सद्गति कहानी की समीक्षा - Sadgati Kahani ki Samiksha

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सद्गति कहानी की समीक्षा - Sadgati Kahani ki Samiksha

सद्गति कहानी की समीक्षा - हिन्दी कहानी के इतिहास में 'सद्गति' अति चर्चित व ज़रूरी कहानी है। यह एक हृदयविदारक कहानी है। यह धार्मिक पाखंड, कर्मकांडी पुरोहितों की घिनौनी मानसिकता और दलित शोषण को दर्शाती है। इस कहानी के लेखक प्रेमचंद हैं, वे दलितों के शोषण का मूल कारण वर्ण व्यवस्था का स्वीकार व मानसिकता को मानते हैं। अनेक धार्मिक व सामाजिक संस्कार / मान्यताएँ रूढ़ियों और पाखंड में तब्दील कर दी गईं। प्रेमचंद धर्म, जाति, पूंजी और राजनीति के सम्बन्धों को अच्छी तरह से जानते थे। उनके साहित्य में हमारे समाज की विद्रूपताओं, समस्याओं, अंधविश्वासों, दुर्बलताओं, विसंगतियों का प्रामाणिक चित्रण हुआ है। जहाँ तक सद्गति का सवाल है तो यह कहानी भी एक यथार्थ व समस्यापरक कहानी है। यह दलित की नाबालिग बेटी के विवाह ( मुहूर्त) संस्कार से शुरू होकर दलित के अंतिम संस्कार के सवाल पर आकर ब्राह्मणवादी शोषकों की पोल खोलती है। इस कहानी को अनेक मंचों से खेला गया है, 1981 में इस पर सत्यजीत रे ने इसी नाम से एक गज़ब फिल्म बनाई थी।

प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से जातिवाद, अस्पर्श्यता, रूढ़ियों, सामाजिक कर्मकांडों, लोक-व्यवहार के नियमों से बंधे दलितों और सदियों से चलते आ रहे धार्मिक पाखंड पर ज़ोरदार चोट करते हैं। यह शोषण पर लिखी गई मारक व संवेदनशील कहानी है। इसका कथ्य दुखी नाम के एक ग़रीब दलित, उसकी पत्नी झुरिया, पण्डित घासीराम, उसकी पत्नी और चिखुरी गोंड के इर्द-गिर्द घूमता है। इसका कथ्य, परिवेश, चरित्र और भाषा शोषक की निर्ममता को बड़ी सूक्ष्मता से सामने लाते हैं। दुखी अपनी बेटी की शादी की साइत (मुहूर्त) विचरवाने को लेकर पण्डित घासीराम को आमंत्रित करने के लिए जाता है। घर से निकलने से पहले दुखी और उसकी पत्नी झुरिया के बीच हुए संवाद से जो परिवेश सामने आता है, वह स्पष्ट कर देता है कि दलितों का हमारे समाज में क्या स्थान है। उन्हें तथाकथित ऊँची जाति वाले अपने दरवाज़े पर बैठने तक नहीं देते। सवर्णों के बीच में दलित अधिक सचेत होकर, उनकी अधीनता और अपनी हेयता स्वीकार करते हुए रहते हैं। वे ब्राह्मण की महिमा से अभिभूत भी हैं, जैसे दुखी को इस बात का विश्वास व डर है कि सबके रुपये मारे जाते हैं, बाभन के रुपये भला कोई मार तो ले। घरभर का सत्यानाश हो जाए, पाँव गल- गलकर गिरने लगे। दुखी अपनी पत्नी को पण्डित घासीराम के स्वागत की तैयारी के लिए कुछ सुझाव व निर्देश देते हैं, जैसे पण्डित को दान देने वाले सीधा (अनाज) को छूना मत, महुए के पत्तों का आसान बना देना आदि। स्वयं भी वह खाली हाथ न जाकर पण्डित की गाय के लिए घास का एक गट्ठर लेकर जाना ठीक समझता है। इनके वंशज आज भी कचरा-मैला ढोने वाली व्यवस्था के शिकार हैं।

