Monday, 14 March 2022

देरिदा का विखंडनवाद

देरिदा का विखंडनवाद

देरिदा का विखंडनवाद : विखंडन सिद्धांत पश्चिम की समीक्षा-प्रणाली का नवीनतम आविष्कार है। फ्रांस के दार्शनिक, भाषाविद् और आलोचक देरिदा इस पद्धति के जनक हैं। विखंडन सिद्धांत को विनिर्मितिवाद (डी-कन्स्ट्रक्शन) भी कहा गया है। यह उत्तर-संरचनावाद का सशक्त अकादमीय आन्दोलन है। डिलिस मिलर, पाल डी. हाइमैन आदि ने इसे समझने और समझाने का प्रयास किया है। कुछ विद्वान इस सिद्धांत को क्रान्तिकारी कहते हैं और कुछ विद्वान् इसे अर्थहीन और आतंकवादी कहते हैं।

देरिदा की पुस्तक ग्रामैटोलॉजी विखंडन-सिद्धांत (डी-कन्स्ट्रक्शन) का मूल आधार है। देरिदा भाषा में उच्चार के स्थान पर लेखन को महत्त्व देते हैं । लेखन उच्चार का चित्रालेख है। विखंडन-सिद्धांत ने साहित्य की 'प्रकृति' और 'कृति' की अवधारणाओं को परिवर्तित कर दिया। देरिदा की इस नयी सोच ने भाषा और दर्शन के प्रश्नों को भी बदलकर रख दिया। उधर फ्रान्सुआ त्योतार ने इतिहास की आधुनिकता को विखण्डित कर दिया। इस प्रकार उत्तर-संरचनावाद एक दार्शनिक रूप की तरह आया है। फ्रांस में यह विचार सातवें-आठवें दशक में विकसित हुआ था, परन्तु आज समूचे विश्व में व्याप्त हो चुका है। पश्चिम के वर्तमान चिन्तन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। यह समूचे विश्व के यथार्थ में विश्वव्यापी अवधारणा के रूप में पढ़ा जा रहा है। उत्तर-संरचनावाद उत्तर-औधोगिक युग की रणनीति है। इसी को विखंडन भी कहा जाता है।

विखंडन-सिद्धांत का अर्थ और स्वरूप

देरिदा के अनुसार विखंडन का कोई परम्परागत रूप सम्भव नहीं है। वह दर्शन होकर भी दर्शन नहीं है और आलोचना होकर भी आलोचना नहीं है। फिर भी, देरिदा का कथन है--"विखंडन की क्रिया यह स्पष्ट करती है कि भाषा किस प्रकार दर्शन की योजना को जटिल बना देती है। विखंडन विचार को निरस्त कर देता है। यह विचारधारा पश्चिमी समाज का संचालन करने में काफी महत्त्वपूर्ण रही है।'' परन्तु देरिदा का विखंडनसिद्धांत विचारधारा को ही नकारता है।

इस दृष्टि से देरिदा दार्शनिक कम और आलोचक अधिक हैं, क्योंकि देरिदा संरचना समीक्षा में कोई अन्तर नहीं मानते । विखंडनवादी दृष्टिकोण में सब बराबर है। आलोचना, दर्शन, भाषा-विज्ञान, नृविज्ञान तथा अन्य सभी प्रकार के मानवविज्ञान देरिदा की दृष्टि में विखंडन की वस्तुएँ हैं।

देरिदा के अनुसार विखंडन (डी-कन्स्ट्रक्शन) के तीन बीज-शब्द हैं-- 

1. भिन्नता (डिफरेन्स) 2. निशान (ट्रेस) 3. आद्य-लेखन (आर्क-राइटिंग)

इनमें प्रथम दो शब्दों का सम्बन्ध साहित्य की भाषिक संरचना से है और तीसरे का अनकहे की खोज से है। भिन्नता का अर्थ चिह्न की दो क्रियाओं से है--भिन्नता और विलम्बन या स्थगन। भिन्नता का अभिप्राय है कि जो वह है, वह दूसरा नहीं है। विलम्बन का अभिप्राय है ऐसा कुछ, जो पूरे तौर पर पाठ में नहीं है या स्थगित है। पहला दिक् में है और दूसरा काल में।

