Sunday, 7 April 2019

दल परिवर्तन (दल-बदल) पर निबंध

दल परिवर्तन (दल-बदल) पर निबंध 

सन 1967 के चतुर्थ सामान्य निर्वाचन के पश्चात् भारत के समक्ष दल परिवर्तन का एक नवीन अध्याय प्रारम्भ हुआ। जहाँ विदेशों में बड़े-बड़े डॉक्टर दिल परिवर्तन में लगे हुए हैं वहाँ भारत में दल-परिवर्तन बड़ी तेजी से चल रहा है। जिस प्रकार संसार में जन्म लेकर मनुष्य किसी विशेष संस्कृति, किसी विशेष धर्म और कुछ विशेष संस्कारों से आबद्ध रहता है और उस जाति और उस संस्कति के प्रति उसके कुछ दायित्व होते हैं जिन्हें वह मृत्युपर्यन्त निभाकर अपने कर्तव्य का पालन करता है, उसी प्रकार दल विशेष भी एक जाति, एक धर्म और एक संस्कृति के समान होता है। उसकी परम्पराओं, नियमों, नीतियों और सिद्धान्तों से हम बँधे होते हैं, जिनका कठोरता से अनुपालन और अनुसरण हमारा कर्तव्य होता है। दल-परिवर्तन भी उसी प्रकार जघन्य और नैतिक दृष्टि से हेय है जिस प्रकार हिन्दू से मुसलमान हो जाना या सिक्ख से ईसाई हो जाना। पुराने लोगों का कहना है कि अपने बाप को बाप कहो, दूसरे के बाप को अपना बाप बनाने में क्या लाभ।

दल-परिवर्तन की इस दूषित मनोवृत्ति के पीछे, जिसके कारण आये दिन विभिन्न राज्यों में सरकारें बन रही हैं और बिगड़ रही हैं, अविश्वास के प्रस्ताव लाये जा रहे हैं और पास हो रहे हैं। सरकार के आगे अनिश्चितता और अस्थिरता छायी रहती है, कई कारण कार्य कर रहे हैं। पहला कारण तो यह है कि आज के युग में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा, स्वार्थपरता तथा पदलोलुपता इतनी छा गयी है इसके कारण न तो व्यक्ति को देश दिखायी पड़ता है और न अपना दल। दलीय प्रतिष्ठा से पहले उसे अपनी प्रतिष्ठा और अपनी जेब गरम चाहिए। स्वार्थ सिद्धि हेतु वह इतना पागल हो जाता है कि उसे ध्यान ही नहीं रहता कि मैंने जनता को क्या वचन दिये थे और अब उसे कैसे मुँह दिखाऊँगा? दूसरा कारण पद-लोलुपता है, जब सदस्य को यह मालूम हो जाता है कि इस सरकार में न मुझे कोई पद मिला और न महत्त्व, तब वह विरोधी पार्टियों से सांठ-गांठ जोड़ लेता है और पहली सरकार के पतन में सहायक सिद्ध होकर झट से मंत्री या सचिव का पद प्राप्त कर लेता है। तीसरा कारण पारस्परिक ईष्र्या और द्वेष है, मान लिया कि एक सदस्य किसी। विशेष पार्टी से खड़ा हुआ और जीत भी गया, परन्तु उस पार्टी के प्रमुख स्तम्भों से उसका किसी विशेष कारणवश मनोमालिन्य है या ईष्र्या या द्वेष है वह निश्चित ही उन्हें नीचा दिखाने के लिये। जीतने के बाद पार्टी छोड़ देगा और दूसरों से जा मिलेगा। चौथा कारण व्यक्तिगत सम्मान है, यदि सम्मान के योग्य कोई उचित सम्मान प्राप्त नहीं होता तो वह दूसरों के द्वार खटखटाने लगता है और कुछ दिनों में वह उन्हीं का हो जाता है। पाँचवाँ कारण व्यक्ति में निश्चित निर्णायिका शक्ति का अभाव है। भगवान ने जब बुद्धि दी है तो पहले ही सोच-समझकर पार्टी चयन करना चाहिये। जिससे बाद में छोड़ने पर, जनता में अपयश न उठाना पड़े और लोक हँसाई से व्यक्ति बच सके। छठा कारण व्यक्ति की मानसिक अस्थिरता है। ऐसे व्यक्ति के प्रत्येक कार्य में सदैव अस्थिरता बनी रहती है। न उसकी वाणी का कोई भरोसा और न किसी कार्य का। ऐसा व्यक्ति आज इस पार्टी में है तो कल दूसरे मंच पर जा बैठेगा और परसों तीसरे मंच पर। देखने वाले भी आश्चर्य में पड़ जायेंगे कि यह भी अजीब आदमी है, किसी का सगा नहीं। सातवाँ कारण है अस्थिर नेतृत्व की भावना। ऐसे व्यक्ति केवल 5 वर्ष के लिये ही नेता बनते हैं, न आगे कभी उन्हें चुनाव में खड़ा होना है और न किसी से वोट माँगना है। “आगे अपने घर का धन्धा देखेंगे, वैसे तजुर्बा सब चीजों का करना चाहिये, इसीलिये एक बार इलेक्शन भी लड़कर देख लिया और जीत भी गये। पाँच साल लखनऊ में उन कुर्सियों पर भी बैठ आये जिनको लोग देखने को तरसते हैं।“ ऐसे नेताओं को यह कहते सुना गया है। आठवाँ कारण—किसी दूसरी पार्टी के शक्तिशाली और प्रभावपूर्ण नेता का प्रभाव होता है, जिसके आकर्षक व्यक्तित्व के आगे लोग 'न' नहीं कर सकते, क्योंकि सदैव उसे बड़ा और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है, अतः चुपचाप हम बदली कर लेते हैं। नवाँ प्रमुख कारण है—ऐसे व्यक्तियों में आदर्श और चरित्र का नितान्त अभाव होना। ऐसी जाति बदलने वाले लोगों का न कोई आदर्श होता है न चरित्र। गंगा गये तो गंगादास और जमुना गए तो जमुनादास।

