गुल्ली डंडा कहानी की समीक्षा - Gulli Danda Kahani ki Samiksha

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गुल्ली डंडा कहानी की समीक्षा - Gulli Danda Kahani ki Samiksha

गुल्ली डंडा कहानी की समीक्षा - 'गुल्ली डंडा' दिल को छू लेने वाली एक महत्वपूर्ण कहानी है। 'गुल्ली डंडा' एक प्रसिद्ध ग्रामीण खेल है। खेलों के सन्दर्भ में यह भारतीय लोक की एक पहचान है। जो भी गाँव में पले-बड़े हैं, इस खेल के नियम व स्मृतियाँ यक़ीनन उनके हृदय में अंकित होंगी। इस कहानी को पढ़ते हुए पाठकों को अपने बचपन की चालाकियाँ, समर्पण, द्वंद, प्रतिद्वंद या दोस्ती के भाव याद आते हैं। खेल के बहाने किसी समाज के चरित्र का एक पक्ष जाना जा सकता है। खेलों की दुनिया में जहाँ खिलाड़ियों की स्पोर्ट्समैन शिप देखी जा सकती है तो वही हिंसा और तकरारें भी सामने आती हैं। विश्व साहित्य में कवियों-कथाकारों ने खेलों को आधार बनाकर पर्याप्त लिखा है।

यह कहानी प्रेमचंद के व्यापक फ़लक को दर्शाती है। उनसे शायद ही कोई विषय छूटा हो। उनके साहित्य में आम जन-जीवन से जुड़ी घटनाओं, समस्याओं, विद्रूपताओं आदि का यथार्थ वर्णन मिलता है। 'गुल्ली डंडा' कहानी का कथ्य, संवाद, चरित्र और परिवेश अति प्रामाणिक हैं। यह कहानी अपवाद की कहानी नहीं है। अपने सुन्दर कहन से भी यह कहानी प्रभावित करती है। इसका मुख्य उद्येश्य खेल के बहाने दो अलग समाजों की मानसिकता और उनके बीच पनपने वाली दीवार को दर्शाना है। यहाँ दलित समाज के एक लड़के का कौशल, विनम्रता व सीमा भी देखी जा सकती है। इस कहानी को लड़कपन दिखाने और ग्रामीण खेलों को बढ़ावा देने के के रूप में भी पढ़ा जाता है। अपनी सीमाओं के बावजूद दो खिलाड़ियों का निर्दोष बचपन की स्मृतियों को सम्मान देना इस कहानी की एक अन्य उपलब्धि है।

यह कहानी निबन्ध की तरह शुरू होती है। प्रेमचंद भारतीय खेलों की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं- "हमारे अंग्रेज़ी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हू, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लान की ज़रूरत, न कोर्ट की, न नेटकी, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया।"

वे आगे लिखते हैं- "विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैकड़ा न खर्च कीजिये, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता । यहाँ गिल्ली-डंडा है कि बिना हर्र - फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अंग्रेज़ी चीज़ों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के तीन - चार रुपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है।" 

