Monday, 24 January 2022

उत्तर व्यवहारवाद के प्रमुख सिद्धांत बताइये।

उत्तर व्यवहारवाद के प्रमुख सिद्धांत बताइये।

उत्तर-व्यहारवाद के प्रमुख सिद्धांत

डेविड ईस्टन के अनुसार, उत्तर-व्यवहारवाद के निम्नलिखित सिद्धांत हैं, जो इस प्रकार, से हैं -

  1. परम्परावाद से पृथक्ता - यह परम्परावाद से बिल्कुल अलग है दोनों में मौलिक अन्तर यह है कि परम्परावाद को प्रमाणित नहीं माना जाता वह राजनीति विज्ञान को शास्त्रीय परम्परा में रखना चाहता है इसके विपरीत उत्तर-व्यवहारवाद व्यवहारवादी युग के कार्यों को स्वीकार करते हुए राजनीति विज्ञान को नवीन दिशा में अग्रसर करने का प्रयास है।

  2. स्वाभाविक क्रान्ति - उत्तर-व्यवहारवाद एक स्वाभाविक क्रान्ति है प्रतिक्रिया नहीं यह एक वास्तविक क्रान्ति है न कि अनुरक्षण, भविष्य की दिशा में एक कदम न की पीछे की ओर हटने की प्रवृत्ति।

  3. भविष्य-उन्मुख - उत्तर-व्यवहारवाद भविष्य उन्मुख है उसका उद्देश्य राजनीतिक विज्ञान को नवीन दिशा व गति प्रदान करते हुए उसको प्राचीन परम्पराओं से सम्बद्ध करना है डेविड ने इसे प्रस्तुत करते हुए कहा है कि उत्तर-व्यवहारवाद भविष्य की ओर उन्मुख है तथा राजनीति विज्ञान को नई दिशाओं की ओर मोड़ने तथा उसके उत्तराधिकार को अस्वीकार करने के स्थान पर इसमें और भी बहुत कुछ जोड़ने के लिए प्रयत्नशील है।

  4. वैज्ञानिक व मूल्य निरपेक्षता पर बल - उत्तर-व्यवहारवाद में मूल्यों की उपयोगिता के साथ-साथ वैज्ञानिकता तथा मूल्य निरपेक्षता पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

  5. कार्य विज्ञान पर बल - उत्तर-व्यवहार चिन्तनशील विज्ञान के स्थान पर कार्य विज्ञान पर बल देता है। राजनीतिशास्त्र के समस्त शोध प्रकट हो सके।

  6. बुद्धिजीवी समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका - उत्तर-व्यवहारवाद के अन्तर्गत बुद्धिजीवी समाज को महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने के अवसर मिलते हैं अतः इसका प्रयोग उचित लक्ष्यों के लिए करना चाहिए।

  7. राजनीतिक विचारधारा से सम्बद्धता नहीं - यह किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से सम्बन्धित नहीं है बल्कि यह उन सभी प्रकार के राजनीतिकशास्त्रियों के सिद्धान्तो तथा विभिन्न पद्धतियों में आस्था रखता है, जिनमें आधुनिक राजनीतिक शोध के प्रति विद्वानों में असन्तोष है इसमें पहले सिरे के रूढ़िवादी कट्टर वामपन्थी तथा विभिन्न प्रकार की पद्धतियों को मानने वाले वैज्ञानिक व दार्शनिक हैं।

निष्कर्ष स्वरूप उत्तर-व्यवहारवाद आज भी एक व्यापक बौद्धिक प्रवृत्ति है इसके अन्तर्गत व्यवहारवादी पद्धतियों तथा तकनीकों का समर्थन किया गया है यह वर्तमान युग की समस्याओं को अधिक स्पष्ट करती है इसमें शद्ध राजवैज्ञानिक व शास्त्रीय विचारक दोनों सम्मिलित हैं परन्तु इसे परम्परावाद का पुनरुत्थान समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। सन् 1970 ई० के दशक से उत्तर-व्यवहारवाद व व्यवहारवाद के मध्य पारस्परिक विरोध की स्थिति समाप्त हो चुकी है विद्वानों ने व्यवहारवाद की इस बात को स्वीकार कर लिया है कि राजनीतिक विज्ञान में अधिक मात्रा में अनुभाविक अध्ययन तथा परिशद्ध परिणाम देने वाली पद्धतियों को अपनाते हुए सही अर्थों में विज्ञान की स्थिति प्रदान करने का प्रयास किया जाना चाहिए तथा इसके साथ यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि राजनीतिक का ज्ञान वास्तविक राजनीतिक जीवन की समस्याओं से पृथक् रखकर नहीं किया जा सकता तथा सम्पूर्ण राजनीतिक अध्ययन में मूल्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।


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