भारत में क्षेत्रीय लोकाचार की व्याख्या कीजिए।

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भारत में क्षेत्रीय लोकाचार की व्याख्या कीजिए।

क्षेत्रीय लोकाचार : जनरीतियों में जब कल्याण की भावना निहित हो जाती है तब वे लोकाचार का रूप ग्रहण कर लेती हैं। श्री समनर महोदय ने लोकाचार या रूढ़ियों का तात्पर्य इस प्रकार बताया है कि . "ऐसे लोकप्रिय रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं में, जिनमें जनता के निर्णयों को सम्मिलित कर लिया जाता है और वे सामाजिक कल्याण में सहायक हों तो वे क्षेत्रीय लोकाचार का रूप ग्रहण कर लेते हैं।' मैकाइवर एवं पेज महोदय ने लोकाचार की परिभाषा देते हुए कहा है . "जब जनरीतियाँ अपने साथ समूह के कल्याण की भावना व सही और गलत के मापदण्ड मिला लेती हैं तो वे लोकाचार में बदल जाती हैं।

श्री लूम्ले के शब्दों में - "एक जनरीति उसी समय लोकाचारों में से एक हो जाती है जब उनके साथ कल्याण का तत्व जोड़ दिया जाता है।

क्षेत्रीय लोकाचारों का जन्म समाज में ही होता है साथ ही ये सामाजिक ढाँचे की आधारशिलाएँ हैं। क्षेत्रीय लोकाचार मानवीय व्यवहारों को निश्चित एवं नियंत्रित करते हैं वास्तव में जीवन के अनेक व्यवहार इनके द्वारा निर्धारित होते हैं। क्षेत्रीय लोकाचारों की अवहेलना करना दुष्कर, कार्य होता है। भारतीय समाज विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, जातियों उपजातियों, प्रजातियों, नजातियों के सम्मिश्रण है। भारत की भौगोलिक पृष्ठभूमि में ऐसे विलक्षण तत्व विद्यमान हैं, जिनके फलस्वरूप क्षेत्रीय लोकाचारों का प्रकटीकरण अनिवार्य हो जाता है। जहाँ एक तरफ तपता हुआ रेगिस्तान है वहीं दूसरी तरफ बर्फ से परिवेश आच्छादित पहाड़ियाँ हैं। ऐसे विविधता रूपी परिवेश में एक सी परम्पराओं का निर्माण होना सम्भव नहीं है। क्षेत्रीय लोकाचार अपने काल, परिस्थिति के अनुसार समाज की संरचना को एकरूपता प्रदान करती हैं परन्तु कुछ काल पश्चात् वही रीति-रिवाज समाज की प्रगति में उतने सहयोगी नहीं रह पाते व निष्क्रिय होकर धूल-धूषरित हो जाते हैं।

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