यान में रखा गया है।

देश ने मंदिर मस्जिद मामले को लेकर अपार कष्ठ झेले हैं। राजनीतिक लाभ उठाने वालों ने इस विवाद का भरपूर लाभ उठाया है। किन्तु फैसला आने के उपरान्त जो अमनचैन देश में व्याप्त रहा उससे उन्हें निराशा ही हाथ लगी होगी। देश की युवा पीढ़ी को मंदिर मस्जिद ने कुछ लेना देना है। हर वर्ग ने दिल खोल कर फैसले का स्वागत किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवासी अब धर्म की संकरी गलियों से बाहर निकलकर समय और चैन का जीवन जीना चाहते हैं अब उनका ध्यान राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद और विकासोन्मुख है उनका मानना है|

हम इश्वर के बन्दे हैं,मज़हब से हमें क्या लेना। 
गर काबा हुआ तो क्या, बुतखाना हुआ तो क्या ॥

फैसले के बाद अयोध्या के धार्मिक सौहार्द में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं आया। दोनों सम्प्रदाय के लोगों ने एक दूसरे को बधाई दी और प्रमाणित कर दिया कि ईश्वर अल्लाह एक ही शक्ति के दो नाम हैं- “मम् प्रिय सब मन उपजाए” अर्थात् सभी मानव मेरी संतान है। मैंने ही उनको उत्पन्न किया है। मुझे सभी समान रूप से प्रिय है अतः

"सब नर करहि' परस्पर प्रीति”

उच्च न्यायालय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की गयी और उच्चतम न्यायालय ने उपरोक्त निर्णय को अनुचित माना है। उच्चतम न्यायालय का मानना है कि जब विवाद के किसी भी पक्ष ने बँटवारा माँगा ही नहीं तो बँटवारा किस आधार पर किया गया है। अतः स्थिति पुनः पूर्ववत हो गई है और हम जहाँ से चले थे फिर वहीं आकर रूक गए हैं, क्योंकि “पृथ्वी गोल है”

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