उदाहरणार्थ, 'पंक' और 'पंकज' को लिया जा सकता है। दोनों के उच्चार और लेखन में भिन्नता है। जो एक है, वह दूसरा नहीं है। जो दूसरा है, वह पहला नहीं है। चिह्न की दूसरी शक्ति अर्थ के विलम्बन या स्थगन में है। पंकज का अर्थान्वेषण तब शुरु होता है, जब हम समझ लेते हैं कि वह पुष्प नहीं है। कविता में यह दूसरा अर्थ होता है। अतः चिह्न का आधा भाग वह है, जो वह नहीं है और आधा वह है, जो वहाँ उपस्थित नहीं है। सस्यूर के चिह्न का समीकरण संकेतक + संकेतिक है, जबकि देरिदा का भिन्नता + विलम्बन या स्थगन।

शब्द अपने-आपमें अपर्याप्त या अपूर्ण होता है। वह जितना कहता है, उससे अधिक नहीं कहता यानी उसमें विलोमीकरण की शक्ति होती है। सभी चिह्न हमें उस दिशा की ओर प्रेरित करते है, जो वे नहीं हैं।

प्रश्न उठता है कि जो चिह्न में नहीं है, उसकी खोज कैसे हो? चिह्नों में कुछ निशान होते हैं, जो हमें अनुपस्थित अर्थ की ओर ले जाते हैं। अनुपस्थित आद्यलेखन ही अर्थ है। देरिदा के अनुसार निशान, पद-चिह्न या ट्रेस कुछ है, जिससे अनुपस्थित तक पहुँचा जा सकता है। उनकी दृष्टि से काव्य में भाषा का नहीं, निशान या ट्रेस तथा अनुपस्थिति का महत्त्व है। वस्तुतः भाषा का मौन; अन्तराल, निशान ट्रेस ही है, किन्तु निशान को अदृश्य कहना कुछ भी संकेतित नहीं करता।

भारतीय काव्यशास्त्र में निहित 'गंगायां घोषः' का उदाहरण तथा देरिदा के विखंडन (डी-कन्स्ट्रक्शन) में कुछ समानता नहीं है, क्योंकि भारतीय काव्यशास्त्र की शब्द-शक्तियों का सिद्धांत इससे कहीं अधिक वैज्ञानिक प्रतीत होता है।

रचना और समीक्षा की अभिन्नता

विखंडन-सिद्धांत के अनुसार साहित्यिक रचना और आलोचना में कोई भेद नहीं है, क्योंकि दोनों में अर्थ की बहुलता और जटिलता है। दोनों आशयों को खोजने के लिए आगे बढ़ते रहते हैं। अतः रचना बड़ी है या आलोचना बड़ी है, यह सोचना व्यर्थ है। दोनों ही बराबर हैं।

देरिदा के अनुसार रचना की भाषा आलोचना की भाषा से बड़ी है, क्योंकि वह प्रथम प्रयास है।

देरिदा विखंडन-सिद्धांत के द्वारा यह स्पष्ट करते हैं कि पाठ-प्रक्रिया अलग होती है। साहित्यिक पाठ में उसकी अन्तर्दृष्टि खोजनी होती है। वस्तुतः पाठ एक कार्यवाही है। उससे न कोई परिणाम निकलता है और न कोई निष्कर्ष। इससे केवल भेद की स्थापना होती है।

सस्यूर का मत था कि भेदों की संरचना पर ही भाषा निर्भर है। संरचनात्मक होने के कारण भाषा अपने अन्दर असीम अर्थों को व्याप्त कर लेती है। यही धारणा आधुनिक भाषा-विज्ञान का आधार बनी है। सस्यूर ने प्रथम बार भाषा की आम व्यवस्था (लॉग) और भाषा के स्वतन्त्र वाक् (पेरोल) में भेद किया। सस्यूर का यह भाषागत विवेचन सांस्कृतिक चिन्तन पर भी पड़ा। उसी के परणिामस्वरूप आलोचना जगत् में संरचनावाद की स्थापना हुई।

लेखन पर बल

देरिदा ने वाक् की अपेक्षा लेखन को अधिक महत्त्व दिया है। वह लेखन को भाषा की पूर्व शर्त मानते हैं। उनके अनुसार 'लेखन', 'वाक्' से पहले होता है। यह स्वतन्त्र लेख है। यही भाषा पर अनुशासन रखता है। और उसे प्रामाणिक बनाता है। पश्चिमी दर्शन में लिखित को द्वितीय स्थान दिया गया है।

