Wednesday, 9 February 2022

उत्तर आधुनिकता की अवधारणा स्पष्ट कीजिये।

उत्तर आधुनिकता की अवधारणा स्पष्ट कीजिये।

  1. 'उत्तर आधुनिकता' के लक्षण क्या हैं ?
  2. उत्तर आधुनिकता से क्या अभिप्राय है?

उत्तर आधुनिकता का अर्थ

उत्तर आधुनिकता से तात्पर्य आधुनिकता के खिलाफ प्रतिक्रिया से है। संक्षेप में इसे आधुनिकतावाद विरोधी भी कहा जा सकता है परन्तु यह पूर्णतः आधुनिकता का विरोधी नहीं। 20 वीं सदी में नव-स्वतन्त्र व विकासशील देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और यहीं से आधुनिकता का उदय हुआ। परन्तु शीघ्र ही आधुनिकता के दुष्परिणाम सामने आने लगे और इन राष्ट्रों की अपनी संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, इत्यादि पश्चिमीकरण के अंधानुकरण का शिकार होने लगे। अतः 'उत्तर आधुनिकता' का उदय हुआ। उत्तर आधुनिकता के तहत सभ्यता व संस्कति के आधुनिकीकरण के साथ-साथ अपनी सभ्यता व संस्कृति की गरिमा बनाए रखने का प्रयास किया जाने लगा है। यह पाश्चात्यीकरण थे अंधानुकरण की विरोधी है। इसके अन्तर्गत समाज में व्याप्त कुरीतियों, कप्रथाओं के अन्त पर बल देने के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों को यथावत् बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। अतः 'उत्तर आधुनिकता' आधुनिकता का उत्तरवर्ती व अधिक प्रासंगिक रूप है।

1970 के दशक से उत्तर आधुनिक काल को काफी महत्त्व मिला है। उस समय से लेकर इन तीन दशकों के दौरान उत्तर आधुनिक विचारों का सारी दुनिया में प्रसार हुआ है। लेकिन इनका प्रभुत्व विकसित पश्चिमी जगत् में है। उत्तर आधुनिकतावाद के विचारकों ने उस दर्शन, संस्कृति और राजनीति की आलोचना की है और इस पर प्रहार किया है जिसे आधुनिकतावाद ने पैदा किया। दरअसल उत्तर आधुनिकतावाद ने खुद को आधुनिकतावाद के समक्ष खड़ा कर दिया है। इसलिए यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि आधुनिक है क्या। इसको समझे बिना उत्तर आधुनिकतावाद को समझना संभव नहीं होगा। 

उत्तर आधुनिकतावाद के प्रमुख विचारक 

1. मिशेल फूको (1926-1984): फ्रांसीसी दार्शनिक फूको एक जटिल विचारक था जिसके विचारों के दायरे में विभिन्न विषय और तरह तरह के विचार आते हैं। तो भी उसे एक उत्तर आधुनिक विचारक के रूप में स्थान प्राप्त है क्योंकि वह प्रबोधन संबंधी विचारों और आधुनिकता का जबर्दस्त आलोचक था। उसके लेखन ने मानव विज्ञान और समाज विज्ञान को काफी प्रभावित किया और यह प्रभाव अभी भी जारी है। उसके कार्यों का विभिन्न विषयों के संदर्भ में मसलन इतिहास, संस्कृति संबंधी अध्ययन, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, साहित्य सिद्धांत और शिक्षा में उल्लेख किया जाता है। वह विभिन्न सामाजिक संस्थानों की आलोचना के लिए जिसे वह यूरोपीय आधुनिकता का उत्पाद समझता था, प्रसिद्ध है।

फूको ने कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के जरिए आपने विचारों को अभिव्यक्ति दी ये पुस्तकें हैं- मैडनेस एण्ड सिविलाइजेशन (1961), दि बर्थ ऑफ दि क्लीनिक (1963), दि आर्डर ऑफ थिंग्स (1966), दि आर्कियोलॉजी ऑफ नॉलेज (1969), डिसिपलिन एण्ड पनिश : दि बर्थ ऑफ दि प्रिजन (1975), और दि हिस्ट्री ऑफ सेक्सुअलिटी (1976-1986)। 