दल परिवर्तन से दो प्रकार का लाभ होता है, व्यक्ति को और जनता को। व्यक्ति की स्वार्थ सिद्धि हो जाती है, वह थोड़े से ही समय में अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति कर लेता है। स्वार्थी व्यक्ति का निम्नलिखित मूल मन्त्र होता है

अपमानं पुरस्कृत्ये मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ।।

स्वकार्य साधयेत् धीमान् कार्य अंशो हि मूर्खता ।।

अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति को अपमान सामने रखकर और मान को पीछे रखते हुये अपना काम सिद्ध करना चाहिये, क्योंकि काम बिगड़ जाना सबसे बड़ी मूर्खता है। जनता को यह लाभ होता है कि वह उस व्यक्ति के फन्दे में दुबारा फिर नहीं आ सकती। जब एक बार उसकी पोल खुल गयी तो फिर वह कैसा ही आदर्शवान बनकर आये, जनता उसका स्वागत नहीं कर सकती। सन् 1968 में हरियाणा, के एक सज्जन ने भी तीन-चार बार दल बदल की, परिणाम यह हुआ कि मई, 1968 में जब हरियाणा में मध्यावधि चुनाव हुए तो उनकी करारी हार हुई।

दल परिवर्तन के बड़े दुष्प्रभाव होते हैं, जो व्यक्ति और राष्ट्र दोनों को सहने पड़ते हैं। दल परिवर्तन से दलीय सरकार का बहुमत समाप्त हो जाता है और इस प्रकार सरकार का पतन हो जाता है। पतन के बाद या तो दूसरा दल जिसे बहुमत प्राप्त है अपनी सरकार बनाये, या फिर राष्ट्रपति शासन लागू हो। राष्ट्रपति शासन की अवधि भी अधिक से अधिक छः महीने तक रह सकती है। इसके बाद मध्यावधि चुनाव होना आवश्यक होता है। मध्यावधि चुनावों में सरकार को लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तब कहीं दूसरी सरकार स्थापित हो पाती है और यदि थोड़े दिन बाद फिर दल-बदली हो गई तो फिर चुनाव। इस प्रकार राष्ट्र की अपार धन शक्ति का अपव्यय होता है और समय की बर्बादी होती है। इसके साथ-साथ राज्य में अस्थिरता का साम्राज्य छाया रहता है, न कोई प्रशासनिक कार्य हो पाते हैं और न कोई निर्णय। ऐसी अस्थिरता की स्थिति में न जनता के हित की कोई योजना क्रियान्वित की जा सकती है और ने राज्य में कोई सुधार ही लाया जा सकता है। सरकार के देलों को आपस में लड़ने से ही फुर्सत नहीं मिलती तो सुधार कौन करे? दूसरे, अधिकारी भी काम करना बन्द कर देते हैं, ऊपर फाइल भेजें तो किसके पास ? जब कोई मन्त्री ही नहीं, मन्त्री इस्तीफा दिए घर बैठे हैं। किसी भी अधिकारी को किसी का कुछ भय नहीं रहता। इस प्रकार राज्य में एक अव्यवस्था सी छा जाती है।

