महिला सशक्तिकरण पर निबंध (WOMEN EMPOWERMENT ESSAY IN HINDI)

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महिला सशक्तिकरण पर निबंध (WOMEN EMPOWERMENT ESSAY IN HINDI)

    महिला सशक्तिकरण पर निबंध - 1

    महिला सशक्तिकरण की अवधारणा का तात्पर्य उन दशाओं से हैं जहाँ स्त्रियों पर कोई दबाव या नियंत्रण नहीं होता। महिलाएँ प्रत्येक समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। वर्ष 2001 को महिलाओं के लिए सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया था। आज महिला सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक, धार्मिक व्यावसायिक, वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में अपनी उपयोगिता दर्शा रही है। मनोरंजन, विज्ञान, दूरसंचार तकनिकी आदि क्षेत्र भी उससे अछूते नहीं हैं।
    महिला सशक्तिकरण पर निबंध (WOMEN EMPOWERMENT ESSAY IN HINDI)

    महिला सशक्तिकरण क्या है?

    भारत के संविधान ने पुरुष और स्त्री को समान अधिकार दिये हैं। हम इस तथ्य से भी परिचित हैं कि लैंगिक भेदभाव संविधान द्वारा निषिद्ध है। पिछले 175 वर्षों से ऐसे कई कानून पारित हुए हैं जो स्त्रियों को अनेक कुरीतियों और कुप्रथाओं से मुक्त करने के लिये हैं और इन कुप्रथाओं ने स्त्रियों को अपने शिकंजे में कस कर रखा है। परिणाम यह है कि कई स्त्रियाँ जन्म से लेकर मृत्यु तक जेण्डर (लैंगिक) भेदभाव की शिकार रही हैं। इसमें संदेह नहीं कि कानून द्वारा स्त्रियों की ऐसे दमन से मुक्ति बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन एक ऐसे वातावरण को तैयार करना उतना ही महत्वपूर्ण है जो स्त्रियों का सशक्तिकरण करने में सहायक हो।

    सशक्त महिला कौन है?

    एक सशक्त स्त्री वह है जो इस बात के लिये स्वतन्त्र है कि अपनी पसंदगियों को निश्चित करती है और अपने जीवन और समाज से सम्बन्धित फैसले स्वयं करती है। अपने परिवार और अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए हिंसा या दुर्व्यवहार की शिकार नहीं है। वह अपने तरीके से आत्म सम्मान और गौरव को रख सकती है। वह ऐसी है जो विभिन्न क्षेत्रों की गतिविधियों में समान पकड़ रखती है या अवसर का लाभ उठाने में सक्षम है। वह इस अवस्था में है कि उसकी प्रतिष्ठा और अधिकारों की सुरक्षा के लिये बनाए गए कानूनों का लाभ ले सकती है। केवल सुयोगों और सुअवसरों का प्रावधान ही स्त्री के लिये पर्याप्त नहीं है। आवश्यक यह है कि स्त्रियों को इस बात की स्वतन्त्रता होनी चाहिये कि वे इन सुयोगों को काम में ले सकें।  इसलिये सशक्तिकरण एक वह दशा है जिसमें लड़कियाँ और स्त्रियाँ अपनी स्वतन्त्रता के अनुसार अपने अधिकार को व्यवहार में लाती हैं और यह अधिकार केवल सिद्धान्त में नहीं होता।

    स्त्रियों को सशक्त क्यों बनाना चाहिये?

    भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग स्त्रियों का है। ऐसी अवस्था में जब तक ऐसा वातावरण नहीं बनाया जाता, कि स्त्रियाँ अपने सभी अधिकारों को काम में लाएँ और वे जब तक भय मुक्त तथा प्रतिबन्धों से स्वतन्त्र नहीं होतीं, भारत तरक्की नहीं कर सकता। जब स्त्रियाँ सशक्त हो जाती हैं तो एक मुक्त और जागृत समाज का निर्माण हो सकता है। आज भी बहुत बड़ी संख्या में स्त्रियाँ अपने घर की चारदिवारी में सिमट जाने के लिये बाध्य हैं। यद्यपि उनकी मुक्ति के लिये कोई कानूनी रुकावटें नहीं हैं फिर भी सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिबन्ध उन्हें उनके विकास के लिये मिलने वाले अवसरों से वंचित रखते हैं और उन्हें विकास की ओर नहीं ले जाते।

