मेसोपोटामिया का उत्खनन कब प्रारंभ हुआ था ?

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मेसोपोटामिया का उत्खनन कब प्रारंभ हुआ था ?

मेसोपोटामिया में पुरातत्त्वीय उत्खनन का कार्य 1840 के दशक में प्रारंभ हुआ। वहाँ एक या दो स्थलों पर (जैसे उरुक और मारी में) उत्खनन कार्य कई दशकों तक चलता रहा। इन खुदाइयों के फलस्वरूप आज हम इतिहास के स्रोतों के रूप में सैकड़ों की संख्या में इमारतों, मूर्तियों, आभूषणों, कब्रों, औज़ारों और मुद्राओं का ही नहीं बल्कि हज़ारों की संख्या में लिखित दस्तावेज़ों का भी अध्ययन कर सकते हैं। उर नगर 1922 में तब प्रसिद्ध हुआ जब सर लियोनार्ड वूली ने खंडहरों की खुदाई की और द ग्रेट डेथ पिट एवं रॉयल टॉम्ब्स की खोज की। 

यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि बाईबल के प्रथम भाग 'ओल्ड टेस्टामेंट' में इसका उल्लेख कई संदर्भो में किया गया है। उदाहरण के लिए, ओल्ड टेस्टामेंट की 'बुक ऑफ जेनेसिस' (Book of Genesis) में 'शिमार' (shimar) का उल्लेख है जिसका तात्पर्य अर्थात् सुमेर ईंटों से बने शहरों की भूमि से है। यूरोप के यात्रीऔर विद्वज्जन मेसोपोटामिया को एक तरह से अपने पूर्वजों की भूमि मानते थे, और जब इस क्षेत्र में पुरातत्त्वीय खोज की शुरुआत हुई तो ओल्ड टेस्टामेंट के अक्षरशः सत्य को सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया।

उन्नीसवीं सदी के मध्य से, मेसोपोटामिया के अतीत को खोजे जाने के उत्साह में कभी कोई कमी नहीं आई। सन 1873 में एक ब्रिटिश सामाचार-पत्र ने ब्रिटिश म्यूजियम द्वारा प्रारंभ किए गए खोज अभियान का खर्च उठाया जिसके अंतर्गत मेसोपोटामिया में एक ऐसी पट्टिका (Tablet) की खोज की जानी थी जिसपर बाईबल में उल्लिखित जलप्लावन (Flood) की कहानी का अंकन था।

1960 के दशक तक यह समझा जाता था कि ओल्ड टेस्टामेंट की कहानियाँ अक्षरश: सही नहीं हैं लेकिन ये इतिहास में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के अतीत को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। धीरे-धीरे, पुरातात्त्विक तकनीकें अधिकाधिक उन्नत और परिष्कृत होती गईं। इसके अलावा भिन्न-भिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाने लगा, यहाँ तक कि आम लोगों के जीवन की भी परिकल्पना की जाने लगी। बाईबल की कहानियों की अक्षरशः सच्चाई को प्रमाणित करने का कार्य गौण हो गया। आगे के अनुभागों में हम जिन बातों पर चर्चा करेंगे उनमें से अधिकांश इन परवर्ती अध्ययनों पर आधारित हैं।

मेसोपोटामिया के नगरों की खुदाई

आज, मेसोपोटामिया के पुरास्थलों के उत्खनक पहले के उत्खनकों की तुलना में बहुत अधिक कुशल हैं, उनके कार्य की यथार्थता एवं परिशुद्धता और अभिलेखन का स्तर बहुत ऊँचा है। इसलिए अब उस तरह के बड़े-बड़े इलाकों की खुदाई नहीं की जाती जैसी उर नगर में की गई थी। इसके अलावा, बहुत कम पुरातत्त्वविदों के पास ही इतनी बड़ी धनराशि होती है कि वे एक साथ खनकों के बड़े दल को खुदाई के काम पर लगा सकें। इस प्रकार जानकारी प्राप्त करने का तरीका बदल गया है।

इस संबंध में 'अब सलाबिख' (Abu Salabikh) नाम के एक छोटे कस्बे का उदाहरण लें। यह कस्बा 2500 ई. पू. में लगभग 10 हैक्टेयर जमीन पर बसा हुआ था और इसकी आबादी 10,000 से कम थी। इसकी दीवारों की रूपरेखा की ऊपरी सतहों को सर्वप्रथम खरोंचकर निकाला गया। इस प्रक्रिया में टीले की ऊपरी सतह को किसी बेलचे, फावडे या अन्य औज़ार के धारदार चौड़े सिरे से कुछ मिलीमीटर तक खरोंचा जाता है। नीचे की मिट्टी तब भी कुछ नम पाई गई और पुरातत्त्वविदों ने भिन्न-भिन्न रंगों, उसकी बनावट तथा ईंटों की दीवारों की स्थिति तथा गड्डों और अन्य विशेषताओं का पता लगा लिया। जिन थोडे-से घरों की खोज की गई उन्हें खोद कर निकाला गया। पुरातत्त्वविदों ने पौधों और पशुओं के अवशेषों को प्राप्त करने के लिए टनों मिट्टी की छानबीन की। इसके चलते उन्होंने पौधों और पशुओं की अनेक प्रजातियों का पता लगाया। उन्हें बड़ी मात्रा में जली हुई मछलियों की हड्डियाँ भी मिलीं जो बुहार कर बाहर गलियों में डाल दी गई थीं। वहाँ गोबर के उपलों के जले हुए ईधन में से निकले हुए पौधों के बीज और रेशे मिले थे; इससे इस स्थान पर रसोईघर होने का पता चला। घरों में रहने के कमरे कौन-से थे, यह जानने के संकेत बहुत कम मिले हैं। वहाँ की गलियों में सूअरों के छोटे बच्चों के दाँत पाए गए हैं, जिन्हें देखकर पुरातत्त्वविदों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अन्य किसी भी मेसोपोटामियाई नगर की तरह यहाँ भी सूअर छुट्टे घूमा करते थे। वस्तुतः एक घर में तो आँगन के नीचे, जहाँ किसी मृतक को दफनाया गया था, सुअर की कछ हड़ियों के अवशेष मिले हैं जिससे प्रतीत होता है कि व्यक्ति के मरणोपरांत जीवन में खाने के लिए सूअर का कुछ मांस रखा गया था। पुरातत्त्वविदों ने कमरों के फर्श का बारीकी से अध्ययन यह जानने के लिए किया कि घर के कौन-से कमरों पर पोपलार (एक लंबा पतला पेड़) के लट्ठों, खजूर की पत्तियों और घासफूस की छतें थीं और कौन-से कमरे बिना किसी छत के खुले आकाश के नीचे थे।

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