कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग

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कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली मुहावरे का अर्थ

कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली मुहावरे का अर्थ होता है – दो व्यक्तियों की स्थिति में काफी अंतर होना; अत्यधिक अन्तर होना; आकाश-पाताल का अन्तर होना; उच्च और साधारण की तुलना नहीं।

कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली मुहावरे का वाक्य प्रयोग

वाक्य प्रयोग – बृहस्पति तो एक धनी बाप का पुत्र है और तुम एक मजदूर के बेटे हो, उसकी बराबरी कैसे करोगे? कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली। 

वाक्य प्रयोग – डॉ. राजेन्द्र जो कि एक बड़े लेखक और कवि हैं उनकी तुलना तुम प्रभुदयाल जैसे एक अयोग्य व्यक्ति से कर कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हो।

वाक्य प्रयोग – रमेश के पिता एक करोड़पति व्यवसायी हैं और तुम्हारे पिता दैनिक वेतन भोगी मजदूर। तुम रमेश से मित्रता की बात अपने दिमाग से निकाल दो क्योंकि कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।

वाक्य प्रयोग – जब करोड़पति कारन ने एक गरीब लड़की सुमन के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह अवाक रह गई और कहा मेरा और तुम्हारा विवाह संबंध नहीं हो सकता क्योंकि कहां राजा भोज कहां गंगू तेली।

वाक्य प्रयोग – कहाँ आप अपनी झोपड़ी की तुलना पांडे जी के आलिशान बंगले से कर रहे हैं। ये तो  कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली वाली बात हो गयी।

कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली एक प्रसिद्ध लोकोक्ति या हिन्दी मुहावरा है जिसका का अर्थ है – दो व्यक्तियों की स्थिति में काफी अंतर होना; अत्यधिक अन्तर होना; आकाश-पाताल का अन्तर होना; उच्च और साधारण की तुलना नहीं। एक बार गांगेय और तैलंग ने मिल कर राजा भोज की नगरी धार पर आक्रमण किया, मगर उन दोनों को राजा भोज के पराक्रम के आगे घुटने टेकने पड़े। इस लड़ाई के बाद धार के लोगों ने गांगेय और तैलंग की हंसी उड़ाते हुए कहा कि 'कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली।' तभी से ये कहावत आज भी आम बोलचाल में इस्तेमाल की जाती है।

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