घासीराम का चरित्र-चित्रण करते हुए प्रेमचंद जी लिखते हैं- "प० घासीराम ईश्वर के परम भक्त थे। नींद खुलते ही इशोपासन में लग जाते। मुँह-हाथ धोते आठ बजते, तब असली पूजा शुरू होती, जिसका पहला भाग भंग की तैयारी थी। उसके बाद आधा घंटे चन्दन रगड़ने, फिर आईने के सामने एक तिनके से माथे पर तिलक लगाते। चन्दन की दो रेखाओं के बीच में लाल रोरी की बिंदी होती थी। फिर छाती पर, बाहों पर चंदन की ।" कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, पण्डित की पाखंडी और स्वार्थी मानसिकता और दलितों के प्रति उसका व्यवहार एकदम खुलकर सामने आता है। उसकी दिनचर्या और संवाद उसे एक शोषक सिद्ध करते हैं। वह दुखी के आमंत्रण के बदले उससे सुबह से बाद दोपहर तक डट के बेगारी करवाता है। यह बेगारी उसकी फीस नहीं है, वह तो 'सीधे' के रूप में मिलनी तय है। 

बुखार होने पर भी दुखी भूखे पेट पण्डित का आँगन साफ करता है, बैठक लीपता है, भूसा ढोता है और मोटी गांठ वाली लकड़ी को फाड़ने का काम करता है। अंत में लोहे सी लकड़ी फट तो जाती है मगर दुखी मर जाता है। इस दारुण जीवन व हृदयविदारक शोषण को देखकर किसी भी संवेदनशील पाठक का कलेजा फट जाता है। इस एक दिन की कहानी में शोषण, व्यथा और करुणा का इतिहास दिख जाता है। चिलम पीने के लिए जब वह आग माँगता है तो उसे पंडिताइन से घोर घृणाभरी दुत्कार मिलती है। प्रेमचंद लिखते हैं- 'पंडिताइन ने भवें चढ़ाकर कहा, 'तुम्हें तो जैसे पोथी पत्रों के फेर में धरम-करम किसी बात की सुधि ही नहीं रही। चमार हो, धोबी हो, पासी हो, मुँह उठाए घर में चला आए । हिन्दू का घर न हुआ, कोई सराय हुई। कह दो दाढ़ीजार में चला आए, नहीं तो इस लुआठे से मुँह झुलस दूँगी। आग माँगने चले हैं।' यहाँ देखने वाली बात है कि स्वयं पितृसत्ता से शोषित स्त्री क्यों वर्ण की श्रेष्ठताबोध से भरी है। इसका अलग से अध्ययन किया जा सकता है। 

दुखी घास छीलकर अपना गुज़ारा करने वाला एक ग़रीब दलित है। उससे सख़्त गाँठ फाड़ी या काटी नहीं जा रही। उसके पास एक मामूली कुल्हाड़ी है, जिससे वह उस पर वार कर रहा है। दरअसल यह गाँठ रूढ़िवादी समाज की गाँठ है। दुखी की कुल्हाड़ी व वार उसकी सामर्थ्य व दिशा को दर्शाते हैं । उसे लोक में प्रचलित धर्म निर्देशों व सभी अच्छे-बुरे संस्कारों को ढोना ज़रूरी लगता है। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में ऐसे शोषित पात्रों का सृजन किया है जो मरजादा, धर्म-अधर्म, पाप- पुण्य, भाग्य, पूर्वजन्म, पुनर्जन्म आदि पर विश्वास करते हैं, दरअसल वे लोक में व्याप्त समस्याओं, दुर्बलताओं, विसंगतियों को यथार्थपरक ढंग से चरित्रांकित करते हैं। दुखी जैसे शोषितों को लगता है कि मुहूर्त विचारे बिना कोई अपशुकन जाएगा। शोषित समाज में वैज्ञानिक चेतना नहीं है, वह पोथी ग्रन्थों में लिखी बातों को डर, अंधविश्वास और चमत्कार की अपेक्षाओं के कारण मानता चला जाता है। शोषण का यह जाल तब तक नहीं काटा जा सकता जब तक दलित समाज ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों को मान्यता देता चलेगा। 'दुखी' शोषण के कारण मरता है। वह हिम्मत करता तो मरने से बच सकता था ।

