पूस की रात कहानी की संवाद योजना

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पूस की रात कहानी की संवाद योजना

'पूस की रात' कहानी की संवाद योजना भी अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। संवाद कथावस्तु को क्रमिक विकास देने में सहायक होते हैं और इस कहानी में भी संवाद पूर्ण रूप से कथावस्तु के स्वरूप के संयोजक और उद्घाटक हैं।

पूस की रात कहानी की संवाद योजना

इस कहानी के संवाद अन्तः बाह्य स्थितियों को उद्घाटित करते हैं । वक्ता पात्रों की समग्र मानसिकता को भी पाठकों के सामने सहज स्वाभाविक रूप से उद्घाटित करके रख देते हैं। उदाहरण स्वरूप मुन्नी का निम्न संवाद देखें जहाँ पति द्वारा बची तीन रूपये की पूँजी को वह नहीं देना चाहती - मुन्नी उसके पास से दूर हट गयी और आँखें तरेरती हुई बोली- कर चुके दूसरा उपाय | जरा सुनूँ कौन उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्बल ? न जाने कितनी बाकी है, जो किसी तरह चुकने ही नहीं आती। मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलों छुट्टी हुई।

संवाद कथा को क्रमिक विकास देकर चरमोत्कर्ष एवं चरम परिणति तक पहुँचाने वाले भी हैं। इसके प्रमाण स्वरूप कहानी के अन्त में दिए गए संवाद उदाहरण स्वरूप देखें-

मुन्नी ने चिन्तित होकर कहा - 'अब मजदूरी करके माल - गुजारी भरनी पड़ेगी । '

हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा- रात की ठण्ड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।'

मनुष्य और बेजुबान पशु के मध्य सरल, सहज एवं आत्मीय संवाद भी इस कहानी के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। जिससे कथा के कई पहलू उभर कर सामने आए हैं। खेत में हल्कू किसान और जबरा कुत्ता किस प्रकार ड में आत्मीय संवाद करते हैं-

हल्कू–‘आज और जाड़ा खा लें। कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा। उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा।'

जबरा ने अगले पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिये और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया। हल्कू को उसकी गर्म साँस लगी । अतः इस कहानी में संवाद कहानी की सफलता के परिचायक हैं।

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