जुम्मन शेख का चरित्र चित्रण - Jumman Sheikh ka Charitra Chitran

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जुम्मन शेख का चरित्र चित्रण - Jumman Sheikh ka Charitra Chitran

जुम्मन शेख का चरित्र चित्रण - ‘पंचपरमेश्वर' कहानी में अलगू चौधरी की तरह ही जुम्मन शेख एक प्रमुख पुरुष पात्र है। कहानी में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेखक ने उसे गतिशील पात्र के रूप में चित्रित किया है। जुम्मन शेख के चरित्र की विशेषताएं इस प्रकार से हैं :-

अलगू से मित्रता :- जुम्मन शेख की अलगू से घनिष्ठ मित्रता थी। वह उस पर स्वयं से अधिक विश्वास रखता था। दोनों मित्र एक दूसरे के प्रति अपने कर्तव्य को बड़ी निष्ठा से निभाते थे। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गये थे और अलगू जब कभी घर से बाहर जाता तो अपना घर जुम्मन को सौंप देता । उनमें वैचारिक समानता थी।

मौसी की उपेक्षा तथा दुर्व्यवहार :- जुम्मन शेख की एक बूढ़ी मौसी थी । उसके पास अपनी जमीन थी। जब तक जमीन मौसी के पास थी, तब तक तो जुम्मन तथा उसकी पत्नी ने मौसी का खूब आदर किया । परन्तु जब मौसी ने अपनी जमीन जुम्मन के नाम की, तब से उसके व्यवहार में परिवर्तन आया। अब न तो पहले जैसी ही मौसी की सेवा तथा आदर होता न ही स्वादिष्ट भोजन खाने को मिलता था। पति-पत्नी दोनों का व्यवहार मौसी के प्रति निष्ठुर हो गया। मौसी की बात-बात पर उपेक्षा होती थी, उसे प्रताड़ित भी किया जाने लगा । जब बात हद तक पहुँच गयी, तब खाला ने जुम्मन से अपने निर्वाह के लिए रुपयों की माँग की। इस पर जुम्मन बड़ी धृष्टता से उत्तर देता है - "रुपये क्या यहाँ फलते हैं?" 

बदले की भावना :- जब पंचायत में अलगू चौधरी द्वारा जुम्मन शेख से प्रश्न पूछे जाते हैं तो वह स्वयं को अपमानित महसूस करता है । उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि उसका मित्र जो सरपंच की भूमिका में था, उससे इस प्रकार प्रश्न पूछ कर अपमानित करेगा – "जुम्मन चक्ति थे कि अलगू को क्या हो गया। अभी यह अलगू मेरे साथ बैठा हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था। इतनी ही देर में ऐसी कायापलट हो गई कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है। न मालूम कब की कसर निकाल रहा है।" वह अलगू से बदला लेने की ठान लेता है और उसी घड़ी का बेसबरी से इंतजार करता है।

हृदय परिवर्तन :- जुम्मन शेख अलगू से वैर ठाने हुए था। संयोग से ही शीघ्र उसे भी अलगू चौधरी तथा समझू साहू के झगड़े में सरपंच की भूमिका निभाने का अवसर प्राप्त होता है। परन्तु सरपंच का उच्च स्थान ग्रहण करते ही उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास होता है। उसमें सत्यता का भाव जागृत होता है। वह सोचता है -"मैं इस वक्त न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देववाणी के सदृश है और देववाणी में मेरे मनोविकारों का कदापि समावेश न होना चाहिए। मुझे सत्य से जौ - भर भी टलना उचित नहीं है ।" उसका वैर समाप्त हो जाता है और वह न्यायसंगत फैसला सुनाता है।

पश्चाताप (पश्चाताप ) :- अलगू चौधरी के फैसले सुनाने के बाद से ही जुम्मन के मन में अलगू से बदला लेने की भावना जागृत होती है। परन्तु सरपंच का पद ग्रहण करते ही उसे एहसास हो जाता है। पंचायत समाप्त होने के बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उन्हें गले लगाकर बोले "भैया जब से तुम ने मेरी पंचायत की, तब से मैं तुम्हारा प्राण- घातक शत्रु बन गया था, पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे कुछ नहीं सूझता । मुझे विश्वास हो गया कि पंच की ज़बान से खुदा बोलता है ।" जुम्मन पश्चाताप की अग्नि में जल उठता है। उसकी बातें सुनकर अलगू की आँखें भर आती हैं, वह रोने लगता है ।

इस दृष्टांत के बाद दोनों का मैत्रीभाव पुनः जागृत हो उठता है।

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