देरिदा भाषा और विचार के सम्बन्ध को उलट देते हैं। इसी को वे विखंडन कहते हैं। इसी से संरचनावाद को विखंडन की पूर्व शर्त मानते हैं, जबकि सस्यूर ने भाषा को दबा दिया और संरचना में कैद होकर रह गए। उन्होंने वाक् को प्रथम और प्रमुख बना दिया।

विखंडन और पाठ

विखंडन पढ़ने की प्रक्रिया है। यह पढ़ना पाठ से बँधा हुआ है। देरिदा भेद या पार्थक्य पर बल देते हैं। वे इसे पार्थक्य तथा परता (दूरी) कहते हैं। फिर भी, विखंडन अवधारणा में परिवर्तित नहीं हो सका है। देरिदा के अनुसार नवीन अर्थ पूरक रूप में ही है । लेखन एक साथ सांस्कृतिक कर्म का स्रोत है और वह अपने भीतर निहित ज्ञान को दबाने वाला है। विखंडन लेखन में दबे हुए अर्थ को मुक्ति देता है। देरिदा इस सन्दर्भ में कहते हैं कि पाठ के बाहर कुछ नहीं है।

विखंडन का कार्य पाठ के दबे हुए तत्त्व को पाठ के प्रकट-तत्त्व के सामने लाना है, क्योंकि यह पाठ 'दबा हुआ तत्त्व' और दबाने वाला प्रकट-तत्त्व के बीच एक संशय और अन्तर्विरोध पैदा करता है।

देरिदा की राजनीतिक प्रतिबद्धता

देरिदा के विचार मौलिक और महत्त्वपूर्ण हैं। उनका विखंडन सत्यता का दावा करने वाले 'तर्क' को उसी के विरोध में लाकर खड़ा कर देता है तथा उसके कारण छिपे हुए अर्थ को खोजता है । यह देरिदा का अपना पढ़ने का तरीका है। पाश्चात्य दर्शन में सत्य की उपस्थिति तथा पहली उपस्थिति को महत्त्व प्रदान किया गया है । उदाहरणार्थ भाषा में अलंकारों का प्रयोग सत्य को छिपाने का प्रयास है। विखंडन इसी अन्तर्विरोध का उद्घाटन करता है। अलंकार सत्य से सर्वथा अलग है और वह 'सत्य' को सदैव दबाने का प्रयास करता है। अतः सत्य और आलंकारिक भाषा में पृथकता है।

देरिदा ने मार्क्स और नीत्शे के अन्तर्गत छिपे हुए उत्तर-संरचनावाद (विखंडन) से भी प्रभाव ग्रहण किया, जो उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। देरिदा की दृष्टि में मार्क्सवाद का विखंडन अनेक अर्थों की व्याख्या करता है, क्योंकि जब मार्क्स ने आदर्शवाद का विखंडन किया तो वह स्वयं विखण्डित हो गया।

देरिदा ने द्वन्द्ववाद और पार्थक्यवाद में भी भेद स्वीकार किया है। उनका विचार है कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की भाषा अलंकृत होती है। मार्क्सवाद में अलंकार अवधारणा को स्पष्ट करते हैं। देरिदा इसमें छिपे मीमांसावाद का पता लगाते हैं।

देरिदा अपने चिन्तन में मार्क्स के प्रति मौन धारण किए हुए हैं । पश्चिम में ऐसे मौन को असह्य माना गया है। देरिदा ने मार्क्स की अपेक्षा होगेल पर लम्बी टिप्पणी की है।

विखंडन के कारण ही साहित्य विज्ञान से बाहर है व अपने पैरों पर खड़ा है। विज्ञान बाहर से प्रमाण खोजता है, परन्तु साहित्य अपने भीतर भी प्रमाण खोजता है।

यहाँ आकर विखंडन से जुड़कर समीक्षा एक सांस्कृतिक रूप बन गई। इसलिए विखंडन साहित्य की उत्तर-आधुनिक स्थिति है। इस प्रकार विखंडन एक ऐसी रणनीति है, जो उत्तर-संरचनावाद को खण्डित कर देती है।


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