राजनीतिक सिद्धांत के पुनर्जागरण पर एक लेख लिखिए

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राजनीतिक सिद्धांत के पुनर्जागरण पर एक लेख लिखिए।

  1. राजनीतिक सिद्धांत के पतन और पुनरुत्थान बताइए।
  2. राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुत्थान से आप क्या समझते हैं?

राजनीतिक सिद्धांत का पुनर्जागरण

20वीं शताब्दी में राजनीतिक सिद्धांत के पतन होने के सम्बन्ध में गहरा विवाद रहा। जिन विद्वानों के द्वारा राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण किया जा रहा था, वे ही गहरे असन्तोष के कारण उसे पतन की ओर ले जाने में सहायक रहे। इसके विपरीत, कुछ विद्वान ऐसे भी थे जो राजनीतिक सिद्धांत का पतन नहीं मानते थे। इसलिए नये ढंग से इसे प्रस्तुत किया गया, इसे ही राजनीतिक सिद्धांत का पुनर्जागरण का नाम दे दिया गया।

राजनीतिक सिद्धांत के पुनर्जागरण के सम्बन्ध में ऑकशॉट, हन्ना एरेन्ट, जुवेनल, लियो स्ट्रास, वोगेलिन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अपने-अपने विचारों के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि राजनीतिक सिद्धांत का अभी पतन नहीं हआ। इसके साथ ही इन्होंने इस बात पर भी बल दिया है कि इसके पुनरुत्थान में कुछ भी सामग्री की आवश्यकता नहीं है। यह एक सामान्य रूप में भी हो सकता है।

20वीं शताब्दी में समग्र रूप से व्यवहारवादी दर्शन विकसित किया गया है। जिससे रचनात्मक रूप में स्वतन्त्रतापूर्ण कार्यों को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। इसके अलावा कोई उत्तरदायित्व नहीं बनाया गया था। राजनीतिक सिद्धांत के पनर्निर्माण में योगदान देने वाले सभी विद्वानों का मत है कि इसी से उत्तर-विचारधारा की धारणा का विकास हुआ है। इसलिए राजनीतिक सिद्धांत का नये सिरे से पुनर्निर्माण करने पर बल दिया गया। इसमें विचारधारा द्वारा जो सीमाएँ लगाई गई थीं उसकी क्षतिपूर्ति करना भी आवश्यक हो गया था।

1970 के बाद अमरीका, यूरोप तथा अन्य देशों में राजनीतिक चिन्तकों ने नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीतिक सिद्धान्तों में दोबारा से रुचि लेनी आरम्भ की है। इस पुनर्जागरण का एक महत्वूपर्ण कारण जहाँ नैतिक मूल्यों में उभरता हआ संघर्ष था, वहाँ दूसरी तरफ सामाजिक विज्ञानों तथा साहित्य में परिवर्तन थे। इसके अतिरिक्त द्वितीय विश्वयुद्ध के सायों की समाप्ति, यूरोप के पुनरुत्थान तथा मार्क्सवाद और समाजवाद की विचारधारा में संकट ने राजनीतिक विचारधाराओं में अनिश्चितता-सी ला दी। चाहे वह उदारवाद था या प्रजातन्त्र, मार्क्सवाद था या समाजवाद, उभरते हुए सामाजिक आन्दोलनों ने सबको चुनौती दी - वे आन्दोलन जो राजनीतिक सिद्धान्तों के विषय-क्षेत्र को पुनः लिखना चाहते थे।

व्यवहारवाद का उदय - व्यवहारवाद राजनीतिक तथ्यों, व्याख्या एवं विश्लेषण का एक विशेष तरीका है जिसको द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अमेरिकी राजवैज्ञानिकों ने विकसित किया है। यह उपागम राजविज्ञान के सन्दर्भ में मुख्यतः अपना ध्यान राजनीतिक व्यवहार पर केन्द्रित करता है।

व्यवहारवाद के प्रभुत्व के युग में राजनीतिक सिद्धान्तों को राजनीति विज्ञान ने अभिभूत किया हुआ था। सिद्धान्तों में ज्ञान और खोज को न्यायसंगत स्थान नहीं दिया गया। चाहे व्यवहारवाद की धारणा राजनीतिक सिद्धान्तों पर अधिक देर तक हावी नहीं रही, यद्यपि राजनीतिक और सामाजिक विज्ञानों के विकास में यह 'विज्ञानवाद' (scienticism) के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ गई।

राजनीतिक के सिद्धांत पुनर्जागरण के स्रोत

राजनीतिक सिद्धान्तों के पुनर्जागरण की प्रक्रिया के कई स्रोत हैं। जहाँ एक तरफ कई चिन्तकों (जैसे टॉमस कून) ने 'विज्ञान' के सम्पूर्ण मॉडल को ही चुनौती दे दी, वहाँ कुछ अन्य लेखकों का विचार था कि सामाजिक विज्ञानों और सामाजिक मुद्दों को समझने की कुछ विशिष्ट समस्यायें होती हैं जो एकीकृत विज्ञान के मॉडल द्वारा नहीं समझी जा सकती। इसके दो कारण

  1. सामाजिक विज्ञानों का उद्देश्य सामाजिक व्यक्ति और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन है और विभिन्न चिन्तक इनकी व्याख्या विभिन्न तरीकों से करते हैं।
  2. राजनीतिक सिद्धान्तों को राजनीति के क्रमबद्ध विवरण तक सीमित नहीं किया जा सकता; सिद्धान्तों को अपनी आलोचनात्मक भूमिका अवश्य निभानी चाहिए, अर्थात् इन्हें राजनीति के वे स्पष्टीकरण भी देने चाहिये, जो आम व्यक्ति की समझ से बाहर होते हैं। विभिन्न चर्चाओं के परिणामस्वरूप, राजनीतिक सिद्धान्तों में कई परिवर्तन हुए। यद्यपि इन सभी परिवर्तनों की विस्तृत व्याख्या सम्भव नहीं है।

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