व्यक्ति, जो दल परिवर्तन करता है, उसके विश्वासघात के कारण जनता में एक प्रकार की नीरसता और उदासी छा जाती है, क्योंकि उसने किसी दल विशेष की नीतियों के आधार पर ही उस व्यक्ति को चुना था। दल परिवर्तन से नीति परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। उधर उस व्यक्ति की भी एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक मृत्यु हो जाती है, वह जनता के सामने आ नहीं सकता और न उसके दुःख दर्दो को सुन ही सकता है। एक व्यक्ति के नैतिक पतन के कारण दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार यह दूषित वातावरण बढ़ जाता है। उस व्यक्ति की जो दल परिवर्तित करता है, जगह-जगह चर्चा होती है और वह अपयश का पात्र बन जाता है।

“संभावितस्य चाकीर्तिः मरणादतिरिच्यते ।”

अर्थात् प्रतिष्ठित मनुष्य की निन्दा या अपकीर्ति होना मृत्यु से भी बढ़कर होता है। अतः यह आवश्यक है कि प्रत्येक दल अपनी-अपनी एक चरित्र-संहिता तैयार करे, जिसमें स्पष्ट उल्लेख हो कि यदि मैं दल परिवर्तन करूंगा तो पहले जिस दल के प्रतिनिधि के रूप में जनता ने मुझे चुना है उस दल की सदस्यता त्यागने के साथ-साथ विधानसभा अथवा संसद की सदस्यता से भी त्याग-पत्र दे दूंगा, उसके पश्चात् जिस दल की सदस्यता स्वीकार करूंगा उस दल की ओर से दुबारा चुनाव लड़ेगा। इस प्रकार के अनुबन्धों को वैधानिक समर्थन भी प्राप्त होना चाहिये, अन्यथा न इनका कुछ महत्त्व होगा, और न कोई इन्हें मानेगा ही, क्योंकि यह तो भारतीय परम्परा है कि बिना दण्ड भय के अपना नैतिक कर्तव्य समझते हुए कोई भी कुछ काम करने को तैयार नहीं होता, "भय बिन होई न प्रीति” या फिर केन्द्रीय सरकार ही ऐसा कोई अधिनियम बनाये। जिससे दल परिवर्तन इतना सरल न रह जाए। देश में 1971 से 1973 की अवधि में दल-परिवर्तन की घटनाये हुई और दल-परिवर्तन के कारण ही 1979 में केन्द्र में जनता पाटों का पतन हुआ। यद्यपि 16 मई, 1973 ई० को इन्दिरा गाँधी सरकार के गृहमन्त्री श्री उमाशंकर दीक्षित ने दल-बदल पर रोक लगाने के लिये एक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया था, लेकिन आपसी मतभेदों के कारण यह विधेयक पारित न हो सका। भारत के अनेक राज्यों में दल-बदल की स्थिति के कारण सरकारें समुचित रूप से कार्य नहीं कर पा रही थीं। इस स्थिति को देखते हुये भारत सरकार ने इस जटिल समस्या को समाप्त करने के लिए 1985 में लोकसभा में दल-परिवर्तन सम्बन्धी विधेयक प्रस्तुत किया जो सामान्य संशोधनों के पश्चात् बहुमत से स्वीकार कर लिया गया इस प्रकार चार दशकों से चली आ रही दल-बदल राजनीति पर कानूनी अंकुश लगा।