उपरोक्त उद्धरणों से सिद्ध होता है कि प्रेमचंद सिर्फ एक कथाकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे चिंतक अथवा निबंधकर भी थे । यहाँ प्रेमचंद तत्कालीन भारत के उस परिवेश को सामने लाते हैं, जहाँ हम लोग भारतीय खेलों अथवा भारतीयता से दूर जा रहे हैं। यहाँ यह रेखांकित करना ज़रूरी है कि आज हम में से ज़्यादातर लोग परम्परागत खेलों से दूर जा चुके हैं। तत्कालीन समय में भी कुछ भारतीय क्रिकेट जैसे विदेशी खेल खेलते थे, जो आम आदमी की सामर्थ्य से बाहर थे। प्रेमचंद अपने देश के आम आदमी का ध्यान रखते हुए देशी खेल का समर्थन करते हैं। वे स्कूलों द्वारा काटे जाने वाली खेल फीस के बहाने शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हैं। आज स्थिति यह है कि भारत में हज़ारों प्ले-वे स्कूल होने के बावजूद भी हम शिक्षा और खेल का सम्बन्ध नहीं समझ सके हैं। 'खेलो और जीतो' संस्कृति ने खेल के मायने बदल दिए हैं। अब लड़कपन खेल के मैदानों के बजाय मोबाइल फोनों पर, क्लब, पब, रेस्तरां में दिखाई देता है। दूसरी बात यह कि अत्यधिक बेरोज़गारी और ग़रीबी के कारण आम भारतीय के पास खेलों के लिए समय ही नहीं है। जिस निम्न मध्यवर्ग, मध्यवर्ग व उच्च वर्ग के पास समय व सुविधा है, वे विदेशी खेलों में लिप्त हैं। इनमें भी खेल के प्रति उच्च वर्ग की मानसिकता अलग है जबकि मध्यवर्ग के सपने दूसरे हैं। कुल जमा बात यह कि खेलों के अर्थ बदल दिए गए हैं। ट्वेंटी-ट्वेंटी और आई०पी०एल० के 'गुल्ली डंडा' का मूल्यांकन अन्य संदर्भों में भी किया जा सकता है। 

प्रेमचंद के विचारों के साथ शुरू हुई कहानी निर्दोष बचपन को उकेरेते हुए इंस्पेक्टर के बेटे और उसके दोस्त / प्रतिद्वंदी खिलाड़ी गया' का चरित्र- अंकन करती है। 'गया' एक दलित व गरीब लड़का है जो कहानी के दूसरे पात्र 'मैं' यानी इंस्पेक्टर के बेटे के साथ गुल्ली डंडा खेलता है। 'गया' ग़ज़ब खिलाड़ी है। मोहल्ले के सारे लड़के अपनी जीत निश्चित करने के लिए 'गया' का दौड़कर स्वागत करते हैं, अपना गोइयाँ बनाने के लिए तत्पर रहते हैं। उसका व्यक्तित्व प्रखरता, चपलता और अक्खड़ता से भरपूर है। एक दिन सिर्फ इंस्पेक्टर का बेटा और गया ही खेल रहे थे, गया जीत रहा था। वह 'मैं' से अपना दाँव लेते हुए उसे खूब पदा (डोगरी में इसे 'फा' कहते हैं) रहा था। 'मैं' के पदने की मानसिकता को दर्शाते हुए लेखक लिखता है - "वह पदा रहा था, मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते हैं; पदना एक मिनट का भी अखरता है। मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चलीं, जो ऐसे अवसर पर शास्त्र - विहित न होने पर भी क्षम्य हैं, लेकिन गया अपना दाँव लिए बगैर मेरा पिंड न छोड़ता था ।" दरअसल वह उच्च वर्ग का भले है मगर खेलने में गया से कमज़ोर है। वह घर भागना चाहता है। 'गया' की बाल सुलभ ज़िद व ताकत के सामने विवश होकर वह कहता है-

'तुम दिन-भर पदाओ तो मैं दिन-भर पदता रहूँ?" 

'हाँ, तुम्हें पदना ही पड़ेगा।'

'न खाने जाऊँ, न पीने जाऊँ?'

'हाँ, मेरा दाँव दिए बिना कहीं नहीं जा सकते।'

'मैं तुम्हारा गुलाम हूँ?'

'हाँ, मेरे गुलाम हो।'...

'अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था। वह लौटा दो।'

'वह तो पेट में चला गया।'

'निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद ?

'अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। मैं तुमसे माँगने न गया था।'

'जब तक मेरा अमरूद नहीं दोगे, मैं दाँव न दूँगा।'

वह अमरूद के बल पर न्याय को अपनी तरफ पाता है। वह समझता है कि जब 'गया' ने मुझसे अमरूद खाया है तो उसे दाँव लेने का क्या अधिकार है। इस अमरूद को सिर्फ बाल सुलभ तर्क-वितर्क तक सीमित करके देखना चूक होगी, दरअसल यह इंस्पेक्टर के बेटे (जो उच्च वर्ग से तो है ही, कदाचित सवर्ण भी है।) के रूप में उच्च वर्ग और सवर्ण बच्चों की कंडिशनिंग (अनुकूलन) अथवा मानसिकता की ओर भी संकेत है। जब एक बच्चा यह समझता है- "कौन नि:स्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए देते हैं। जब गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुझसे दाँव लेने का क्या अधिकार है? रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं, यह मेरा अमरूद यों ही हजम कर जाएगा? अमरूद पैसे के पाँचवाले थे, जो गया के बाप को भी नसीब न होंगे।", तो यह सिर्फ एक बच्चे का कथनभर नहीं है, यह हमें हमारे परिवेश का ठीक-ठीक पता देता बयान है। मगर दूसरा पक्ष यह कि 'गया' उसे जाने नहीं देना चाहता। उन दोनों में गाली-गलौज और कुछ हिंसा होती है। अंत में मुक़ाबला न कर सकने की स्थिति में इंस्पेक्टर का बेटा रोने लग जाता है, जिससे 'गया' उसे छोड़ देता है। इंस्पेक्टर का बेटा जब सोचता है- "मैं थानेदार का बेटा एक नीच जाति के लौंडे से पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हुआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न की । ", तो भी हमारे समाज की मानसिकता सामने आती है।

इस बीच इंस्पेक्टर का तबादला होने के कारण 'गया' का प्रतिद्वंदी उस कस्बे से चला जाता है। बीस साल बाद इंजीनियर बनकर वह उसी कस्बे में लौटता है। उसके मन में अपनी मिट्टी के प्रति प्यार उमड़ता है। बाल स्मृतियाँ जाग जाती हैं। अपनी उस दुनिया का बदला हुआ रूप देखकर वह दुखी होता है, उससे लिपटकर रोना चाहता है। यहाँ उसके चरित्र में एक सच्चा बच्चा झलकता है। तभी वह, वहाँ पर कुछ लड़कों को गुल्ली डंडा खेलते हुए देखता है, उसे भरसक 'गया' का ख्याल आता है। उसके बारे में यह जानकर वह खुश होता है कि वह अभी भी वही रहता है । वह उसे मिलकर खुश तो होता है पर कुछ सोचकर गले न लगकर यूँ ही उससे मिलता, बतियाता है। मगर 'गया' उसे पहचानकर झुककर सलाम करता है और अपने बारे में बताता है कि वह डिप्टी साहब का साईस है। तब इंस्पेक्टर का बेटा उसे बताता है कि वह तो इंजीनियर है। 'गया' की बातों में विनम्रता है। इंजीनियर द्वारा पूछने पर वह कहता है कि अब गुल्ली डंडा खेलने का समय ही कहाँ मिल पाता है। इस पर इंस्पेक्टर का बेटा उसके सामने गुल्ली डंडा खेलने का प्रस्ताव रखता है, और बचपन का दाँव देने की बात कहता है। 'गया' बड़ी मुश्किल से, कुछ झिझक के साथ खेलने के लिए मानता है। बस्ती से दूर जाकर वे खेल शुरू करते हैं। 'गया' में विशेष उत्साह नहीं दिखता। इंजीनियर ने 'गया' को खूब पदाया । वह हैरान था कि 'गया' गुल्ली डंडा खेलना भूल गया है, वह एकदम अनाड़ी लग रहा था। ऊपर से इंजीनियर अभ्यास की कमी को बेईमानी से पूरा कर रहा था, हुच जाने पर भी डंडा खेले जाता था, टांड़ लगाने आदि में चालाकी कर रहा था। वह तीन बार आउट होने को भी नहीं 'गया' चुपचाप यह सारी बे-कायदगियाँ स्वीकृत करता जाता है। इस तरह 'गया' को काफी देर तक पदाने के बाद वह उसे दाँव देता है। 'गया' जल्दी ही हुच गया और खो बैठा। इंजीनियर ने यही महसूस किया कि 'गया' में पहले जैसी फुर्ती व कुशलता नहीं बची। खेल खत्म करके 'गया' इंजीनियर को बताता है कि कल कस्बे में गुल्ली डंडा होगा, जिसमें सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे। इंजीनियर दूसरे दिन मैच देखने आता है तो 'गया' का खेल देखकर दंग रह जाता है। यहीं से पाठक के मन में 'गया' के लिए अलग भाव उमड़ने लगते हैं। यहाँ 'गया' का चरित्र नायकत्व को प्राप्त होता है। आज तो गुल्ली उसकी गुलामी करती प्रतीत हो रही थी। उसकी शारीरिक भाषा की मुखरता अलग छटा बिखेर रही थी। प्रतिद्वंदी उसके सामने पानी भर रहे थे। अब इंजीनियर को यह मालूम हो चुका था कि वास्तव में पिछले कल तो 'गया' मात्र उसे खेला रहा था, स्वयं तो खेल ही नहीं रहा था। कहानी का अंत इन शब्दों से होता है- "मैं अब अफसर हूँ। यह अफ़सरी मेरे और उसके बीच दीवार बन गई है। मैं अब उसका लिहाज पा सकता हूँ, आदाब पा सकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया योग्य हूँ। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा गया हूँ ।" यहाँ आकर स्पष्ट होता है कि दोनों के बीच एक दीवार आ गई है।