    निष्कर्ष - मानव इतिहास ऐसे उदाहरणों का भण्डार है जिनमें स्त्रियों ने नेतृत्व किया है और अपने राष्ट्रों के भाग्य एवं लक्ष्यों को सही मार्ग प्रदान किया है। स्त्रियों ने घर और बाहर दोनों क्षेत्रों में कार्य करके समाज को आगे ले जाने में अपना अनुपम योगदान दिया है। स्त्रियों का सशक्तिकरण उनके व्यक्तिगत जीवन और समाज में भी होना चाहिये। सच्चाई यह है कि स्त्रियों के सशक्तिकरण के अनेकानेक लाभ हैं और इससे मनुष्य मात्र को फायदा होता है। एक टिकाऊ विकास के लिये यह आवश्यक है कि स्त्रियों का सशक्तिकरण पर्याप्त रूप में होना चाहिये। स्त्रियों को योजनाओं में भागीदारी करनी चाहिये। उन्हें योजनाएं बनानी चाहिये तथा विकास कार्यक्रम में मैनेजर, वैज्ञानिक और तकनीकी सहायक होना चाहिये।

    जब स्त्रियाँ सशक्त होती हैं तब इससे समाज भी सशक्त होता है तथा उनका सरोकार केवल अपने परिवार से ही नहीं होता अपितु सम्पूर्ण समुदाय से होता है। जब स्त्रियों को उनके स्त्रोतों की ओर आमुख कर दिया जाता है तब वे अधिक लोगों के लाभ की बात सोचती हैं चाहे ये समूह परिवार हो या पड़ोसी। हम जिस दृष्टान्त को दे रहे हैं वह इस बात को स्पष्ट कर देगा। सशक्त महिलाएँ एक सशक्त समाज का निर्माण करती हैं।

    महिला सशक्तिकरण पर निबंध - 2

    सशक्तिकरण का अर्थ एक ऐसी प्रक्रिया से है जिसके तहत शक्तिहीन लोगों को अपने जीवन की परिस्थितियों को नियंत्रित करने के बेहतर मौके मिल जाते हैं। "महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को शक्तिशाली बनाना, महिलाओं को वे सारे उपकरण उपलब्ध करवाना जिनकी सहायता वे उन्नति कर सकती है, आगे बढ़ सकती है।" महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे बड़ा रोड़ा, महिलाओं में शिक्षा और जागरूकता की कमी ही है। यदि महिलाओं को शिक्षित बना दिया जाए तो वे अपने सामाजिक व राजनैतिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाएगी और फिर ऐसी जागरूक महिलाओं को दबाना, किसी के लिए भी सम्भव नहीं होगा।

    महिला सशक्तिकरण का अर्थ

    महिला सशक्तिकरण का अर्थ है नारियों को सक्षम करना या शक्ति देना। शक्ति का विचार सशक्तिकरण की जड़ में है। यूनिफेम के अनुसार नारी सशक्तिकरण का अर्थ है -

    • महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करना-स्वयं का मूल्य समझते हुए।
    • महिलाओं में स्वयं की क्षमता पर विश्वास विकसित करना जिससे वे अपने जीवन के सभी निर्णय स्वयं ले सकें।
    • महिलाओं में सामाजिक परिवर्तन की दिशा समझने में सामाजिक और आर्थिक विकास करना । 
    • नारी सशक्तिकरण से स्त्री-पुरुष के संबंधों को समझा जा सकता है और उन तरीकों को समझा जा सकता है जो इसे बदल सकें।

    महात्मा गाँधी के अनुसारः "हमारा पहला प्रयास अधिक से अधिक महिलाओं को उनके वर्तमान स्थिति के प्रति जागरूक करना होना चाहिए।"  नारी सशक्तिकरण महिलाओं के मूलभूत अधिकार को सुनिश्चित करता है। इसके माध्यम से हमारे सदियों से चले आ रहे विकास के लक्ष्यों को पूरा करने का और सतत् विकास के मार्ग में लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय को भी शामिल करना है। 

    स्त्री सशक्तिकरण क्यो आवश्यक है? 