इस कानून के अन्तर्गत संसद अथवा विधान सभा के किसी सदस्य द्वारा अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने पर अथवा दल के नेता द्वारा मतदान हेतु पारित व्हिप का उल्लंघन करने पर उसकी सदस्यता समाप्त हो जाने का प्रावधान था। किन्तु इस कानून में कुछ कमियाँ थीं जिनके कारण यह कानून पूर्णतया प्रभावी न हो सका। दल के विभाजित होने की स्थिति में अथवा विलय की स्थिति में सदस्यता समाप्ति का प्रावधान लागू नहीं होता था और दल का विभाजन तब माना जाता था जब दल के कम से कम एक-तिहाई सदस्य एक साथ मिलकर अलग दल का निर्माण करें अथवा किसी अन्य दल में विलय स्वीकार करें। इस प्रकार छोटे दलों के सदस्यों के लिए दल बदलना एकदम सुगम हो गया। इसके अतिरिक्त सदस्य के निष्कासन के। निर्णय का अधिकार एकमात्र सदन के सभापति को था और सभापति शासक दल का होने की स्थिति में निष्पक्ष निर्णय लिये जाने की संभावना संदिग्ध होती थी।

अतः उपरोक्त 1985 के दल-बदल कानून में आवश्यक संशोधन 2 जनवरी, 2004 को राष्ट्रपति A.PI. Abdul Kalam द्वारा संविधान को 97वें संशोधन के रूप में स्वीकृत किया गया। इस संशोधन का लक्ष्य यह था कि सदस्यता से वंचित होने वाला व्यक्ति सदन के कार्यकाल पूरा होने तक अथवा पुनर्निर्वाचित होने तक किसी भी लाभ के पद पर कार्य नहीं कर सकेगा। इसके अतिरिक्त मंत्रि-परिषद् में मंत्रियों की संख्या सदन के सदस्यों की 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। इसका आशय यह था मंत्री पद का प्रलोभन देकर किसी सदस्य को दल बदलने के लिए आकर्षित न किया जा सके। नये नियम के अनुसार सदस्य आधे में अथवा एक-तिहाई संख्या में दल छोड़ने की स्थिति में अपनी सदस्यता से वंचित कर दिये जायेंगे और पुनर्निर्वाचित होने तक किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किये जायेंगे। इस संशोधन में दल छोड़ने पर तो प्रतिबन्ध है किन्तु अन्य पार्टी में विलय प्रतिबंधित नहीं है।

दल के नेता द्वारा मतदान के लिए जारी दिए जाने वाले व्हिप से तानाशाही की गंध आती है और यह सदस्यों के संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतन्त्र मतदान तथा स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के अधिकार से वंचित करता है। इससे दल की आन्तरिक प्रजातांत्रिक भावना को ठेस पहुँचती है। विलय की स्थिति में यह संशोधन निष्क्रिय है क्योंकि यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करते हैं तो वे सदस्यता से वंचित नहीं होते। सदस्यता के विषय में अभी भी सदन के सभापति का ही अधिकार है और निर्णय पक्षपात पूर्ण होने का भय बना रहता है। अतः संवत यह मतदता का कर्तव्य है कि वह सच्चरित्र व्यक्तियों के पक्ष में ही मतदान करें जो निजी स्वार्थ के लिए जनता के विश्वास का दुरुपयोग न करे।

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