राजनीतिक क्षय पर निबंध

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राजनीतिक क्षय पर निबंध

    राजनीतिक क्षय की अवधारणा

    राजनीतिक क्षय (Political Decay) - 'राजनीतिक क्षय' की अवधारणा का प्रतिपादन तुलनात्मक राजनीति में सर्वप्रथम विधिवत रूप से सैमुअल पी. हटिंगटन द्वारा किया गया। हटिंगटन एक आधुनिक अमेरिकी राजनीति विज्ञानी थे। राजनीति क्षय की धारणा द्वारा हटिंगटन ने यह उल्लिखित करने का प्रयास किया कि राजनीतिक विकास व आधुनिकीकरण के साथ-साथ राजनीतिक क्षय की प्रक्रिया की आधुनिक राज्यों में चलायमान है।

    वस्तुतः हटिंगटन द्वारा प्रतिपादित 'राजनीतिक क्षय' की धारणा का विश्लेषण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत भली प्रकार से किया जा सकता है -

    राजनीतिक क्षय से अभिप्राय

    राजनीतिक क्षय से अभिप्राय राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त उस अवस्था से है जिसमें राजनीतिक संस्थाओं, अभिकरणों व इसके सदस्यों में राजनीतिक मूल्यों व आदर्शों के प्रति गिरावट आने लगती है। राजनीतिक क्षय एक प्रकार से स्वस्थ राजनीतिक मूल्यों, स्थितियों व कार्यों में गिरावट का प्रतीक है। हटिंगटन ने राजनीतिक क्षय सम्बन्धी अपनी धारणा में आधुनिकीकरण व संस्थावाद की प्रक्रिया के दुष्परिणामों के रूप में राजनीतिक क्षय' का विश्लेषण करते हैं। हटिंगटन सामाजिक आधुनिकीकरण और राजनीतिक आधुनिकीकरण में असमानता को 'राजनीतिक क्षय' के रूप में देखते हैं। वस्तुतः राजनीतिक क्षय वह अवस्था है जिसमें किसी राजव्यवस्था में जन-आकांक्षाओं व माँगों के अनुरूप निर्गत प्राप्त नहीं हो पाते हैं। इसी प्रकार राजनीतिक मूल्यों में भी गिरावट आने लगती है। इस निर्णय में अनेक प्रकार की समस्याएँ भी उत्पन्न होने लगती हैं।

    राजनीतिक क्षय के कारण

    राजनीतिक क्षय की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारणों का उल्लेख किया जा सकता है -

    (i) असन्तुलित विकास - असन्तुलित विकास राजनीतिक क्षय का प्रमुख कारण है। यह असन्तुलन विविध क्षेत्रों में देखने को मिलता है। रोजगार के साधनों में असन्तुलन, व्यक्तियों की आयु में असन्तुलन, सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों व विकास के मध्य असन्तुलन, यह असन्तुलन सामाजिक और औद्योगिक प्रगति के सापेक्ष राजनीतिक संस्थाओं की दक्षता व कार्यक्षमता में कमी को भी प्रदर्शित करता है।

    (ii) आधुनिकीकरण व संस्थावाद - सामाजिक आधुनिकीकरण व संस्थावाद की तीव्र प्रगति ने भी राजनीतिक क्षय को जन्म दिया है। सामाजिक ताने-बाने में तीव्र गति से होने वाला परिवर्तनों ने राजव्यवस्था पर की अपेक्षाओं व माँगों के निष्पादन का प्रचुर दबाव बना दिया है और राजनीतिक स्तर पर राजव्यवस्थाएँ इनके निष्पादन के स्तर पर निरन्तर पिछड़ती जा रही है और राजनीतिक क्षय की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

    राजनीतिक क्षय के दुष्परिणाम

    राजनीतिक क्षय के अनेक गम्भीर दुष्परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं। इसने नयी प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया है। जिनमें बेरोजगारी, राजनीतिक, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीयतावाद, आतंकवाद, शासकीय कार्यों में अति औपचारिकतावाद, लालफीताशाही इत्यादि प्रमुख हैं। इसी प्रकार राजनीतिक क्षय के चलते राष्ट्रों की प्रगति की गति व स्वरूप पर भी प्रभाव पड़ा है। राजनीतिक विकास और सामाजिक विकास के मध्य अन्तर व असामन्जस्य की स्थिति उत्पन्न हुई है।

    इस प्रकार अन्ततः यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक क्षय आधुनिक लोककल्याणकारी राज्यों में विकास के साथ पनपी एक गम्भीर समस्या है जिसका निदान किये बिना ये अपने उद्देश्यों की पूर्ण प्राप्ति में सफल नहीं हो सकते हैं। 

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