2. जैक देरिदा (1930-2004): एक अन्य फ्रांसीसी दार्शनिक देरिदा उत्तर आधुनिक सिद्धांत के विकास में और खासतौर पर इसे 'भाषायी मोड़' देने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण साबित हुए हैं। उत्तर संरचनात्मक और उत्तरआधुनिक विचारों के विकास में देरिदा का बुनियादी योगदान उनका विखंडन का सिद्धांत है। यह सभी लिखित पाठों को जटिल सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का उत्पाद मानता है। इसके अलावा इन पाठों को अन्य पाठों तथा लेखन की परिपाटियों के संदर्भ में ही परिभाषित किया जा सकता है। देरिदा के अनुसार मनुष्य का ज्ञान पाठों तक सीमित है और इन पाठों से बाहर कुछ भी नहीं है। यथार्थ का निर्माण भाषा के जरिए होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भाषा से बाहर कोई दुनिया नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि जिस दुनिया को हम जानते हैं उस तक भाषा के जरिए हम पहुँच सकते हैं। हमारे विश्व की रचना भाषा से होती है और इसी लिए यथार्थ से पहले भाषा का प्रश्न आता है। यथार्थ का ज्ञान भाषा और इसके अस्तित्व के नियमों से परे नहीं है। विखंडन से संबंधित एक दूसरा मुद्दा भिन्नता का विचार है जो यह बताता है कि किसी भी चीज का अर्थ अन्य चीजों से भेद करके ही तय किया जा सकता है। किसी भी पाठ को अन्य पाठों से भेद के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। इस तरह हम देखें तो चीजों के अस्तित्व से पहले ही भिन्नताएँ होती हैं। 

3. ज्याँ फ्रांसुआ ल्योतार्द ( 1924-1998 ): ल्योतार्द वह प्रमुख विचारक हैं जिन्होंने उत्तर आधुनिक शब्दावली को प्रसिद्धि दिलायी। उनकी पुस्तक दि पोस्टमॉडर्न कंडीशन ने, जो 1979 में फ्रेंच में और 1984 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई, इस शब्दावली को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने इसे इस प्रकार परिभाषित किया-'अत्यंत सरलीकृत करते हुए मैं उत्तर आधुनिकता को महा आख्यानों के प्रति संदेह के रूप में परिभाषित करता हूँ।' ये 'मेटानैरेटिव्स' अर्थात् महा आख्यान हैं मसलन 'आत्मा का द्वंद्व, अर्थ का व्याख्यात्मक स्वरूप, तर्कसंगतता की मुक्ति या संपत्ति की रचना।' ल्योतार्द ने इन सारी चीजों के प्रति शंका व्यक्त की। उनके विचार से सभी तरह के सिद्धांत और विमर्श, ये सभी 'प्रच्छन्न आख्यान' हैं अर्थात् सार्वभौम वैधता के अपने दावों के बावजूद ये लगभग गल्प की तरह के विवरण हैं। उन्होंने उन आधुनिकतावादी सिद्धांतों की आलोचना की जो ऐसे विचारों को समग्र और सार्वभौम रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति रखते हैं। ये विचार बुनियादी तौर पर आधुनिक यूरोप के उत्पाद हैं। वह आधारभूतवाद को भी खारिज करते हैं जिसके तहत हर तरह के ज्ञान को सुरक्षित सैद्धांतिक बुनियाद पर आधारित ठहरा दिया जाता है। वह सभी महासिद्धांतों पर प्रहार करते हैं जिनकी अभिव्यक्ति उनके शब्दों में पुरुषवादी भाषा की जरिए होती है जिसमें प्रभुत्व के विभिन्न रूप दिखायी देते हैं- एक वर्ग पर दूसरे वर्ग का प्रभुत्व, महिलाओं पर पुरुषों का प्रभुत्व, अल्पमत पर बहुमत का प्रभुत्व। इसकी बजाय वह विभिन्नता और बहुलता, रेडिकल अनिश्चितता तथा विकल्पों की संभाव्यता के पक्ष में दलील पेश करते हैं। 

4. हेडेन व्हाइट (जन्म 1928 ): अमेरिकी इतिहासकार हेडेन व्हाइट को एक महत्त्वपूर्ण उत्तर आधुनिक और खास तौर से इतिहास के क्षेत्र में उत्तर आधुनिक विचारक माना जाता है। उनकी पुस्तक मेटा हिस्ट्री : दि हिस्टारिकल इमेजिनेशन इन नाइनटिन्थ सेंचुरी यूरोप 1973 में प्रकाशित हुई और इतिहास के दर्शन के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में इसकी प्रशंसा की गयी है। ऐसा माना जाता है कि इसने इतिहास-लेखन में एक नए 'भाषायी मोड़' की शुरुआत की। कहा जाता है कि अब यह पूछे जाने की बजाय कि 'इतिहास किस प्रकार विज्ञान प्रतीत होता है?', यह पूछा जा सकता है कि 'इतिहास किस प्रकार गल्प प्रतीत होता है?'


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