इंजीनियर और 'गया' के चरित्र को देखें तो स्पष्ट होता है कि एक अमीर और दूसरा ग़रीब है, एक सरकारी उच्च अधिकारी और दूसरा साईस। एक सवर्ण (हालांकि कहानी प्रेमचंद ने कहीं नहीं लिखा है कि इंजीनियर सवर्ण है, परन्तु उसकी मानसिकता व भाषा उसे सवर्ण सिद्ध कर रही है) तो दूसरा दलित। हालांकि इंजीनियर में चालाकी और खेल में जीतने की इच्छा भले प्रबल थी परन्तु वह घृणा या बदले की भावना नहीं रखता। अंत में तो वह स्वयं को छोटा और गया को बड़ा मानता है । 'गया' के चरित्र की उदात्तता पाठक को करती है। वह अपने खेल व चरित्र से हृदय जीत लेता है। 

कहानी में चित्रित समस्या को आज भी देखा जा सकता है। अपने इर्द-गिर्द देखते हैं तो पाते हैं कि हम में से कितने ही लोग गया और इंजीनियर का चरित्र जी रहे हैं। बचपन में तो अमीर-ग़रीब, ताकतवर-कमज़ोर, दलित-सवर्ण, कुशल - अकुशल कोई मायने नहीं रखता मगर बड़ा होने पर हमें पता चलता है कि हमारे बीच कितनी दीवारें बना दी गई हैं, जिसे कोई फाँदना नहीं चाहता। समाज ने हमें जिस खांचे में रखा हम उसे स्वीकार कर लेते हैं। प्रेमचंद ने बड़ी सूक्ष्मता से अपने सरोकार व्यक्त किए हैं। वे समाज में व्याप्त बड़े-छोटे होने की औपचारिकताओं को दर्शाते हैं। हालांकि इस कहानी का कोई एक उद्येश्य नहीं है। इसका मुख्य उद्येश्य दो वर्गों और वर्णों की मानसिकता को भी दर्शाना है। यहाँ ग़रीब दलित समाज और समृद्ध सवर्ण समाज की मानसिकता को देखा जा सकता है, परन्तु यहाँ वर्ण से अधिक दो वर्गों की भावना अधिक देखी जानी चाहिए। इस कहानी को लड़कपन, ग्रामीण खेल की ठसक और खेल के मैदान में दो खिलाड़ियों के कौशल, नौसिखियापन, विनम्रता, चालाकी और ज़िद के लिए भी जाना जा सकता है। दूसरे शब्दों में इस कहानी को खेल के मैदान में निर्दोष बचपन और हैसियत (वर्ग) अनुसार जवान आदमियों की सीमा व सामर्थ्य दिखाने के लिए भी याद रखा जा सकता है। 

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