Sunday, 20 March 2022

भारतीय जनजातियों की प्रमुख समस्याओं की व्याख्या कीजिए

भारतीय जनजातियों की प्रमुख समस्याओं की व्याख्या कीजिए

अनुसूचित जनजातियों की समस्याएं

  1. भूमि व्यवस्था सम्बन्धी 
  2. जंगल से सम्बन्धित
  3. अर्थव्यवस्था सम्बन्धी समस्याएं
  4. ऋणग्रस्तता की समस्या
  5. औद्योगिक श्रमिकों की समस्याएं
  6. बाल-विवाह व कन्या-मूल्य समस्याएं
  7. भाषा सम्बन्धी समस्या
  8. धार्मिक समस्याएं
  9. स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं
  10. राजनैतिक तथा प्रशासन-सम्बन्धी समस्याएं

भारतीय जनजातियाँ, जिन्हें सरकारी तौर पर अनुसूचित जनजातियाँ कहा जाता है. ये लोग भी भारतीय संघ के ही सदस्य है और इसीलिए उन्हें अब सामाजिक तौर पर पृथक रखना सम्भव ही नहीं रहा है। फलतः इन जनजातियों का जिन्हें कि अब तक असभ्य, अर्द्धसभ्य या जंगली कहा जाता था, सम्पर्क भारत के अन्य समुदायों के साथ निरन्तर बढ़ता जा रहा है। शिक्षा, प्रचार, यातायात व संवादवाहन के उन्नत साधन टी.वी. इंटरनेट आदि के विकास के साथ-साथ जनजातियों के सदस्य अन्य विकसित समुदायों के साथ घुल-मिल रहे हैं। लेकिन इतना कुछ होते हुए भी यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि इन दोनों की संस्कृति पूर्णतया अलग है और सभ्य समाज का दबाब इन अर्द्धसभ्य या जंगली लोगों पर वास्तव में तीव्र है। सभ्य समाज की चमक-दमक भी जनजातीय लोगों को निरन्तर अपनी ओर आकर्षित करती जा रही है। इन सबका परिणाम यह हुआ है कि अनेक गम्भीर समस्याओं से घिरी भारत की जनजातियों का जीवन आज एक बहुत ही नाजुक अवस्था से होकर गुजर रहा है। अत: हमारे लिए भी इन समस्याओं को उचित रूप में जान लेना आवश्यक होगा, क्योंकि प्रायः तीन करोड़ जनजातियों को पीछे फेंककर राष्ट्रीय उन्नति का सपना देखना भी अनुचित ही है।

भारत की जनजातियों की समस्याएँ सीधी और सरल नहीं हैं। ये समस्याएँ वास्तव में बहुत ही विस्तृत और सम्बन्धित हैं। बाह्य संस्कृति के प्रभाव से वे अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, आर्थिक क्षेत्र में अनेक प्रकार के शोषण का शिकार बन रहे हैं। ऋणग्रस्त होकर महाजनों के चंगुल में फँसते जा रहे हैं, पर्याप्त और पौष्टिक भोजन न पाने से अनेक प्रकार के रोगों का शिकार होते और अपने स्वास्थ्य को नष्ट करते जा रहे हैं, अपने आत्म-निर्भर और स्वावलम्बी जीवन को खोकर नौकरी की खोज में इधरउधर या तो मारे-मारे भटक रहे हैं या अपने श्रम को कौड़ी के मूल्य पर बेच रहे हैं और उन प्रौद्योगिक केन्द्रों के प्रलोभनों - शराब, वेश्यावृत्ति आदि का शिकार बन रहे हैं या अपने प्रदेश में रहकर चरम निर्धनता के कारण रुपए के लिए अपने ही समाज में यौन-व्यभिचारों को आमन्त्रित कर रहे हैं।

जनजातियों की समस्याएँ निम्नलिखित हैं -

1. भूमि व्यवस्था सम्बन्धी - पहले भूमि पर जनजातियों का एकाधिकार हुआ करता था और व उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करती थीं। अब नए कानूनों ने उनकी पुरानी स्वतंत्रता को छीन लिया है। अब वे मनमाने तौर पर जंगल को काटकर स्थानान्तरित खेती नहीं कर सकती। साथ ही नयी भूमि व्यवस्था द्वारा दी गई भूमि पर बसकर जनजातियाँ खेती नहीं करती क्योंकि वे स्थानान्तरित खेती को अपन धर्म का अंग समझती हैं और जमीन को जोतकर खेती करने से डरती हैं। जो लोग ऐसा करते भी है उनके हाथ से भी जमीन धीरे-धीरे निकलती जा रही है। चालाक महाजन उनको कुछ उधार देकर उसी के बहाने अन्त में उनसे उनकी जमीन तक छीन लेते हैं और फिर उन भूखे मरते हुए लोगों को उसी जमीन पर नौकर रखकर उनसे ही खेती करवाते है और अपनी जेबे भरते हैं।