चिखुरी गोंड नामक एक पात्र दुखी को सचेत करता है, वह पण्डित के व्यवहार को अत्याचार बताता है। वह इस कहानी के परिवेश को और अधिक प्रामाणिक व जीवंत करता है। वह प्रेमचंद की दृष्टि और उद्येश्य का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय समाज में ऐसे विद्रोही पात्र हमेशा रहे हैं। प्रतिरोध की संस्कृति भी हमारी परंपरा व पहचान है, चिखुरी में भविष्य का स्वर सुना जा सकता है। जैसे कथानक को परिणति तक पहुँचाने में उसका अवदान महत्वपूर्ण रहा वैसे ही समाज को बदलने में ऐसे विद्रोही पात्रों का योगदान है। पीड़ा व संघर्ष के बाद आज़ादी मिली, आज़ादी के बाद बहुजनों की स्थिति कुछ बदली । कल तक एक चिखुरी था, आज दलित समाज के लिए अनेक चिखुरी खड़े हैं। तत्कालीन समय में जितना चिखुरी कर सका, वह हिम्मत की बात थी। वह दुखी के मर जाने पर उनके मोहल्ले व घरवालों के साथ खड़ा होता है। वह पण्डित के घर से दुखी की लाश न उठाने और इस हत्या को पुलिस के संज्ञान में लाने की बता करता है। लाश न उठाने और वहाँ आकर दलित औरतों के रातभर रोने से पण्डित और उसके टोले में हाहाकार मच जाता है। औरतें थक हार कर वापस चली जाती हैं, और लाश वही रहने दी जाती है। अंत में मजबूरी और घृणा से पण्डित घासीराम दुखी के पैर में फंदा फंसाकर, उसे घसीटते हुए गाँव के बाहर चील, कौओं, गिद्धों और कुत्तों के लिए छोड़ देता है। प्रेमचंद अंत में लिखते हैं- "यही जीवन पर्यंत की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।" कहानी यही खत्म होती है और सवाल यही से शुरू होते हैं। क्या यह सद्गति थी? यह हृदयविदारक जीवन का अंत था। सेवा और निष्ठा का फल यही होना चाहिए था? जीवितावस्था में जिसे भरपेट खाना व श्रम का थोड़ा सा सम्मान भी न मिला, मरने के बाद उसकी 'सद्गति' हो सकती थी? कहानी में दुखी का अंतिम संस्कार न दिखाकर प्रेमचंद ने मृत्यु के बाद मनुष्य को मिलने वाली 'सद्गति' को ठुकरा दिया है। प्रेमचंद का यह विद्रोह 'कफन' नामक कहानी में भी देखा जा सकता है।

प्रेमचंद अपनी कहानियों के शीर्षक और पात्रों के नाम से भी एक प्रामाणिक कथाकार साबित होते हैं। उनके पात्र हमारे इर्द-गिर्द घटित होते चरित्र हैं। आलोच्य कहानी में दुखी, झुरिया, चिखुरी, घासीराम जैसे नाम उद्येश्य सिद्ध करते हैं, परिवेश को अधिक जीवंत व प्रामाणिक बनाते हैं। यह कहानी एक वर्ण के प्रति पूर्वग्रहों को भी दर्शाती है। प्रेमचंद की भाषा सरल, प्रभावी, प्रवाहपूर्ण व पात्रानुकूल है। दुखी और घासीराम के संवाद अपने-अपने वर्ग का सटीक प्रतिनिधित्व करते हैं। संवादों से चरित्र खुलते जाते हैं। प्रेमचंद कहीं भी कहानी के पात्रों और उनके संवादों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करते। सच तो यह है कि कथ्य, परिवेश आदि तत्व स्वाभाविक रूप से विस्तार पाते हैं। यह कहानी केवल मात्र तत्कालीन समय का ही सत्य नहीं है बल्कि समकालीन परिदृश्य का भी यथार्थ है। 

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