Thursday, 17 March 2022

दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण मंदिर और राजा

दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण मंदिर और राजा

लगभग 5000 ई.पू. से दक्षिणी मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास प्रारम्भ हुआ। इन्हीं बस्तियों में से कुछ प्राचीन शहरों के रूप में विकसित हुयी। बेबीलोन, उरुनगर, मारीनगर आदि मेसोपोटामिया सभ्यता के प्रमुख नगर थे। ये शहर कई तरह के थे। पहले वे जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए; दूसरे जो व्यापार के केंद्रों के रूप में विकसित हुए; और शेष शाही शहर थे। 

बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने अपने गाँवों में कुछ चुने हुए स्थानों या मंदिरों को बनाना या उनका पुनर्निर्माण करना शुरू किया। सबसे पहला ज्ञात मंदिर एक छोटा-सा देवालय था जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था। मंदिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास स्थान थे, जैसे उर जो चंद्र देवता था और इन्नाना जो प्रेम व युद्ध की देवी थी। ये मंदिर ईंटों से बनाए जाते थे और समय के साथ बड़े होते गए। क्योंकि उनके खुले आँगनों के चारों ओर कई कमरे बने होते थे। कुछ प्रारंभिक मंदिर साधारण घरों से अलग किस्म के नहीं होते थे- क्योंकि मंदिर भी किसी देवता का घर ही होता था। लेकिन मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुई होती थीं; यही मंदिरों की विशेषता थी। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं।

देवता पूजा का केंद्र-बिंदु होता था। लोग देवी-देवता के लिए अन्न, दही, मछली लाते थे (पुराने जमाने के कुछ मंदिरों के फ़र्शों पर मछली की हड़ियों की परतें जमी हुई मिली हैं।) आराध्य देव सैद्धांतिक रूप से खेतों, मत्स्य क्षेत्रों और स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी माना जाता था। समय आने पर उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया (जैसे तेल निकालना, अनाज पीसना, कातना और ऊनी कपड़ों को बुनना आदि) यहीं की जाती थी। घर-परिवार से ऊपर के स्तर के व्यवस्थापक, व्यापारियों के नियोक्ता, अन्न, हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, जौ की शराब. मछली आदि के आवंटन और वितरण के लिखित अभिलेखों के पालक के रूप में मंदिर ने धीरे-धीरे अपने क्रियाकलाप बढ़ा लिए और मुख्य शहरी संस्था का रूप ले लिया। लेकिन अन्य दूसरे कारक भी इस व्यवस्था में विद्यमान थे।

ज़मीन में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि कई बार संकटों से घिर जाती थी। फ़रात नदी की प्राकृतिक धाराओं में किसी वर्ष तो बहुत ज़्यादा पानी बह आता था और फ़सलों को डुबा देता था और कभी-कभी ये धाराएँ अपना रास्ता बदल लेती थीं, जिससे खेत सूखे रह जाते थे। जैसा कि पुरातत्त्वीय अभिलेखों से पता चलता है, मेसोपोटामिया के इतिहास में गाँव समय-समय पर पुनः स्थापित किए जाते रहे हैं। इन प्राकृतिक विपदाओं के अलावा, कई बार मानव-निर्मित समस्याएँ भी आ खड़ी होती थीं। जो लोग इन धाराओं के ऊपरी इलाकों में रहते थे, वे अपने पास की जलधारा से इतना ज़्यादा पानी अपने खेतों में ले लेते थे कि धारा के नीचे की ओर बसे हुए गाँवों को पानी ही नहीं मिलता था। ये लोग अपने हिस्से की सरणी में से गाद (मिट्टी) नहीं निकालते थे, जिससे बहाव रुक जाता था और नीचे वालों को पानी नहीं मिलता था। इसलिए मेसोपोटामिया के तत्कालीन देहातों में ज़मीन और पानी के लिए बार-बार झगड़े हुआ करते थे।

जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक लड़ाई चलती थी तो जो मुखिया लड़ाई जीतते थे वे अपने साथियों एवं अनुयायियों को लूट का माल बाँटकर खुश कर देते थे तथा हारे हुए समूहों में से लोगों को बंदी बनाकर अपने साथ ले जाते थे, जिन्हें वे अपने चौकीदार या नौकर बना लेते थे। इस प्रकार, वे अपना प्रभाव और अनुयायियों की संख्या बढ़ा लेते थे। किंतु, युद्ध में विजयी होने वाले ये नेता लोग स्थायी रूप से समुदाय के मुखिया नहीं बने रहते थे; आज हैं तो कल चले जाते थे। लेकिन बाद में एक ऐसा समय आया जब इन नेताओं ने समुदाय के कल्याण पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया और उसके फलस्वरूप नयी-नयी संस्थाएँ और परिपाटियाँ स्थापित हो गईं। इस समय के विजेता मुखियाओं ने कीमती भेंटों को देवताओं पर अर्पित करना शुरू कर दिया जिससे कि समुदाय के मंदिरों की सुंदरता बढ़ गई। उन्होंने लोगों को उत्कृष्ट पत्थरों और धातुओं को लाने के लिए भेजा. जो देवता और समदाय को लाभ पहुँचा सकें तथा मंदिर की धन-संपदा के वितरण का और मंदिरों में आने-जाने वाली वस्तुओं का हिसाब-किताब रखकर प्रभावी तरीके से संचालन कर सकें। जैसा कि एनमर्कर से जुड़ी कविताएँ व्यक्त करती हैं कि इस व्यवस्था ने राजा को ऊँचा स्थान दिलाया तथा समुदाय पर उसका पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।

हम पारस्परिक हितों को सुदृढ़ करने वाले विकास के एक ऐसे दौर की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें मुखिया लोगों ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे कि वे आवश्यकता पड़ने पर तुरंत अपनी सेना इकट्ठी कर सकें। इसके अलावा, लोग एक-दूसरे के आस-पास रहने से स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस कर सकें। उरुक,जो उन दिनों सबसे पुराने मंदिर-नगरों में से एक था, से हमें सशस्त्र वीरों और उनसे हताहत हुए शत्रुओं के चित्र मिलते हैं; और सावधानीपूर्वक किए गए पुरातत्त्वीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि 3000 ई.पू. के आसपास जब उरुक नगर का 250 हैक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ तो उसके कारण दर्जनों छोटे-छोटे गाँव उजड़ गए और बड़ी संख्या में आबादी का विस्थापन हुआ। उसका यह विस्तार शताब्दियों बाद फले-फूले मोहनजोदड़ो नगर से दो गुना था। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि उरुक नगर की रक्षा के लिए उसके चारों ओर काफी पहले ही एक सुदृढ़ प्राचीर बना दी गई थी। उरुक नगर 4200 ई.पू. से 400 ईसवी तक बराबर अपने अस्तित्व में बना रहा, और उस दौरान 2800 ई.पू. के आसपास वह बढ़कर 400 हैक्टेयर में फैल गया।

युद्धबंदियों ओर स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था। कृषिकर भले ही न देना पडे. पर काम करना अनिवार्य था। जिन्हें काम पर लगाया जाता था उन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता था। सैकड़ों ऐसी राशन-सूचियाँ मिली हैं जिनमें काम करने वाले लोगों के नामों के आगे उन्हें दिए जाने वाले अनाज, कपड़े और तेल आदि की मात्रा लिखी गई है। एक अनुमान के अनुसार, इन मंदिरों में से एक मंदिर को बनाने के लिए 1500 आदमियों ने पाँच साल तक प्रतिदिन 10 घंटे काम किया था।

शासक के हुक्म से आम लोग पत्थर खोदने, धातु-खनिज लाने, मिट्टी से ईंटें तैयार करने और मंदिर में लगाने, और सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे। इसकी वजह से 3000 ई.पू. के आसपास उरुक में खूब तकनीकी प्रगति भी हुई। अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औजारों का प्रयोग होता था। वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था क्योंकि उन दिनों बड़े-बड़े कमरों की छतों के बोझ को सँभालने के लिए शहतीर बनाने हेतु उपयुक्त लकड़ी नहीं मिलती थी।

सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्टी के शंकु (कोन) बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था। इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों में रँगकर मंदिरों की दीवारों में लगाया जाता था जिससे वे दीवारें विभिन्न रंगों से सुशोभित हो जाती थीं। मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उच्चकोटि की सफलता प्राप्त की गई; इस कला के सुंदर नमूने आसानी से उपलब्ध होने वाली चिकनी मिट्टी की अपेक्षा अधिकतर आयातित पत्थरों से तैयार किए जाते थे। तभी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी एक युगांतरकारी परिवर्तन आया जो शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयुक्त साबित हुआ और वह थाः कुम्हार के चाक का निर्माण। आगे चलकर इस चाक से कुम्हार की कार्यशाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दर्जनों एक जैसे बर्तन आसानी से बनाए जाने लगे।

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