2. जंगल से सम्बन्धित - पहले जनजातियों को उनके जंगलों पर पूर्ण अधिकार होता था और वे वन-सम्पत्तियों का उपभोग बिना किसी प्रतिबन्ध के करते थे। जंगली वस्तुओं, पशु, वृक्ष सभी के वे पूरे मालिक थे। पर अब परिस्थिति बिल्कुल विपरीत है। अब इन समस्त चीजों पर सरकार का नियन्त्रण है और ठेकेदारों द्वारा लकड़ी या कोयला आदि निकालने के सभी काम कर रहे हैं। ये ठेकेदार जनजातियों की अज्ञानता और सरलता से लाभ उठाकर उनका खूब शोषण करते हैं। रात-दिन कठिन परिश्रम करने पर भी इतनी मजदूरी नहीं मिल पाती है कि वे अपना पेट भर सकें. अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति तो दूर की बात है।

3. अर्थव्यवस्था सम्बन्धी समस्याएँ - वर्तमान समय में जनजातीय अर्थव्यवस्था में भी कुछ परिवर्तन हुए हैं। उनमें प्रमुख परिवर्तन यह है कि वे मुद्रा-रहित से मुद्रा-सहित अर्थव्यवस्था में आ रहे हैं। इससे लाभ उठाने के लिए अनेक व्यापारी वर्ग, मादक वस्तुओं के विक्रेता आदि भोली-भाली जनजातियों के क्षेत्रों में आकर बस गए हैं और उन्हें खूब ठगते है।

4. ऋणग्रस्तता की समस्या - जनजातियों की अज्ञानता और निर्धनता से लाभ उठाने के लिए न केवल व्यापारी बल्कि अनेक कर्ज देने वाले महाजन और साहूकार भी उनके प्रदेशों में प्रवेश कर गए हैं। भोली-भाली जनजातियों को किसी-न-किसी उपाय से ऋण के चक्कर में फाँसना और अन्त में उनकी जमीन तक छीन लेना इनका रोज का धन्धा हैं। अनेक पीढ़ियों तक जनजातियों के लोग कर्ज के भार से मुक्त नहीं हो पाते हैं और अनेक बार उन्हें जिन्दगी भर महाजन की जमीन पर बेगार करनी पड़ती है। ऋणग्रस्तता से सम्बन्धित इन महाजनों या साहूकारों की समस्या जनजातीय आर्थिक जीवन की एक प्रमख समस्या है।

5. औद्योगिक श्रमिकों की समस्याएँ - कारखानों, चाय के बागानों और खानों में काम करने वाले जनजातीय श्रमिकों की अवस्था और दयनीय है। उनको अपने परिश्रम का उचित वेतन नहीं दिया जाता, रहने के लिए मकान आदि की कोई व्यवस्था नहीं है और काम करने की अवस्थाएँ भी शोचनीय हैं। इस कारण अवसर मिलते ही वे फिर गाँव को भाग आते हैं। ठेकेदार आदि के द्वारा अप्रत्यक्ष भर्ती और काम लेने की प्रथा उनके शोषण का रास्ता और भी विस्तृत कर देती है।

6. बाल-विवाह व कन्या-मूल्य समस्याएँ - जनजातियों में विवाह अधिक आयु में होता था पर हिन्दओं के सम्पर्क में आने के कारण उनमें भी बाल-विवाह का प्रसार हो रहा है जो स्वयं ही एक सी सामाजिक समस्या है जो हिन्दू समाज को सदियों से पीड़ित कर रही है। मुद्रा की महिमा आज जनजातियों के जीवन में भी बढ़ रही है जिसके कारण पहले जो कन्या-मूल्य वस्तुओं के रूप में दिया जाता था अब सर्वत्र रुपये के रूप में माँगा जाता है और वह भी दिन-प्रतिदिन इतना बढ़ता जा रहा है कि साधारण व्यक्तियों के लिए विवाह करना कठिन हो गया है। कन्या-हरण की समस्या इस कारण बढ़ रही धारण व्यक्तियों के लिए विवाह करना कठिन हो गया है। कन्या-हरण की समरगा है।

7. भाषा सम्बन्धी समस्या - बाहरी संस्कृति के संपर्क में आने से प्रमुख समस्या दो भाषावाद का उत्पन्न होना था। जनजाति के लोग अपनी भाषा के साथ-साथ बाहरी भाषा भी बोलने लगे हैं और कभी कभी तो वे अपनी भाषा की ओर से इतना अधिक उदासीन हो जाते है कि कुछ समय के पश्चात् अपनी भाषा को ही भूल जाते हैं। इससे एक जनजाति के लोगों में आपस के सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अत्यधिक बाधा उत्पन्न होती है। इससे न केवल सामुदायिक भावना का ह्रास होता है बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों का भी पतन होने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में सामाजिक विघटन उत्पन्न होता है।