    किसी भी संतुलित समाजिक व्यवस्था के लिए विकास के क्षेत्र में स्त्री-पुरुष दोनों की समान भागीदारी आवश्यक है। महिला सशक्तिकरण का लक्ष्य पुरुष या महिला की श्रेष्ठता साबित करना नहीं है, अपितु उन उपायों को सुनि’िचत करने की पहल करना है जिससे विकास मानकों की प्राप्ति में महिला और पुरुष बराबर योगदान कर सकें। वातावरण लिंगभेद से रहित परस्पर पूरकता का हो। इस दृष्टि से महिला सशक्तिकरण के अनेक ऐसे आयाम हैं जिन पर प्रेरित और प्रोत्साहित करने से महिला सशक्तिकरण की दिशा में वांछित परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

    महिला सशक्तिकरण के आयाम

    महिला सशक्तिकरण को समझने के लिए इसके विभिन्न आयामों को समझना आवश्यकता है। इस धारणा के मूल में स्त्री-पुरूष को एक दूसरे का पूरक समझते हुए समतामूलक व्यवस्था विकसित करने की भावना निहित है। इस प्रक्रिया के अनेक आयाम हैं, जैसे - (1) शैक्षिक, (2) स्वास्थ्य, (3) आर्थिक, (4) सामाजिक, (5) विधिक, (6) राजनैतिक तथा (7) भावनात्मक। 

    (1) शैक्षिक सशक्तिकरण - एक सुशिक्षित महिला अपने ज्ञान से अपने परिवार को प्रकाशित करने के साथ-साथ स्वयं भी आत्मविश्वास से परिपूर्ण होती है। संतान की प्रथम गुरू अर्थात उसकी माता यदि सुशिक्षिता हो तो भावी पीढ़ी के शिक्षित होने की संभावना कई प्रतिशत बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त सामाजिक विसंगतियों से लड़ने का एक मात्र हथियार भी शिक्षा ही है, इसके इस्तेमाल से स्त्रियां परिवार तथा समाज में सम्मान के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी प्राप्त कर सकती हैं। शिक्षित स्त्री परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी राय देने के साथ-साथ निर्णय प्रक्रिया
    में भी भागीदारी कर सकती है। आज यह सकारात्मक परिवर्तन प्रत्येक समाज में देखा जा रहा है। लोग बच्चियों को
    पढ़ाने में रूचि लेने लगे हैं। आवश्यकता यह है कि उनके युवा होने पर भी यह रूचि बनी रहे तथा पढ़ाई समाप्त होने पर ही उनके विवाह की चर्चा हो।

    (2) शारीरिक/स्वास्थ्य सम्बन्धी सशक्तिकरण - इस सशक्तिकरण का अभिप्राय स्त्रियों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। कभी सबको खिलाकर सबसे पीछे खाने की परम्परा तो कई बार जीरो फिगर की चाहत के कारण वह उपयुक्त आहार नहीं ले पाती हैं। जिसके कारण शरीर कमजोर तथा रोगी हो जाता है। शरीर से कमजोर महिलाएं प्रायः गर्भवती होने पर अनेक प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त हो जाती हैं। कमजोर माँ की संतान भी कमजोर होती है और उसका जीवन रोगों से संघर्ष करने में बीतता है, उसका स्वस्थ विकास नहीं हो पाता, जिससे उसका पूरा जीवन और एक पूरी पीढ़ी प्रभावित होती है। रोगिणी स्त्री अपना अथवा अपने परिवार का ध्यान रखने में भी असमर्थ होती है। ऐसी स्त्रियां योग्य होने के बाद भी प्रगति नहीं कर पातीं हैं। इसलिए इन्हें अपने खान-पान पर ध्यान देते हुए स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिये। 

    (3) आर्थिक सशक्तिकरण - आज के युग में सभी का स्वावलंबी होना आवश्यक है। महिलाओं के आर्थिक रूप से सबल होने से परिवार में समृद्धि आती है, साथ ही वह अपनी कई इच्छाओं जैसे पहनने-ओढ़ने, खाने पीने, घूमने-फिरने आदि को अपनी मर्जी से पूरा कर पाती है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला बुरे वक्त में किसी की मोहताज नहीं होती, उसे किसी के सामने अपने तथा अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के लिए सरकारी अथवा निजी संस्थानों में नौकरी करने के अलावा महिलाएं स्वयं का व्यवसाय भी कर सकती हैं। यदि पति अथवा पिता आर्थिक रूप से सम्पन्न हो तो भी महिलाओं को अपनी रूचि के अनुसार कुछ काम अवश्य करना चाहिए ताकि वह स्वयं की योग्यता सिद्ध कर सकें तथा देश के विकास में अपना योगदान दे सकें।

