अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना का अर्थ परिभाषा और आवश्यकता बताइए।

अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना का अर्थ परिभाषा और आवश्यकता बताइए: अंतर्राष्ट्रीय एकता वह सूचित चेतना है जो विश्व समाज में एक राष्ट्र का अस्तित्व बनाये रखती ह

अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना का अर्थ परिभाषा और आवश्यकता बताइए।

अंतर्राष्ट्रीय एकता के लिए शिक्षा का प्रारम्भ 20वीं शताब्दी में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ। इसका प्रमुख प्रवर्तक पियरे ड्यूबियस (Pierre Dubious) को माना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय एकता के लिए शिक्षा वह साधन बन जाती है जो अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव व सहयोग को विकसित करने में अपना योगदान देती है। आज के युग में प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के सहयोग का आकांक्षी है। आज विश्व एक-दूसरे से इतना समीप आ गया है कि उसके राष्ट्रों के बीच में एकता का भाव होना अति आवश्यक है। वास्तव में जब व्यक्ति अपने आपको राष्ट्रीयता की परिधि से हटा देता है तो वह सम्पूर्ण मानव जाति के साथ एकीकरण स्थापित करने लगता है, तब उसके अन्दर अंतर्राष्ट्रीय सूझ- बूझ उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति विश्व-बन्धुत्व व विश्व शान्ति की कल्पना करने लगता है। भारतवर्ष की संस्कृति तो सदैव ही विश्व बंधुत्व या वसुधैव कुटुम्बकम् की रही है। यहां के हर मनीषी ने इस विचार का कठोर समर्थन किया है कि वसुधा पर रहने वाला हर प्राणी ईश्वर की संतान है। इस कारण हमें उसके साथ भ्रातृत्व का भाव रखना चाहिए। हमें अपने आपको संकीर्णता से युक्त राष्ट्रवादी विचारों से ऊपर उठाना चाहिए व स्वयं को सम्पूर्ण विश्व के नागरिक के रूप में देखना चाहिए। हमारा हर प्रयास विश्व में शान्ति तथा भाईचारे को बनाने की दिशा की ओर उन्मुख होना चाहिए व पूरा प्रयास यह होना चाहिए कि हम विश्व में अशान्ति फैलाने वाले तत्वों से दूर रहें। 

अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना की परिभाषा (Definition of International Understanding in Hindi)

1. सफाया व सईदा के अनुसार “अंतर्राष्ट्रीय एकता वह सूचित चेतना है जो विश्व समाज में एक राष्ट्र का अस्तित्व बनाये रखती है तथा एक राष्ट्र यदि अपना अस्तित्व कायम रखना चाहता है तो उसे विश्व समाज में शान्ति बनाये रखने का प्रयत्न करना होगा तथा युद्धों से बचना होगा।” 

("International Understanding may be defined as informed consciousness of the place of one's own nation in the world society and the contribution that it can make world society whose survival depends upon maintenance of peace and relief from wars." - Safaya Shaida)

2. गोल्डस्मिथ के अनुसार- "अंतर्राष्ट्रीयता एक भावना है, जो व्यक्ति को बताती है कि वह अपने राज्य का ही सदस्य नहीं है वरन् विश्व का नागरिक भी है। "

("Inaternationalism is a feeling that the individual is not only a member of his state, but a citizen of the world." - Goldsmith)

3. डॉ. डब्ल्यू.एच.सी. लेब्ज के अनुसार - "अंतर्राष्ट्रीय भावना इस ओर ध्यान दिये बिना कि व्यक्ति किस राष्ट्रीयता या संस्कृति के हैं, एक-दूसरे के प्रति सब जगह उनके व्यवहार का आलोचनात्मक और निष्पक्ष रूप से निरीक्षण करने और आँकने की योग्यता है । \" ("International Understanding is the ability to observe cirically and objectively and appraise the conduct of men everywhere to each other irrespective of the nationality or culture to which they belong." - Dr. W.H.C. Laves)

अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना की आवश्यकता (Need of International Understanding)