8. धार्मिक समस्याएँ - धार्मिक क्षेत्र में जनजातियों पर दो धर्मों-हिन्दू और ईसाई धर्म का प्रभाव स्पष्टं है। एक ओर हिन्दू धर्म से प्रभावित जनजातियाँ जैसे भील और गोंड हैं, और दूसरी ओर ईसाई धर्म से प्रभावित बिहार और असोम की जनजातियाँ हैं। जनजाति के लोग धर्म को अपनी अनेक सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के साधन के रूप में प्रयोग करते हैं। नए धर्मों में नए विश्वास और संस्कार तो उन्हें मिल गए लेकिन उनकी समस्याओं को हल करने के नए साधन उन्हें नहीं मिल पाए। इससे जनजातियों में असन्तोष की भावना का उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक ही है। इन धर्म-परिवर्तनों का एक दूसरा बुरा प्रभाव जनजातियों की एकता पर पड़ा है। हिन्दू-अहिन्दू, ईसाई-गैर ईसाई इस प्रकार का भेदभाव जनजातीय समाज में धर्म-परिवर्तनो का ही परिणाम है। राजस्थान के भीलों में हिन्दू धर्म के प्रभाव से एक धार्मिक आन्दोलन 'भगत आन्दोलन' चला जिसने भीलों को भगत और अभगत दो श्रेणियों में बाँट दिया। ऐसा ही प्रभाव ईसाई धर्म का भी है। एक ही समूह में नहीं बल्कि एक ही परिवार में धार्मिक-भेद-भाव दिखने लगे। इससे एक ओर सामुदायिक एकता और संगठन टूटने लगा और दूसरी ओर पारिवारिक तनाव, भेद-भाव, लड़ाई-झगड़ा या विघटन भी बढ़ता ही गया।

9. स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ - कुछ तो परिस्थिति-सम्बन्धी कारणों से और कुछ बाहरी संस्कृतियों के सम्पर्क में आने से जनजातियों के जीवन में स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं, जिनमें अग्रलिखित प्रमुख हैं . खान-पान, वस्त्र, चिकित्सा का अभाव । जनजाति ताड़, महुआ अथवा चावल से बने मादक द्रव्यों का उपभोग रोज और उत्सव आदि में विशेषकर करते हैं। परन्तु विटामिन 'बी' और 'सी' अधिक मात्रा में होने के कारण ऐसे मादक द्रव्यों से हानि की अपेक्षा लाभ अधिक होता है। परन्तु अब सरकार द्वारा इन पर प्रतिबन्ध लग जाने से देशी व विलायती शराबों का प्रचलन हो गया है। चूंकि यह शराब अधिक मादक व हानिप्रद होती है इस कारण इसके उपभोग का बहुत बुरा प्रभाव जनजातियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। उसी प्रकार अपनी निर्धनता के कारण अधिकतर जनजातियों को सन्तुलित भोजन प्राप्त नहीं हो पाता है जिससे उनका स्वास्थ्य-स्तर गिरता है व वे अनेक प्रकार के रोगों का शिकार बनने है। दूसरी समस्या वस्त्रों से सम्बन्धित हैं। सभ्य समाज के सम्पर्क में आने कारण अब जनजातियाँ वस्त्रहीन न रहकर वस्त्र धारण करती हैं परन्तु आर्थिक दशा अत्यधिक खराब होने के कारण एक समय में एक से ज्यादा कपड़ा उनके पास नहीं होता है जिससे गन्दगी व चर्म रोग फैलते हैं। पौष्टिक भोजन की कमी के कारण लोग कई बीमारियों का शिकार बन जाते हैं। गरीबी, बीमारियों के इलाज के सम्बन्ध में पर्याप्त ज्ञान न होना, डॉक्टरों में विश्वास न होना, यातायात के साधनों में अभाव में दुर्गम प्रदेशों में डॉक्टरों का न पहुँच पाना, सफाई से न रहना, पौष्टिक आहार की कमी आदि स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के प्रमुख कारण हैं।

10. राजनैतिक तथा प्रशासन-सम्बन्धी समस्याएँ - नई शासन-व्यवस्था के अन्तर्गत आ जाने से जनजातियों के राजनैतिक जीवन में अनुकूलन की कुछ समस्याएँ स्वतः ही उत्पन्न हो गई हैं। इनमें सबसे प्रमुख समस्या यह है कि नए कानूनों के अन्तर्गत उनके पुराने वंशानुगत मुखिया और पंचायतों की सर्वमान्य सत्ता समाप्त होती जा रही है। इसमें उनमें असन्तोष की भावना घर कर गई है और साथ ही, सरकारी अधिकारियों पुलिस आदि से अनुकूलन की समस्या उत्पन्न हो गई है। सरकारी कानूनों के द्वारा जनजातियों का कितना अहित हो रहा है इस ओर ने सबका ध्यान आकर्षित किया है। जज, मजिस्टेट. पलिस. वन-अधिकारी आदि के अच्छे-से-अच्छे इरादे होते हुए भी वे जनजातीय लोगों के हृदय को जीतने में असफल रहे हैं क्योंकि ये अफसर इन जनजातियों के रीति-रिवाजों, भावनाओं, आशा व आकांक्षाओं से पूर्णतया अपरिचित होते हैं। इससे जनजातियों के जीवन की समस्याएँ सुलझने के बजाय नवीन समस्याओं को जन्म लेने का अवसर मिल जाता है।


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