    (4) सामाजिक सशक्तिकरण - सामाजिक सशक्तिकरण प्रक्रिया की शुरूआत परिवार से होती है क्योंकि विभिन्न परिवारों के योग से ही समुदाय तथा समाज का निर्माण होता है। यदि परिवार में स्त्रियों के साथ समानता का व्यवहार हो तो वे स्वयमेव सामाजिक रूप से भी सशक्त हो जाएंगी। इसके लिए परिवार में पुत्र-पुत्री भेदभाव, घरेलू प्रबंधन में पत्नी को सेविका मानने की बजाय सहयोगिनी मानना, उनके साथ अभद्र व्यवहार अथवा अपशब्दों के प्रयोग पर पूरी तरह रोक लगाने के साथ समान व्यवहार करना आदि शामिल है। इस प्रक्रिया में समाज के बड़े-बूढ़ों का सहयोग तथा बाल्यावस्था से ही पुत्रों को अपनी बहन, माता तथा सड़क पर चलने वाली लड़कियों के साथ सम्यक व्यवहार करने की दीक्षा भी शामिल है क्योंकि व्यक्ति बचपन में जो भी अपने परिवार में देखता, सुनता और समझता है, अधिकांशतः उसे ही युवा होने पर दोहराता है। साथ ही ऐसी परंपराएं जिसमें महिलाओं के निम्न अथवा हेय समझा जाता हो उसे बदलने में भी परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। 

    (5) विधिक सशक्तिकरण - भारतीय संविधान पुरुष और महिला को बराबरी का दर्जा देता है। संविधान की दृष्टि में दोनों समान हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में महिलाओं की दशा सुधारने के लिये अनेक प्रयास हुए हैं। इन प्रयासों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में वे प्रयास रखे जा सकते हैं जिन्होंने महिलाओं को शोषण और उत्पीड़न से मुक्त करने के लिये अनेक विधिक प्रावधान और कानून बनाये हैं। घरेलू हिंसा का कानून ऐसा ही एक महत्वपूर्ण कानून है। दूसरी श्रेणी में वे प्रयास आते हैं जिनमें नारी क्षमता की संवर्धन के लिए प्रोत्साहन की योजनायें बनाई गयीं। अपनी उन्नति और विकास के लिए महिला को उन समस्त विधिक आयामों का ज्ञान होना चाहिए जो उसे शोषण से मुक्ति दिलाने और अवसरों का लाभ उठाने के योग्य बनाते हैं।

    (6) राजनैतिक सशक्तिकरण - भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में महिलाओं का अभूतपूर्व योगदान रहा है। देश के राजनैतिक परिदृश्य में महिलाओं की बराबर और प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करने की दृष्टि से विभिन्न स्तरों पर महिला आरक्षण का प्रावधान रखा गया है। स्थानीय और राष्ट्रिय निकायों के चुनाव में भी महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था है। इसका परिणाम यह होता है कि आज महिलायें राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी योग्यता और परिश्रम से मानक स्थापित कर रहीं हैं। मध्यप्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिये आरक्षित है, लेकिन वर्तमान में उससे अधिक संख्या में महिला प्रत्याशी निर्वाचित होकर राष्ट्र  को अपनी सेवाऐं दे रहीं हैं। 

    (7) भावनात्मक सशक्तिकरण - यदि स्त्रियां शिक्षित तथा आर्थिक रूप से मजबूत हो तब भी अतिशय भावुकता के कारण कई बार गलत निर्णय ले बैठती हैं जिससे आगे चलकर उन्हें कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए कोई बार-बार प्रताड़ित करे फिर रो धोकर माफी मांग ले, भावनात्मक रूप से कमजोर कर अपनी नाजायज मांग पूरी करवा ले। 

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    महिला सशक्तिकरण पर निबंध (WOMEN EMPOWERMENT ESSAY IN HINDI)
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