जब हम व्यक्ति को प्रारम्भ से ही यह सिखाते हैं कि अपने देश से प्रेम करो व अपने देश को महान समझो तो हम बालक के अंदर संकीर्ण दृष्टिकोण उत्पन्न कर देते हैं और यह संकुचित राष्ट्रवादी विचारधारा ही विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के मध्य संघर्षमयी परिस्थितियां उत्पन्न करती है। इसी कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा हैः- “पृथकता का अर्थ पिछड़ापन और पतन । दुनिया बदल गई है और पुराने खत्म होने जा रहे हैं और जीवन अंतर्राष्ट्रीय होता जा रहा है। हमें इस भावी अंतर्राष्ट्रीयता में अपनी भूमिका अदा करनी है। "

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा को समाप्त करें, जिससे हम सम्पूर्ण मानव जाति के बीच में मधुर संबंध स्थापित कर सकें। यदि वास्तव में हम युद्ध की राजनीति से दूर रहना चाहते है तथा व्यक्तियों के मध्य सहयोग, सहनशीलता, समायोजन व प्रेम को विकसित करना चाहते है तो हमें अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव को जागृत करना होगा। इस समंबंध में रोमेंन रालैण्ड ने ठीक ही कहा है - “दो महायुद्धों के दुष्परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मलिन व उत्तेजक राष्ट्रीयता का भाव समाप्त किया जाना चाहिए और मानवता का भाव स्थापित किया जाना चाहिए तथा मनुष्य में प्रेम व सहानुभूति का भाव उत्पन्न किया जाना चाहिए।

विश्व के सभी राष्ट्रों को समीप लाना वर्तमान वैज्ञानिक तकनीकी युग की एक आवश्यकता भी है। आज आवागमन व संचार के साधनों ने विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के मध्य की दूरी को समाप्त कर दिया है। आज के युग में कोई भी राष्ट्र स्वयं में आत्मनिर्भर नहीं है। सभी राष्ट्र आर्थिक, राजनैतिक सांस्कृतिक आवश्यकताओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। किसी भी देश में यदि कोई संकट आता है तो हम चिन्तित हो उठते हैं। चाहे वह राजनैतिक संकट हो या आर्थिक। हम आज इस बात की आवश्यकता भी अनुभव करते हैं कि विश्व में जो विनाशकारी यंत्र है, उनका प्रयोग मानव के विनाश के लिए न होकर मानव के कल्याण एवं विकास के लिए होना चाहिए। 

यूनेस्को के कार्य (Function of UNESCO)

  1. विभिन्न राष्ट्रों में व्याप्त भय को दूर करना व उन्हें एक-दूसरे का ज्ञान कराना जिससे वह विश्वास करके निकट आ सकें।
  2. पिछड़े देशों से अज्ञानता और निरक्षरता को दूर करने का भरसक प्रयास करना ।
  3. विभिन्न देशों की संस्कृति, कला, विज्ञान व साहित्य को एक-दूसरे के समीप लाना, जिससे वह सब लाभान्वित हो सकें।
  4. शोध छात्रों को वित्तीय सहायता देना, जिससे वह अधिक से अधिक शोध कार्य कर सकें।
  5. विभिन्न देशों के विचारकों, अध्यापकों, वैज्ञानिकों व दार्शनिकों को एक-दूसरे से विचार- विमर्श करने के अवसर देना, जिससे वह समस्याओं का हल ढूँढ सकें।
  6. गरीब व पिछड़े हुये देशों में स्कूल खोलने हेतु वित्तीय सहायता देना।
  7. अंतर्राष्ट्रीय कला एवं साहित्य की प्रदर्शनी द्वारा एकता के संकेतों को समझाया जाता है व सद्भावना और एकता के सूत्र में बाँधा जाता है।
  8. अंतर्राष्ट्रीय पर्यटनों का प्रबंध करना जिससे विश्व के विभिन्न भागों के विद्यार्थियों में अच्छे संबंध स्थापित किये जा सकें।
  9. भाई-चारे व ‘हम’ भावना का प्रसार दूरदर्शन या अन्य सामग्रियों के माध्यम से करना।
  10. विश्व इतिहास द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की सुरक्षा करना सिखाना।
  11. पाठ्यक्रम में विज्ञान के अध्ययन को प्रमुख स्थान देना।

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